जब कभी सरहद पर लड़ाई के दौरान हमारे जवानों की मौत की खबर आती है तो शायद ही कोई शख्स ऐसा होता होगा, जिसके मन में दुःख की लहर न उठती हो. हमारी रक्षा के लिए गोली खाने वाले उन सिपाहियों के लिए हमारे दिलों में अलग ही प्यार और गर्व होता है.

ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर देश के नागरिक के साथ होता है. एक सिपाही जिस बहादुरी और साहस का परिचय देते हुए अपने देश के गौरव की रक्षा करता है, उसका हर कोई कायल होता है.

तो आईये आज अमेरिका के उन 8 सिपाहियों की शौर्य गाथा को जानते हैं, जिन्होंने बेनग़ाज़ी शहर में हुए आतंकी हमले में सैकड़ों आतंकियों का मजबूती के साथ सामना किया था:

अमेरिका के ‘एम्बेसडर’ थे निशाने पर

साल 2012 में अमेरिकी एम्बेसडर क्रिस्टोफर स्टीवंस और विदेशी सेवा विभाग के अधिकारी सीन स्मिथ लीबिया में आधुनिक अस्पताल बनाने के प्रस्ताव को लेकर लीबिया सरकार से विचार विमर्श करने गए थे. इस दौरान उन्हें बेनग़ाज़ी शहर के एक कंपाउंड में लीबिया फोर्स की निगरानी में रखा गया था.

11 सितम्बर की शाम करीब 9 बजे सीसीटीवी में कंपाउंड के गेट के बाहर कुछ हलचल देखी गई. करीब 40 मिनट के बाद अंसर अल शरिया संगठन के ढेरों आतंकी गेट के बाहर एकजुट हो गए. उन्होंने कंपाउंड में एक-एक करके कई हैंड ग्रेनेड फेंकने शुरु कर दिए. रास्ता खाली देखते हुए फिर वह गोलियां चलाते हुए कंपाउंड के अंदर भी दाखिल हो गए.

पलक झपकते ही उन्होंने कंपाउंड में मौजूद लीबिया फोर्स के जवानों को मार गिराया. इसके बाद वह तेजी से एम्बेसडर की तलाश में आगे बढ़े.

Christopher Stevens (Pic: nationalreview)

वक्त पर नहीं पहुंची मदद क्योंकि…

यह देख कंपाउंड की ईमारत ‘सेफ हेवन’ में छिपे एम्बेसडर स्टीवन, स्मिथ और डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी सर्विस एजेंट स्काउट स्ट्रिकलैंड घबरा गए. वह वहां से निकलने के बारे में सोचते उससे पहले आतंकी वहां पहुंच गये. एम्बेसडर के लिए अच्छी बात यह थी कि आतंकी और उनके बीच एक मजबूत दरवाजा था.

इसका फायदा उठाते हुए वह किसी तरह से करीबन एक मील की दूरी पर मौजूद सीआईए एनेक्स हेडक्वार्टर तक इस आतंकी हमले की सूचना पहुंचाने में सफल रहे. एनेक्स सिक्योरिटी टीम देरी न करते हुए एम्बेसडर की मदद के लिए जाना चाहते थे, मगर सीआईए एनेक्स चीफ ने उन्हें जाने की इजाज़त नहीं दी.

जब धूं-धूं कर जलने लगी ‘सेफ हेवन’

दूसरी तरफ आतंकवादी एम्बेसडर लगातार उस दरवाजे को तोड़ने की कोशिश में लगे थे, जिसके पीछे एम्बेसडर छिपे थे. बहुत देर मेहनत करने के बाद भी जब उन्हें सफलता नहीं मिली तो उन्होंने पूरी ईमारत को आग लगा दी. असल में वह किसी भी कीमत पर एम्बेसडर को मारने के लिए आए थे.

सेफ हेवन को आग की लपटों में देख एनेक्स टीम के कप्तान टाइरॉन रॉन वुड्स ने अपने साथियों के साथ सेफ हेवन जाने का फैसला लिया. इस बार भी उनके चीफ ने उन्हें जाने से माना किया, लेकिन वह नहीं माने. वह आग के बीच एनेक्स टीम के साथ ईमारत में घुसने में कामयाब रहे. उन्होंने वहां एम्बेसडर को खोजना चाहा, लेकिन उन्हें सिर्फ स्मिथ और स्काउट ही मिले. स्मिथ की धुएं में दम घुटने से मौत हो गई थी. इसके बाद जैसे-तैसे एनेक्स टीम वापिस हेडक्वार्टर पहुंची.

