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हिंदी व भारतीय भाषाओं बिन अधूरा है भारत

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Dr. Vinod Babbar

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यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम राष्ट्र और संस्कृति शब्द पर तो बहुत बल देते हैं लेकिन राष्ट्र की एकता और संस्कृति की वाहिनी भाषा को दरकिनार करते हैं. भाषा लगातार विवादों में घिर कर महत्वहीन हो रही है. लच्छेदार भाषणों से सत्ता मिलती है, इसलिए राजनीतिक लोग राष्ट्र की भाषा तक को लच्छों में उलझाने से नहीं चूकते. उनके लिए देश को जोड़ने वाली भाषा से अधिक महत्वपूर्ण कुर्सी के निकट ले जाने वाली विभाजक नीतियां हैं. इसलिए आजादी के 70 वर्ष बाद भी राष्ट्रभाषा अनाथ है तो यह आश्चर्य का विषय नहीं माना जा रहा.

हम लाख गाते रहे कि ‘भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि यह सभ्यता, संस्कृति को संस्कार देने वाली बांसुरी की तान है. राष्ट्र को तेजस्विता और एकता का स्वर देने वाला मंगलगान है.’… लेकिन, सत्ता को संचालित करने वाली राजनीति व समाज को अपने प्रायोजित ढ़ंग से संचालित करने वाले मीडिया तक केवल और केवल अपने लाभ-हानि का आंकलन करते हैं. वे अर्थशास्त्र के उस नियम के समर्थक हैं, जिसके अनुसार केवल वही उत्पाद और केवल वही सेवा उपलब्ध कराई जाये जो सहज लाभ दे सके.

सैकड़ों वर्षों की गुलामी के इतिहास के अध्ययन से यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है कि आक्रांताओं ने यहां के जनमानस को विभाजित कर अपनी मनमानी बरकरार रखी. अतः आज भी सत्ता के लिए विभाजन के बीज बोने वाले देश की सम्पर्क भाषा तक को नहीं बख्शते हैं.

वरना जब देश भर के प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर राष्ट्रभाषा हिंदी के अतिरिक्त स्थानीय भाषा, अंग्रेजी और उर्दू का उपयोग होता है तो अब अचानक बंगलूरु मैट्रो में इसी नियम पर आपत्ति क्यों?

वहां क्यों हिंदी को हटाने पर बल दिया जा रहा है? कन्नड़ का महत्व कम करने अथवा उसे हटाकर हिंदी को स्थान देने की बात होती तो समझा जा सकता था, लेकिन यहां विदेशी भाषा अंग्रेजी का नहीं बल्कि इस देश की एकता की सबसे मजबूत कड़ी हिंदी का विरोध करने के पीछे राजनीति की वह चौसर है जो स्थानीय लोगों की भावनाओं को उबाल देकर सर्वप्रथम सौहार्द बिगाड़ रही है. तत्पश्चात वह अपने अगले उद्देश्य यानी अपने राजनैतिक लक्ष्य को साधने में लगेंगे. वे यह समझने को तैयार नहीं कि उनका यह कदम आत्मघाती और राष्ट्रघाती है.

हम भी इतने अंधभक्त बन गये हैं कि समझकर भी नहीं समझते हैं कि मातृभाषा बिना संस्कृति की रक्षा संभव नहीं है. अनेकानेक बोलियों और भाषाओं वाला यह राष्ट्र सम्पर्क भाषा बिना गूंगा है. अपनी सम्पर्क भाषा बिना लोकतंत्र मूक और अपाहिज है.

