पाकिस्तान के साथ बहुत से कारणों से तमाम भारतीयों का ऐसा रिश्ता बन गया है कि इसका नाम सुनते ही उनके मन में क्रोध की भावना उठने लगती है. इसी सन्दर्भ में ये कहावत भी बहुत प्रचलित हो गयी है कि जो मज़ा पाकिस्तान की हार में है, वो मज़ा और किसी चीज़ में नहीं.

बावजूद यह कहना कि पाकिस्तान का हर एक नागरिक खराब है, पूरी तरह ठीक नहीं होगा. इसकी बड़ी वजह भी है. असल में पाकिस्तान में भी ऐसे कई लोग हुए, जिन्होंने इंसानियत की नई मिसाल कायम की.

अब्दुल सत्तार ईदी, उनमें से ही एक नाम हैं!

उनके बारे में कहा जाता है कि वह इतने नेक दिल इंसान थे कि लोगों की सहायता के लिए उन्होंने पाकिस्तान की सड़कों पर भीख तक मांगी. यही वजह रही कि बाद में उन्हें ‘एंजल ऑफ़ मर्सी‘ के उपनाम से नवाज़ा गया.

तो आईये जानने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान का यह नेक दिल इंसान कौन था–

माँ से सीखा… दूसरों के दुख बांटना!

अब्दुल सत्तार ईदी का जन्म 28 फरवरी 1928 को गुजरात, जूनागढ़ के बंतवा क्षेत्र में हुआ. कहते हैं बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, आप उन्हें जिस सांचे में ढालते हैं, वह उसी में ढल जाते हैं. अब्दुल साहब के साथ भी यही हुआ. अपने हिस्से में से दूसरों को बांटकर देना कितना सुखद होता है, यह बात उन्होंने अपनी माँ से सीखी.

बचपन में अब्दुल साहब की माँ जब उन्हें स्कूल भेजती थीं, तो उन्हें दो पैसे दिया करती थीं. साथ ही उन्हें नसीहत देती कि वह उसमे से एक पैसा अपने ऊपर खर्च करे और दूसरा पैसा किसी बेसहारा जरूरतमंद पर. तब शायद उनकी माँ भी नहीं जानती होंगी कि वो जिस नेक काम की आदत अपने बच्चे को सिखा रही हैं, वही आदत उनके बच्चे को एक दिन एंजल ऑफ मर्सी की उपाधि दिलाएगी.

अब्दुल अपनी माँ से बहुत प्यार करते थे. वह उनकी आंख-नाक और कान थी. उन्हें साथ देखकर अक्सर लोग उनकी तारीफ करते थे, किन्तु दुर्भाग्यवश जब वह ग्यारह वर्ष के थे, तब उनकी माँ को लकवा का घात हुआ. इससे वह पूरी तरह से अपाहिज हो गयीं. आगे के आठ वर्षों तक अब्दुल साहब ने अपनी माँ की जी जान से सेवा की, लेकिन अंतत: वह उन्हें बचा नहीं सके. जब उनकी मां की मृत्यु हुई तब अब्दुल करीब 19 वर्ष के रहे होंगे.

मां तो चली गयीं, लेकिन उनके साथ बिताए सालों में अब्दुल ने इस बात को गाठ बांध कर रख लिया कि दूसरों की मदद से बड़ा कोई दूसरा इंसानी धर्म नहीं! इस सीख का असर उनकी आगे की ज़िन्दगी में भी देखने को मिला. उन्होंने वृद्ध, बेसहारा और अपाहिज लोगों को सुविधा प्रदान करने का मन बना डाला. आगे समय के साथ-साथ इस नेक ख्याल को बल मिलता गया और वह इस रास्ते पर चल पड़े.

Abdul Sattar Edhi (Pic : Wikipedia )

भारत विभाजन के बाद छोड़ना पड़ा था घर

सन 1947 के बाद लोगों को स्वतंत्र भारत की ख़ुशी और भारत-पाकिस्तान विभाजन का दुःख दोनों का एक साथ सामना करना पड़ा. हर तरफ अफरा-तफरा का माहौल था. लोग अपनी जान बचाकर यहां-वहां भाग रहे थे. इसी सबके बीच अब्दुल साहब को भी अपने परिवार सहित भारत छोड़ कर पाकिस्तान जाना पड़ा. यहां से जाने के बाद वह करांची में जा बसे.

अब्दुल साहब नई जगह पर फिर से ज़िन्दगी को पटरी पर लाने की कोशिशों में बुरी तरह से उलझ गए. अपने शुरुआती दिनों में जीवन-यापन के लिए उन्होंने एक थोक विक्रेता के यहाँ नौकरी की, जहाँ उन्हें बाज़ार में घूम कर पेन्सिल, तौलिये, माचिस इत्यादि सामान बेचने पड़ते थे. कुछ समय बाद उन्होंने अपने पिता के काम में हाथ बंटाना शुरू किया, किन्तु इन सभी कार्यों से उनका मन संतुष्ट नहीं था.