अब तक उन्हें अंदाज़ा हो चुका था कि आतंकियों का अगला निशाना एनेक्स हेडक्वार्टर में मौजूद 35 अमरीकी हो सकते थे. टाइरॉन की टीम इसके लिए तैयार थे. उनका अंदाजा सही था. कुछ ही देर बाद आतंकियों ने हेडक्वार्टर पर हमला कर दिया. एक तरफ सैकड़ों आतंकी थे, दूसरी तरफ अमेरिका के सिर्फ 8 जवान!

Fire in Heven (Pic: edition.cnn)

13 घंटों तक आतंकी आगे नहीं बढ़ सके…

13 घंटों तक लगातार दोनों के बीच गोलियां चली. सुबह के करीबन 3.30 बजे सीआईए की एक अन्य टुकड़ी उनकी मदद के लिए पहुंची. अमेरिकी सैनिक यह देखकर खुश थे. तभी आतंकियों ने एक के बाद एक कई मोर्टार फायर दागने शुरु कर दिये. इस हमले में सीआईए के आला अफसरों समेत कई जवानों की मौत हो गई, जबकि दर्जनों सिपाही घायल हो गए.

मामला बिगड़ते देख अमेरिका के निरंतर दबाव के चलते लीबिया फोर्स मदद के लिए एनेक्स क्वार्टर पहुंची. उनके लिए भी आंतकियों का सामना करना आसान नहीं था. बावजूद इसके वह आतंकियों को मार गिराने में कामयाब रहे. स्थिति काबू में आते ही सबसे पहले एनेक्स हेडक्वार्टर में मौजूद सभी अमेरिकी लोगों को सुरक्षित एयरपोर्ट पहुंचाया गया.

अमेरिकी एम्बेसडर की मौत का रहस्य

मिशन खत्म हो चुका था, लेकिन किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अमेरिका के एम्बेसडर की मौत कैसे हुई? वह रहस्य बने हुए थे. उनकी लाश तक मौके पर नहीं मिली थी. लगातार उनकी खोज की जा रही थी. इसी दौरान एक दिन उनका शव लीबिया के एक अस्पताल से बरामद किया गया था. हालांकि, शुरु में उनको पहचानना संदेहयुक्त था.

शव इस तरह खराब कर दिया गया था कि उन्हें पहचानना मुश्किल था. साफ नज़र आ रहा था कि उन्हें मारने से पहले बहुत यातनाएं दी गईं थीं. उनकी आखिरी एक तस्वीर जारी की गई थी, जिसमें उनके माथे पर एक गहरी चोट का निशान था.

मामले की नजाकत को समझते हुए अमरीकी एजेंसी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट जारी नहीं की थी. इस वजह से यह सवाल स्टीव के साथ ही चला गया कि उनकी मौत आखिर आतंकी हमले में ही हुई थी या फिर बाद में वह कही बंधक बनाकर रखे गये थे.

इस हमले पर बन चुकीं हैं फिल्में

2014 के आसपास इस हमले को गंभीरता से लेते हुए मशहूर लेखक ‘मिचेल ज़कॉफ़’ ने इस घटना पर एक किताब लिखी थी. उनकी इस किताब का शीर्षक ‘13 हॉर्स’ था. उनकी किताब आने के तकरीबन एक साल बाद इस पर आधारित एक फिल्म भी बनाई गई. दिलचस्प बात तो यह थी इस फिल्म का नाम भी ‘13 हॉर्स’ ही रखा गया था. इस फिल्म की खास बात तो यह थी कि इसकी कहानी ज्यादातर असली घटना के मुताबिक ही बनाई गई थी.

David, John, Pablo in 13 Hours (Pic: slate)

यह थी बेनग़ाज़ी अटैक के दौरान अमेरिका के सिपाहियोंं की दास्तां, जो उनकी वीरता, देश प्रेम और निडरता को प्रमाणित करती है. अपने देश के लोगों की सुरक्षा के लिए आगे बढ़ने वाले उन अमेरिकी सिपाहियों के जज्बे को सलाम.

Web Title: Bravery Story of the Benghazi Soldiers, Hindi Article

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