दुर्भाग्य से भाषा के मामले में हम दो अतियों के शिकार हैं. एक और हम अपने मासूम बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भेजकर उस पर मानसिक और शारीरिक अत्याचार करते हैं. अपने परिवार के किसी मांगलिक उत्सव के निमंत्रण-पत्र और अपने व्यापारिक संस्थानों, प्रतिष्ठानों के बोर्ड विदेशी भाषा में छपवा कर न जाने किस श्रेष्ठता ग्रन्थी का प्रदर्शन करते हैं. तो दूसरी ओर जाने- अनमाने राजनैतिक षड्यंत्रों का अंग बनकर अपनी क्षेत्रीय बोलियों-भाषाओं और हिंदी को एक दूसरे से लड़ाते हैं. क्योंकि हम मर्म की बात कहां समझ रहे हैं कि इस खींचतान का स्वाभाविक परिणाम भारतीय भाषाओं का अहित और एक विदेशी भाषा का प्रभुत्व कायम करना होगा.

यह ठीक है कि हिंदी में बहुत साहित्य सृजन हो रहा है. तमाम विदेशी कम्पनियां भी इसके महत्व को स्वीकार कर रही हैं, लेकिन हमें स्वयं से अपने कर्णधारों से पूछना चाहिए कि क्या हिंदी लोक व्यवहार और प्रशासन की भाषा बन सकी है?

कहने को हिंदी राजभाषा है, लेकिन देश का राज काज किस भाषा में चलता है यह सभी जानते हैं. ऐसे हजारों उदाहरण मौजूद है जो प्रमाणित करते हैं कि न्याय पर काबिज विदेशी भाषा अन्याय कर रही है. यहां एक निज उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूं.

एक मामले में विदेशी भाषा की अनिवार्यता के कारण हमारे अधिवक्ता ने ‘उसने मार्च में हमसे सम्पर्क किया.’ का अंग्रेजी अनुवाद किया, ‘He approached us in March’ ही अप्रोच्ड अस इन मार्च’ बहस के दौरान प्रतिवादी अधिवक्ता (वकील) ने अर्थ का अनर्थ करते हुए तर्क प्रस्तुत किया कि ‘अभियुक्त 25 मार्च को भारत आया, अतः मार्च में ‘अपरोच्ड’ का प्रश्न ही नहीं.’

उसने अपरोच्ड को प्रत्यक्ष सम्पर्क तक सीमित करते हुए अनेकों तर्क रखे, जिससे माननीय न्यायालय भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहा और बाजी पलट गई. प्रशासन की भाषा में भी ऐसे अनेकों उलझाव हैं, जो सामान्यजन को भ्रमित करते हैं.

आखिर ऐसा क्यों है कि जो प्रशासन सामान्य जनता के लिए है वह ऐसी भाषा और शब्दावली का उपयोग क्यों करता है जो उसकी समझ में ही न आये?

सरकारी योजनाएं सरकार को बनाने वाले लोगों की भाषा में क्यों न हो? शासन, प्रशासन की प्रक्रिया को सहज, सरल बनाने के लिए उसे आमजन की भाषा में क्यों न रखा जायें?

हिंदीतर क्षेत्रों दक्षिण अथवा पूर्वोत्तर की बात न भी करें तो देश की राजधानी दिल्ली जहां अधिसंख्यक लोग हिंदीभाषी हैं, लेकिन यहां के परिवहन विभाग द्वारा जारी किये जाने वाले ड्राईविंग लाइसेंस (चालक अनुज्ञा पत्र) में एक भी शब्द हिंदी का नहीं होता.

आखिर क्यों हम राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाषा के प्रति इतने संवेदनहीन हैं?

हम कब समझेंगे कि सांस्कृतिक अवमूल्यन और राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा के लगातार ह्रास में निज भाषा की अवहेलना है. हिंदी को महत्वहीन बनाने तथा अँग्रेजी को सिर चढ़ाने वाले अक्सर तर्क देते हैं कि अंग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है, जबकि वास्तविकता इससे विपरीत है.

अंग्रेजी के पास मात्र दस हजार मूल शब्द हैं. शेष शब्द लैटिन, फ्रेंच, ग्रीक, दक्षिण पूर्व एशिया की भाषाओं के हैं. दूसरी ओर भारतीय भाषाएं उससे कई गुणा समृद्ध हैं. यथा मराठी में लगभग पचास हजार, गुजराती में चालीस हजार से भी अधिक तथा हिंदी में 2.5 लाख से भी अधिक मूल शब्द हैं. हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक है.