उन्होंने महसूस किया कि वो अपने लक्ष्य से भटक रहे हैं. अपनी व्यक्तिगत परेशानियों के बावजूद वह अपने मोमिन समुदाय द्वारा संचालित संस्था से जुड़ गए, किन्तु उन्हें वहां निराशा हाथ लगी. असल में उन्हें पता लगा कि यह संस्था केवल मोमिनों की सहायता करती है, जबकि वह किसी विशेष समूह के लिए नहीं बल्कि किसी भी जरूरतमंद की मदद करने चाहते थे.

दूसरा उन्हें ये कभी मंज़ूर नहीं था कि वो किसी का धर्म पूछ कर फिर उसके आगे मदद का हाथ बढ़ाएं. इस कारण उन्होंने इसका विरोध किया तथा मोमिनों की उस संस्था को छोड़ दिया.

Edhi Sahab As Laborer (Pic : Bol)

सड़कों पर भीख मांग करते रहे मदद…

अपने ही समुदाय द्वारा विरोध होने पर भी अब्दुल साहब ने अपने कदम पीछे की ओर नहीं उठाए. उन्होंने अपने घर के बाहर सीमेंट का छोटा सा एक बेंच बनवाया और रात को उसी पर सोने लगे. उन्होंने ऐसा किया क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि यदि देर रात कोई उनसे सहायता मांगने आये तो उसे खाली हाथ लौटना पड़े.

आगे के सफर में अब्दुल साहब ने धीरे-धीरे एक छोटे से चिकित्सालय की स्थापना की, जहाँ वह ज़रूरतमंदों का इलाज करवा सकें. यही चिकित्सालय आज भी ईदी फाउंडेशन का मुख्यालय है. उन्होंने लोगों के निःशुल्क इलाज के लिए चिकित्सकों को राज़ी किया तथा लोगों की दवा के लिए सड़कों पर गाड़ियाँ रोक कर दान माँगा.

वृद्ध अवस्था में भी उन्हें लोगों के लिए सड़कों पर धन मांगते देखा गया. अपने प्रयासों से अब्दुल साहब ने अपनी पहली एम्बुलेंस खरीदी, जिससे वह घायलों को जल्द से जल्दी अस्पताल पहुंचा सकें.

Sattar Sahab Collection Donation On the Street (Pic : Dawn)

ईदी फाउंडेशन का गठन

मजरुह सुल्तानपुरी साहब का एक बड़ा मशहूर शेर है ‘मैं अकेला ही चला था जानिब ए मंज़िल, मगर लोग आते गए कारवां बनता गया’.

अब्दुल साहब पर ये शेर सोलह आने सही बैठता है. जब उन्होंने अपने समाज से लड़ कर एक छोटी सी जगह में डिस्पेंसरी खोली, तब उन्हें शायद यह मालूम भी नहीं था कि एक दिन उनकी यही डिस्पेंसरी दुनिया के सबसे बड़े जनकल्याण संगठनों में अपना नाम करेगी.

उनके नेक इरादों से प्रभावित होकर चिकित्सकों ने लोगों का निःशुल्क इलाज किया, मेडिकल कॉलेज के छात्र उनकी सहायता के लिए आने लगे, लोगों की सहायता उन्हें मिलने लगी और देखते ही देखते अब्दुल साहब द्वार शुरू किये गए संगठन को ‘ईदी फाउंडेशन’ नाम से पहचान मिल गयी.

असल मायने में अब्दुल साहब के इस जनकल्याणकारी संगठन का विस्तार तब हुआ, जब 1957 में उन्होंने करांची में फैली महामारी के लिए लोगों से चंदा इकट्ठा कर के टेंट, निःशुल्क चिकित्सा एवं दवाइयों की व्यवस्था की. जितने लोगों का ईदी फाउंडेशन ने इलाज करवाया उन्हीं की दुआओं ने इसे कामयाबी के गगन चुम्बी शिखर तक पहुंचा दिया. धीरे-धीरे ईदी फाउंडेशन सड़क से घायल लोगों को अपने एम्बुलेंसों में अस्पताल पहुँचाने, मृतकों को दफ़नाने, अनाथ बच्चों को सहारा देने, गरीब बेसहारा लोगों को सहारा देने जैसे नेक कार्य भी करने लगी.

किसी समय में सड़क पर भीख मांग के जुटाए पैसों से एक पुरानी वैन एम्बुलैंस खरीदने वाले अब्दुल साहब ने अपनी अंतिम साँस लेने तक 1500 एम्बुलेंसें खड़ी कर दीं, जो आज भी विश्व की सबसे बड़ी एम्बुलेंस सेवा का कीर्तिमान बनाए हुए है.

