पक्षी इंसानों से ज्यादा आजाद हैं. कम से कम वे सरहदों में तो नहीं बंधे हैं. वे धर्म-जाति और रंगों में नहीं बंटे हैं. यहां तक कि उन्होंने अपनी बोली भाषा को भी नहीं बदला है. वहीं दूसरी ओर मानव नित दिन नए बदलाव करने में यकीन रखता है. पिछले कुछ दशकों से बदलावों का ऐसा दौर चला है कि हम अपनी कई ऐतिहासिक विरासतें खोने की कगार पर पहुंच गए हैं.

इन्हीं विरासतों में एक है 'पक्षी भाषा संवाद' यानि ' बर्थ लैंग्वेज'. यह भाषा का वो हिस्सा है, जो मनुष्यों का पक्षियों से रिश्ता जोड़ता है. हालांकि आज के संदर्भ में लोग इसे पागलपन ही कहेंगे पर क्या आप जानते हैं कि इसी पागलपन के लिए टर्की का गिरेसुन प्रांत ख्याति प्राप्त कर चुका है. उसे यूनेस्को ने कल्चर हैरीटेज की सूची में शामिल कर​ दिया है.

खास बात यह है कि यह दुनिया का इकलौता ऐसा प्रांत है, जहां के अधिकांश गांव वाले पक्षियों की भाषा समझते और बोलते हैं. यानि वे चिड़िया से बात करने के लिए चीं-चीं और कबूतर से हाल चाल लेने के लिए गुंटर गूं कर सकते हैं.

तो चलिए आज इस अनोखे गांव से आपका परिचय करवाते हैं और समझने की कोशिश करते हैं 'बर्थ लैंग्वेज' का इतिहास—

आदिमानव इस्तेमाल करते थे 'बर्ड लैंग्वेज'

टर्की में गिरेसुन प्रांत है, जहां दर्जनभर से ज्यादा ऐसे गांव हैं, जिनके ग्रामीण पक्षियों की भाषा समझते हैं. आम बोलचाल में उसका उपयोग भी करते हैं. आमतौर पर विरासत को सहेजे रखने का दवाब बुजुर्गों पर आता है, लेकिन यहां की सबसे अच्छी बात यह है कि गांव की हर पीढ़ी, चाहे वह बुजुर्ग हो, या कोई बच्चा. सब पक्षियों की भाषा में संवाद करने का हुनर रखते हैं.

10 हजार की आबादी वाले इस पहाड़ी इलाके को यूनेस्को ने कल्चर हैरिटेज की सूची में शामिल किया है. यह वहां के रहने वालों के लिए किसी गर्व से कम नहीं हैं. क्योंकि वे ​दुनिया में अकेले ही हैं, जिनसे पक्षी भी अपने राज नहीं छिपा सकते.

People Speak Bird Language (Pic: actualite)

मुश्किलों में फंसे लोग भाषा के कारण है जिंदा

अब सवाल आता है कि पक्षियों से संवाद करने के इस हुनर को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है? तो आपको बता दें कि इसका इतिहास से गहरा संबंध है. कहा जाता है कि बर्थ लैंग्वेज का इस्तेमाल तब किया जाता था, जब मनुष्यों में भाषा का विस्तार नहीं हुआ था. भाषा विज्ञान के अंर्तगत कहा जाता है कि आदिमानवों को जब एक दूसरे से संवाद की जरूरत हुई. 

बस तब उनके पास आवाज तो थी, लेकिन शब्द नहीं थे. इसलिए वे अपने आसपास के पक्षियों और पशुओं के जैसी आवाजे संकेत के रूप में इस्तेमाल करने लगे.  इससे बहुत ज्यादा तो नहीं, पर वे कुछ हद तक अपनी भावनाएं एक-दूसरे तक पहुंचाने में सफल हुए.

टर्की के ओट्टोमेन एम्पायर के इतिहासकार बताते हैं कि प्रांत में करीब 500 साल से बर्थ लैंग्वेज का उपयोग किया जा रहा है. नई पीढ़ियों ने अंग्रेजी और तुर्की भाषा के अलावा बर्थ लैंग्वेज को भी सीखा है, जिससे यह एक प्रथा की तरह सालों से संरक्षित है.

यहां बोले जाने वाली बर्थ लैंग्वेज की खास बात यह है कि इस भाषा में एक भी शब्द नहीं है, बल्कि केवल तरह-तरह की सीटियां हैं. ये सीटियां आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में रहने वाले पक्षियों की आवाज का रूपांतरण है.

यदि एक ही समय पर कोई पक्षी और मनुष्य आवाज निकाले तो बाहरी लोग दोनों के बीच अंतर नहीं कर सकते. इस क्षेत्र में बर्थ लैंग्वेज का विकास एक दूसरे को संदेश पहुंचाने के लिए किया गया था.