प्रसिद्ध विद्वान जार्ज बनार्ड शा ने अंग्रेजी की लिपि को अवैज्ञानिक मानते हुए अपनी वसीयत में इसे सुधारने के लिए प्रावधान किया था. जबकि हिंदी की लिपि देवनागरी सर्वाधिक वैज्ञानिक और ध्वन्यात्मक है. उसमें जो लिखा जाता है वही पढ़ा जाता है.

अतः सामान्य जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति प्रथम बार में भी इसका सही उच्चारण करेगा जबकि BUT बट और PUT पुट जैसे हजारों प्रमाण साक्षी है कि तथाकथित समृद्ध भाषा के सही उच्चारण से पूर्व उस शब्द का उच्चारण जानना जरूरी है. सर विलियम जोन्स, जान क्राइस्ट सहित दुनिया भर के विद्वान इसका समर्थन करते हैं.

कम्प्यूटर की दुनिया के धुरंधर और माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स का वर्षों पहले का यह कथन कि, ‘जब बोलकर लिखने की तकनीक उन्नत हो जाएगी, हिन्दी अपनी लिपि की श्रेष्ठता के कारण सर्वाधिक सफल होगी.’ यह कथन आज साकार हो चुका है.

अंग्रेजी को विज्ञान और तकनीक की भाषा बताने वाले नहीं जानते कि जापान, जर्मन, फ्रांस, रूस, कोरिया सहित दुनिया के किसी भी प्रौद्योगिकी उन्नत राष्ट्र में अंग्रेजी नहीं बल्कि वहां की स्थानीय भाषा में पढ़ाई होती है. वे नहीं जानते हैं कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मत है कि हिंदी तथा सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत कम्प्यूटर के लिए सबसे अच्छी भाषा है. जर्मन और अमेरिका में संस्कृत पर सर्वाधिक शोध हो रहे हैं. नासा ‘मिशन संस्कृत’ पर कार्य कर रहा है.

हिंदी तो पूरे देश को जोड़ने की भूमिका सदियों से निभा रही है. यह भूमिका पहले संस्कृत ने निभायी थी. यह तथ्य भ्रामक और अपराधपूर्ण है कि हिंदी के कारण बंगला, कन्नड़, तमिल, मलयालम, तेलुगु, गुजराती, भोजपुरी, असमी आदि भाषाओं का नुकसान होगा. सत्य तो यह है कि विदेशी ग़ुलाम मानसिकता की भाषा अंग्रेज़ी से बंगला, कन्नड़, तमिल, मलयालम, तेलुगु, गुजराती, असमी हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. अंग्रेज़ी भाषा के अधिकाधिक उपयोग के कारण ही तो हमारी नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट रही है.

उसका खान-पान, रहन-सहन, पहनावा, बोलचाल, विचार, व्यवहार सभी कुछ अंग्रेजियत से प्रभावित हो रहा है. वे अपने समृद्ध प्राचीन ज्ञान- विज्ञान से कट रहेे हैं. अपने इतिहास से अपरिचित हैं. अंग्रेजी और अंग्रेजियत उन्हें भौतिक चकाचौंध में उलझा रही है. इसीलिए परिवार टूट रहे हैं. व्यक्ति एकांकी हो रहा है. ओल्ड होम विवशता बन रहे हैं, क्योंकि हमने अपनी भाषा का त्याग कर दिया.

भाषा के छूटने से परम्परा और संस्कृति से नाता कमजोर होता है. धर्म केवल निज सुखों तक तक सीमित होकर रह जाता है. तो जीवन का अशांत होना अनिवार्य हो जाता है. मैडलवान ने भी कहा है कि प्रत्येक संस्कृति का सार तत्व उसकी भाषा में अभिव्यक्ति पा सकता है और पाया करता है. भाषा न केवल संस्कृति का अविभाज्य अंग है अपितु उसकी कुंजी भी है. भाषा के बिना यदि संस्कृति पंगु है तो संस्कृति के अभाव में भाषा अंधी.