Edhi Foundation’s Ambulances (Pic : Edhi)

नवजात को कट्टरपंथियों ने मारा तो…

समाज की बहुत सी अनैतिक घटनाओं का अब्दुल साहब पर हमेशा बहुत गहरा असर पड़ा. इन सभी घटनाओं ने उनके अन्दर कुछ नया करने का जोश जुनून भरा. कहते हैं एक बार अब्दुल साहब ने एक मस्ज़िद के बाहर देखा कि कट्टरपंथियों की भीड़ ने एक नवजात बच्चे को सिर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि वह लावारिस था और कट्टरपंथी ऐसे बच्चों को पाप मानते थे.

अब्दुल साहब ने इसका बहुत विरोध किया. इस घटना ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया और उन्होंने तुरंत ही अपने संगठन की हर शाखा के बाहर एक पालना रखवा दिया. जिस पर लगे पोस्टरों पर लिखा हुआ था कि ‘बच्चे को इस तरह लावारिस छोड़ कर एक और पाप ना करें. इसे हमारी देखरेख में सौंप दें.’ इस तरह उन्होंने हजारों बच्चों को अपनाया तथा उनकी परवरिश का दायित्व उठाया.

उन दिनों यह नियम था कि जो बच्चे लावारिस हैं, उन्हें देश की नागरिकता नहीं मिलेगी. अब्दुल साहब ने इसके खिलाफ़ न्यायालय में याचिका दायर की तथा 20,000 से अधिक बच्चों के अभिभावक के रूप में अपना, अपनी पत्नी का नाम दर्ज करवाया.

अब्दुल साहब यह मुक़दमा जीत गए तथा इसके बाद सभी लावारिस बच्चों को राष्ट्रीय प्रमाण पत्र मिला. गलती से सरहद पार चली गयी भारत की मूक बधिर बेटी गीता को भी ईदी फाउंडेशन ने ही अपने यहाँ पनाह दी थी.

Sattar Sahab With Kids (Pic : Tribune)

पत्नी ‘मदर ऑफ पाकिस्तान’

अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के पीछे अब्दुल साहब इतने जुनूनी हो गए कि उन्हें कभी भी अपना घर बसाने का ख़याल ही नहीं आया, या फिर यूँ कहें कि अल्लाह ने उनके लिए किसी खास को चुना था. सन 1965 में अब्दुल साहब की शादी उन्हीं की डिस्पेंसरी में काम करने वाली नर्स बिलकिस बानों से हुई. बिलकिस ने अब्दुल साहब के साथ कंधे से कंधा मिला कर ईदी फाउंडेशन की बागडोर संभाली और अब्दुल साहब के देहांत के बाद आज भी ईदी फाउंडेशन इन्हीं के संरक्षण में चल रहा है.

बिलकिस बनो आज  मदर ऑफ पाकिस्तान के नाम से भी जानी जाती हैं.

Bilquis Bano With Geeta (Pic : Qz)

देश-विदेश में ‘सम्मान ही सम्मान’

8 जनवरी 2016 को किडनी फ़ेल होने के कारण अब्दुल साहब का 88 वर्ष की आयु में देहांत हो गया. वह अपने पीछे अपनी पत्नी अथवा लगभग उन 20,000 बच्चों को छोड़ गए, जिनके वह कानून तौर पर अभिभावक बने थे. अब्दुल साहब को लोक सेवा के लिए रमन मैगसेसे पुरस्कार (1986), लेनिन शांति पुरस्कार (1988), रोटरी इंटरनेशनल से पॉल हैरिस फेलो पुरस्कार (1993) से सम्मानित किया गया.

यही नहीं अर्मेनियाई भूकंप आपदा (1988) के दौरान सेवाओं के लिए मानवीय चिकित्सा सेवा पुरस्कार(2000) और संयुक्त अरब अमीरात में स्वयंसेवकों के लिए इंटरनेशनल बाल्ज़न पुरस्कार (2000) जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.

विश्व की सुप्रसिद्ध सर्च इंजन साईट गूगल ने अब्दुल साहब के 89वें जन्मदिन पर उन्हें सम्मानित करते हुए उनका डूडल बनाया था.

Doodle Of Abdul Sattar Edhi (Pic : Refinery)

अब्दुल सत्तार ईदी साहब ने सदैव मानवता को ही अपना मुख्य धर्म माना. हज़ार कठिनाइयों और अपमान सहने के बाद भी वो अपने पथ पर आगे बढ़ते रहे तथा धरती पर फरिश्तों के मौजूद होने का उम्दा नमूना पेश किया. हम सलाम करते हैं अब्दुल साहब जैसी महान आत्मा को.

Web Title: Abdul Sattar Edhi Aka Angel Of Mercy, Hindi Article

Feature Representative Image Credit: BBC