इतिहासकार कहते हैं कि पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां के लोगों को खराब मौसम का सामना करना पड़ता था. कई बार भूस्खलन, भारी बारिश के बीच लोग जंगलों में फंस जाते थे. यहां मोबाइल के नेटवर्क भी ठीक से काम नहीं करते.

ऐसे में बर्थ लैंग्वेज ही एक मात्र सहारा है. पहाड़ी इलाके में निकलती तरह-तरह की सीटियों की आवाज चारों ओर गूंजती है. जिसे दूर बैठा व्यक्ति सुन पाता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि इस हुनर की मदद से कई बार वे ​मुश्किलों से बाहर आए हैं.

Try to Save Languages (Pic: actualite)

बच्चे स्कूल में सीख रहें यह खास भाषा

बर्ड लैंग्वेज बोलने वाले लोग अपने इस हुनर को आने वाली पीढ़ी को विरासत के रूप में सौंपना चाहते हैं.

पिछले कुछ समय में जब से टर्की के ब्लैक सी समेत अन्य क्षेत्रों में मोबाइल फोन का इस्तेमाल शुरू हुआ है, तब से स्कूली बच्चों ने बर्ड लैंग्वेज में रूचि लेना बंद कर दिया है. इसके बाद सरकार ने स्कूलों में बर्ड लैंग्वेज की शिक्षा अनिवार्य कर दी है.

यानि, अब प्रांत का हर बच्चा न केवल बर्ड लैंग्वेज समझेगा, बल्कि बोल भी पा रहा है. स्कूलों में कोर्स खत्म होने पर बर्ड लैंग्वेज की परीक्षा भी होती है, जिसके प्रेक्टिकल एग्जाम को पास करने वाले बच्चे को सरकार द्वारा स्कॉलरशिप दी जाती है.

कुल मिलाकर इस क्षेत्र में बर्ड लैंग्वेज बोलना गर्व की बात मानी जाती है. इसकी एक वजह यह है कि लोगों ने मोबाइल जैसी सुविधाओं को अपनाया है. पर उसके लिए अपनी विरासत को नहीं खोया. आज की तारीख में यहां बर्ड लैंग्वेज बोलने वाले 10 हजार लोग हैं. जबकि, नए सत्र में करीब 20 हजार से ज्यादा बच्चे बर्ड लैंग्वेज की पढ़ाई कर रहे हैं.

इसका एक अच्छा परिणाम यह है कि बच्चों में प​क्षी विज्ञान के प्रति जागरुकता आ रही है.

वे ऐसे विषयों का चुनाव कर रहे हैं, जिनके जरिए प्रकृति को बचाया जा सके. वहीं दूसरी ओर गांव के लोग आम बोल-चाल में शब्दों से ज्यादा सीटियों का प्रयोग कर रहे हैं. उनका यह तरीका टर्की आने वाले पर्यटकों को भी लुभा रहा है. 

यूनेस्को के अनुसार यहां हर साल 600 से ज्यादा विदेशी पर्यटक बर्ड लैंग्वेज समझने और सुनने के लिए आते हैं. सरकार प्रयास कर रही है कि अपने देश के इस विरासत को एक शिक्षण संस्थान का नाम दे दिया जाए, जहां पक्षी विज्ञानी आकर सबसे पहले उनकी भाषा को समझ सकें.

People Talking to Birds (Pic: Howcast)

ऐसा नहीं है कि केवल टर्की बर्ड लैंग्वेज में महारत हासिल किए हुए है बल्कि भारत का पौराणिक इतिहास भी पक्षियों से संवाद की कई घटनाओं की पुष्टि करता है. जैसे रामायण की कथा काकभुशुण्डि नाम के कौवे ने ऋषी-मुनियों को सुनाई थी.

ऐसे ही महाभारत की कथा शुकदेव (तोते) ने राजा परीक्षित को सुनाई. रामायण में राम-गरुण संवाद को कौन भूल सकता है! इन सबका अर्थ यही है कि हमारे यहां भी पक्षियों से संवाद करना और उनकी भाषा को समझता जाता रहा है.

बहरहाल आ यह काम नामुमकिन सा हो गया है.

पक्षी तो आज भी बोल रहे हैं, शायद वे हमारी ही बातें कर रहे हों पर केवल हम हैं जो उन्हें समझ नहीं रहे.​ विज्ञान भी मानता है कि प्रकृति में होने वाली हलचल के बारे में इंसानों से पहले पक्षियों की अंदाजा हो जाता है. वे अपनी भाषा में उसे एक-दूसरे तक पहुंचाते भी हैं. पर जरा सोचिए कि यदि हम उनकी भाषा समझ पाते तो क्या कई बड़ी मुश्किलों से बचा नहीं जा सकता?

Web Title: Geersun: The Unique Province That Communicates in the Language of Birds, Hindi Article

Feature Image Credit: Simon