जंग शुरू तो बातों से होती है पर खत्म बारूद के ढ़ेर पर होती है.

शांति की बातें करने वाला हर देश अपने यहां हथियारों का जखीरा रखता है. दुनिया पहला और दूसरा विश्वयुद्ध देख चुकी है. हिरोशिमा—नागासाकी की भयावहता आज भी रूह कंपा देती है.

दुनिया भर में बढ़ती इन लड़ाइयों ने हथियारों को विकसित कर दिया जिसमें मिसाइल भी शामिल है.

बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि जर्मनी युद्ध विकास की पाठशाला रहा है. इस पाठशाला की पहली क्लास थी ‘पेनमुंडे’. जी हां, दुनिया को रॉकेट और मिसाइलों की तकनीक से परिचित करवाने वाला छोटा सा गांव… जिसे कभी हिटलर ने कोई खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन जब वो जंग हारा तो इसी गांव से माफी मांगी.

चलिए जानते हैं दुनिया को पहली मिसाइल देने वाले गांव की कहानी—

पर्यटकों का गांव बना मिसाइल की फैक्ट्री!

‘पेनमुंडे’ जर्मनी का एक छोटा सा गांव है. जर्मनी के यूसडम द्वीप में पेन नदी के मुहाने पर स्थित इस गांव से पेन नदी को बाल्टिक सागर में गिरते देखा जा सकता था. इस मनोरम दृश्य को देखने के लिए लोग दूर—देश से आया करते थे.

इस गांव की आय का साधन यहां का पर्यटन ही था. यूसडम द्वीप पर प्रशिया के राजशाही परिवार छुटि्टयां मनाने आते थे. कई सालों तक यह गाँव इसी तरह से अपना जीवन चला रहा था मगर थोड़े ही समय में सब कुछ बदल गया.

पहले विश्व युद्ध के बाद से जर्मनी की छवि पर बुरा असर पड़ा और परिणाम स्वरूप ‘पेनमुंडे’ वीरान हो गया. रातों-रात यहाँ पर सारा पर्यटन का व्यापार ख़त्म हो गया. कोई भी सैलानी जर्मनी नहीं जाना चाहता था.

1934 में नाज़ी सरकार अपने बेहद ‘ख़ुफ़िया मिशन’ का अड्डा बनाने के लिए एक वीरान जगह की तलाश में थी. यह मिशन था मिसाइलों का गुपचुप निर्माण और परीक्षण करना. 1935 में जर्मन इंजीनियर वर्नहर वॉन ब्रॉन ने पेनमुंडे गांव को मिसाइल के कारखाने के लिए एकदम उपयुक्त पाया.

इस गांव के आसपास का अधिकतम क्षेत्र सुनसान था, जहां मिसाइल परीक्षण करना आसान था. किस को भनक तक नहीं लगाती कि जर्मनी आखिर क्या कर रहा है. नाजी सरकार अपने भविष्य के लिए इस गाँव में एक बहुत बड़ा कारखाना बनाने वाले थे.

कारखाने और मशीनों के निर्माण के लिए क़रीब 12 हज़ार लोगों ने यहां दिन-रात काम किया. इन लोगों में अधिकांश प्रथम विश्व युद्ध के बंदी और यहूदी थे. एक बहुत बड़े एरिया में फैक्ट्री बनाने का काम शुरू किया गया और बाकी बची जगह को रॉकेट परीक्षण के लिए बचा दिया गया.

Peenemünde, German (Pic: idntimes)

हिटलर को मनाना था मुश्किल…

हिटलर ने 1939 में युद्ध का एलान किया तो, पेनमुंडे का कारखाना अधूरा ही था. यहाँ औजारों और मशीनों के निर्माण के लिए पैसों की जरूरत थी, लेकिन हिटलर के लिए इन सबसे ज्यादा जरूरी जंग जीतना था.

उसे यकीन था कि उसके सैनिक ही जंग जीतने के लिए काफी होंगे और उन्हें किसी रॉकेट या मिसाइल की जरूरत नहीं है. इसलिए जो पैसा ‘पेनमुंडे’ की मिसाइल फैक्ट्री पर खर्च होना था, वह जंग में हुआ. इसका परिणाम यह हुआ कि मिसाइल बनाने का काम एक दम से धीरे हो गया.

कम संसाधनों के बाद भी वैज्ञानिक वाल्टर डॉर्नबर्गर और वर्नहर वॉन ब्रॉन ने इंजीनियर्स की टीम तैयार की और मिसाइल बनाने का काम जारी रखा. 1942 में वाल्टर ने जर्मनी के रॉकेटर एग्रीगेट 4 (A-4) का कामयाब परीक्षण किया. ये दुनिया का पहला लंबी दूरी तक मार करने वाला रॉकेट था.

