हर देश की अर्थव्यवस्था उसके प्राकृतिक साधनों पर टिकी होती है. जिस तरह भारत की अर्थव्यवस्था में यहां किसानों द्वारा उगाने वाला अनाज महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. वैसे ही कई और देशों की अर्थव्यवस्था ऐसी ही किसी और चीज पर निर्भर करती है.

भारत में उगने वाला अनाज एंव अन्य प्राकृतिक चीजें अन्य देशों में बेची जाती हैं, जिससे मुनाफा आता है. अगर बात खाड़ी देशों की करें तो अधिकांश यह देश तेल पर निर्भर हैं. सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश वहां निकलने वाले पेट्रोल को अन्य देशों को ऊंचे दामों पर बेच कर मुनाफा कमाते हैं.

दुनिया में कई देश ऐसे भी हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था टूरिज़्म पर निर्भर है.

किसी भी देश का आर्थिक विकास इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह एक निर्धारित समय अवधि के भीतर माल और सेवाओं का कितना उत्पादन करता है. हालांकि, कई बार कुछ गलत फैसलों और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होने के कारण कई देशों को दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संकट से गुज़रना पड़ा है.

यह वित्तीय संकट इन देशों के लिए एक बुरा सपना साबित हुए हैं. इन देशों में आए वित्तीय संकट के कारण हज़ारों लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ी और लाखों लोगों के कारोबार चौपट हो गए.

तो आईये जानते हैं दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संकटों के बारे में-

जब इंग्लैंड में गहराया क्रेडिट संकट

क्रेडिट संकट की शुरुआत इंग्लैंड के लंदन से हुई थी. कुछ ही दिनों में अर्थव्यवस्था पर यह संकट इतना गहराया कि पूरे यूरोप में इसका असर दिखने लगा. साल 1760 के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य ने दूसरे देशों में अपने व्यापार के ज़रिये काफी धन जमा कर लिया था.

ब्रिटिशर्स पूरे यूरोप में व्यापार करने के लिये जाते थे. ब्रिटिशर्स की ओर से काफी संख्या में धन जमा करने से लंदन के बैंको में क्रेडिट संकट गहराने लगा. इसके साथ ही उस दौरान कई बड़े व्यापारियों ने बैंक से कर्ज़ ले रखा था.

जब बैंकों ने इन व्यापारियों पर कर्ज़ चुकाने का दबाव डाला तो वह इससे बचने के लिए फ्रांस भाग गये. डिफॉल्टर्स के भागने की खबर पूरे इंग्लैंड में तेज़ी से फैल गई,  जिसके बाद ब्रिटिर्श बैंक के बाहर कैश निकालने के लिए लोगों की लंबी कतारें लग गईं. वहीं बैंक में कैश नहीं होने के कारण बैंकों को अपने शटर गिराने पड़े.

देखते ही देखते मुद्रा का संकट पूरे यूरोप में फैलने लगा.

क्रेडिट संकट तेजी से स्कॉटलैंड, नीदरलैंड, यूरोप के अन्य हिस्सों तक में फैल गया था.

Biggest Financial Crisis In The World (Pic: businessinsider)

अमेरिका हुआ ‘दी ग्रेट डिप्रेशन’

अमेरिका को आज भले ही दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक विकास प्रगतिशील देश माना जाता है. भले ही आज इंटरनेश्नल मार्केट में लिए गए अमेरिका देश के फैसले सभी देशों को प्रभावित करते हों. मगर इतिहास के पन्नों को पलटने से पता चलता है कि वित्तीय संकट से यह देश भी अछूता नहीं रहा है.

अमेरिका ने अपने शुरुआती दौर में सबसे बड़ा वित्तीस संकट देखा था. साल 1929 में अमेरिका इस संकट से जूझा था. हैरानी की बात तो यह है कि यह संकट 1929 से 1939 तक चला था. तब अर्थशास्त्रियों ने इसे ‘दी ग्रेट डिप्रेशन’ का नाम दिया था. अमेरिका के सबसे बड़े स्टॉक मार्केट वॉल स्ट्रीट के शेयर गिरने से यह वित्तीय संकट आया था.

अमेरिका का स्टॉक मार्केट बुरी तरह से नीचे आ गया था. देश के सभी क्षेत्रों में नौकरियों का अकाल पड़ गया था. आज अमेरिका दुनिया भर में सबसे ज़्यादा नौकरी देने के लिये जाना जाता है, लेकिन तब अमेरिका में बेरोजगारी की दर 25 फीसद हो गई थी.

तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूज़वेल्ट ने देश को इस दी ग्रेट डिप्रेशन से निकलने में अहम भूमिका निभाई थी.

Franklin Delano Roosevelt (PIc: pinterest)

‘ओपेक ऑयल प्राइस शॉक’

तेल हर देश की ज़रुरत बन चुका है, जितनी तेज़ी से ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का विस्तार हो रहा है. उतनी ही तेजी से पेट्रोल की ज़रूरत भी बढ़ती जा रही है. यही प्रमुख कारण है कि पेट्रोल के दाम बढ़ते जा रहे हैं.

हर देश के लिए पेट्रोल सबसे कीमती चीज़ बनता जा रहा है. साल 1973 में कई देशों में पेट्रोल का संकट गहरा गया था. जब ओपेक पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ने अमेरिका को पेट्रोल देने से मना कर दिया था.

सभी अरब देशों ने अमेरिका को पेट्रोल देने से इंकार कर दिया था. चौथे अरब इज़राइल युद्ध में अमेरिकी सरकार इज़राइली सेना को हथियार सप्लाई कर रही थी. जबकि अरब देश अमेरिका को कई सालों से पेट्रोल देते आ रहे थे.

अमेरिका को अरब देशों के खिलाफ इज़रायली सेना को हथियार सप्लाई करना महंगा पड़ा. जिसके बाद सभी अरब देशों ने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोलते हुये पेट्रोल देने से इंकार कर दिया.

कुछ ही दिनों में अमेरिका में पट्रोल का अकाल पड़ गया और अमेरिका की अर्थव्यवस्था चौपट होने लगी. ओपेक ऑयल प्राइस शॉक का असर अन्य विकसित देशों पर भी पड़ा. इस दौरान अमेरिका में तेल के दाम काफी बढ़ गये थे.

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस तेल संकट के बाद ही अरब देशों को अपनी ताकत का अंदाज़ा हुआ.

इससे पहले यूरोपियन देश बेहद सस्ते दामों पर अरब देशों से तेल खरीददते थे. हालांकि, इस संकट के बाद अरब देशों ने मुंह मांगे दामों पर तेल इन देशों को बेचना शुरु किया था.

ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस

इस क्राइसिस को 21वीं सदी का सबसे बड़ा संकट माना जाता है. ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस को वित्तीय संकट के नाम से भी जाना जाता है. इस वित्तीय संकट की शुरुआत साल 2007 में अमेरिका में हुई थी.

यह वित्तीय संकट 2008 तक रहा. ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों के कारण हुआ था. लोन देने के लिए बड़ी कंपनियों पर से कुछ कड़े नियम और शर्तें हटाने के बाद बैंको को इस समस्या से जूझना पड़ा.

बड़ी कंपनियां बैंकों से लोन लेने के बाद उन्हें समय पर चुका नहीं पा रही थीं, जिसको देखते हुये बाद में बैंकों ने ब्याज दर बढ़ा दी थी. नजीता यह रहा कि आम लोगों के लिए भी बैंक से लोन लेना काफी महंगा हो गया था.

लोग किसी भी चीज़ को खरीदने के लिए बैंक से लोन लेते तो उन्हें उस चीज़ की कीमत से अधिक बैंक को ब्याज के रूप में पैसा लौटाना पड़ता. इसके बाद हालत तब और बिगड़ गये जब बैंकों ने लोगों को लोन देने से मना कर दिया. इससे वित्तीय संकट पैदा हो गया जिसने ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस हुआ.

इस वित्तीय संकट के कारण कई बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोगों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ी. असल में अधिकांश बड़ी कंपनियां बैंकों पर ही निर्भर थीं. ऐसे में जब बैंक से लोन मिलना बंद हुआ तो कंपनियों ने नौकरियों में छटनी करना शुरु कर दी थी.

Biggest Financial Crisis In The World (Pic: freeonlineusers)

पैसा दुनिया को चलाता है. यह बात कहीं न कहीं सही भी है. पैसों के कारण दुनिया में कितनी परेशानियां हो सकती हैं यह इन क्राइसिस के बारे में जानने के बाद पता चलता है.

वित्तीय संकट के बारे में जानकर आपको कैसा लगा, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.

Web Title: Biggest Financial Crisis In The World, Hindi Article

Featured Image Credit: information-age