यहां भाषा और संस्कृति के अटूट सम्बन्ध के विषय में 29 नवम्बर 2003 से मई 2006 तक वैलिंग्टन, न्यूजीलैंड के संग्रहालय में लगी एक प्रदर्शनी का उल्लेख किया जाना अप्रासंगिक न होगा, जिसमें एक फिल्म दिखाई गई थी उसमें एक माओरी आदिवासी कहता है-

As long as we have the language
we have the culture
As long as we have the culture
we can hold on to the land.

अर्थात जब तक हमारे पास भाषा है, तब तक हमारे पास संस्कृति है, जब तक हमारे पास संस्कृति है, तब तक हम अपनी भूमि पर बचे रहेगें.

इसी प्रकार लार्ड मैकाले द्वारा 1835 में प्रस्तुत विवरण पत्र की प्रशंसा करते हुए नार्मन जिफेयर्स लिखा है- Culture was to be transplanted to prompt progress and so English became the possession. अर्थात अंग्रेजी भाषा की शिक्षा का उद्देश्य था प्रगति हेतु एक संस्कृति की प्रति स्थापना करना, इसलिए अंग्रेजी को साधन बनाया गया.

उनसे पूर्व बर्क ने 1783 ई. में ईस्ट इंडिया बिल पर बोलते हुए भारतीय संस्कृति की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा था, A people for ages civilized and cultivated; cultivated by all the arts of polished life, while we were yet in the woods. (यहाँ के लोग युगों-युगों से सुसभ्य और सुसंस्कृत हैं, उन्होंने उन्नत जीवन जीने की सभी कलाओं में तभी से दक्षता प्राप्त कर ली थी जब कि हम अभी जंगली जीवन जी रहे थे.)

हम यह तो देख ही रहे हैं कि भाषा और संस्कृति गहन रूप से, जैविक रूप से संबंधित हैं. आज की हमारे देश की शिक्षा पद्धति में अंग्रेज़ी माध्यम को प्राथमिक शालाओं से लादने की प्रवृत्ति को देखते हुए यह दिख रहा है कि भारतीय भाषाएं और उनके साथ भारतीय संस्कृति भी खतरे में हैं.

क्या हम अपनी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं? यदि हां तो हमे अपनी भाषाओं की रक्षा का संकल्प लेना होगा. जब इन तमाम तथ्यों के बावजूद अंग्रेजीदां लोग अपनी जिद्द नहीं छोड़ सकते. हो सकता है कि आपसे कोई यह प्रश्न भी करे कि पश्चिम की विकसित जीवनशैली के रहते, भारतीय संस्कृति की रक्षा करने की आखिर आवश्यकता ही क्या है, तो हमारे सामने भी यक्ष प्रश्न है कि हम भी अपनी माँ, मातृभूमि और मातृभाषा की अनदेखी क्यों करे जिसके साथ हमारा गर्भनाल जुड़ा हुआ है.

14 सितम्बर हिंदी दिवस को कर्मकांडी बनाने से बचते हुए हिंदी के अधिकाधिक उपयोग का संकल्प लेना होगा. जन-जन का हिंदी से जुड़ना ही स्वयं उसकी, उसके समाज, उसके प्रदेश और राष्ट्र के हित में है. ध्यान रहे हिंदी हमारी शक्ति है. हिंदी और विभिन्न भारतीय भाषाओं का निकट आना एकजुट, सशक्त, सफल, समृद्ध भारत और भारतीयता का मंत्र है. इसलिए घर पर मातृभाषा और स्कूल, प्रशासन तथा लोकव्यवहार में मातृभूमि की भाषा यानी हिंदी को अपनाये. हिंदी है तो हिंद है. जय हिंद है.

(Ref: डॉ. विनोद बब्बर की पुस्तक ‘भाषा और संस्कृति’)

Web Title: Hindi Diwas Article by Dr. Vinod Babbar, Rashtra Kinkar

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Featured image credit / Facebook open graph: nitsan + truelancer

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