दोनों वैज्ञानिकों को यकीन था कि यह मिसाइल दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी को जीत दिलवा सकती है. जर्मनी में नए हथियारों का विकास करने वाले अल्बर्ट स्पीर भी इस बात से सहमत थे, पर हिटलर को इसमें खास रूचि नहीं थी. इसके बाद दोनों वैज्ञानिकों ने सफल परीक्षण की एक फिल्म तैयार करवाई और उसे हिटलर को दिखाया.

फिल्म देखने के बाद हिटलर ने इस मिसाइल के निर्माण को हरी झंडी दी, लेकिन तब तक युद्ध के मोर्चे पर बहुत देर हो चुकी थी. जर्मन फ़ौजें कई मोर्चों पर हार रही थीं. हिटलर ने काम में तेजी लाने के लिए यूरोप के अलग—अलग देशों से लाए गए यहूदी युद्धबंदियों को इस कारखाने में लगा दिया.

German Rocket  (Pic: ww2today)

ब्रिटिश ख़ुफिया एजेंसियों को लगी भनक

‘पेनमुंडे’ वीरान इलाका था. यहां संसाधनों की कमी थी, इसलिए आवाजाही भी कम थी. नाजी सरकार के ख़ुफिया मिशन को यहां सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा रहा था. हालंकि 1943 में ब्रिटिश ख़ुफिया एजेंसियों को ‘पेनमुंडे’ में चल रहे मिसाइल निर्माण की खबर लग गई.

17 अगस्त 1943 को ब्रिटिश रॉयल एयरफ़ोर्स ने उस वक्त का सबसे बड़ा हमला ‘पेनमुंडे’ पर किया. इस हमले को ‘ऑपरेशन हाइड्रा‘ के नाम से जाना गया. इस हमले का एक ही मकसद था जर्मन रॉकेट के निर्माण को रोकना. उन्होंने बहुत बड़ी मात्रा में हवाई हमले किए.

हालांकि यह हमला नाकाम रहा और मिसाइल कारखाने को कोई खास नुकसान नहीं हुआ.

अब तक ब्रिटिश लोगों को इस जगह के बारे में पता चल गया था इसलिए इस फैक्ट्री की जगह को आगे चलकर बदल दिया गया. इसके बाद इसे मध्य जर्मनी के मिटेलवर्क में शिफ्ट किया गया.

वहां पर इस काम को फिर से शुरू किया गया मगर धीरे-धीरे जर्मनी हारने की कगार पर पहुँच गया था. उनके पास संसाधन और पैसे दोनों ही नहीं थे कुछ निर्माण करने के लिए. मजबूरन एक बार फिर से रॉकेट बनाने के इस काम को रोकना पड़ा.

Rocket Making (Pic: wikipedia)

नासा से जुड़ गए वैज्ञानिक…

जंग हारने के बाद जर्मनी में कुछ भी नहीं बचा था. वॉन ब्रॉन के लिए वहां कुछ भी खास करने के लिए नहीं था. उनके पास रॉकेट साइंस की बहुत जानकारी थी जिसे बाकी देश चाहते थे कि वह उनके साथ भी साझा करें.

वॉन ब्रॉन को अमेरिका ने नागरिकता दी और फिर वह नासा के साथ काम करने लगे. नासा के साथ मिलकर उन्होंने कई सारी घातक मिसाइल और स्पेस शटल पर काम किया. रॉकेट के बारे में जो उन्हें ज्ञान तो उसका जर्मनी तो फायदा नहीं उठा पाया मगर अमेरिका ने उसका खूब फायदा उठाया.

उन्होंनेे ही नासा में ‘अपोलो मिशन‘ की नींव रखी जिसके बाद इंसान का चांद पर जाना संभव हुआ.

‘पेनमुंडे’ में हुई रिसर्च की बुनियाद पर आगे चलकर इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें विकसित की गईं. इसके जरिए अंतरिक्ष में सैटेलाइट लांच करने के लिए रॉकेट बनाए गए. ‘पेनमुंडे’ में किए गए रिसर्च के पेपर्स अन्य देशों के वैज्ञानिकों ने भी पढ़े और उनसे सबक लिया.

Wernher von Braun (Pic: wikipedia)

वॉन ब्रॉन की उस खोज ने मानव का जीवन बदल दिया. रॉकेट के आने के बाद से ही दुनिया उन्नति करती गई. सेटेलाइट बनी जिससे बाद में संचार के माध्यम बने. हर जगह रॉकेट ने अच्छे काम ही किए. वहीं अगर यह रॉकेट की को हिटलर के राज में सफलता मिल जाती तो शायद आज दुनिया कुछ और ही होती.

इस अद्भूत खोज के बारे में आप अपने विचार कमेन्ट-बॉक्स में अवश्य बताएं.

Web Title: First Rocket Made By German Used By America, Hindi Article

Featured Image Credit: pexels