विश्व की कई प्राचीन सभ्यताओं के बारे में अक्सर पढ़ने को मिलता है, जिसमें से कुछ के बारे में आप पहले से ही जानते होंगे. फिर चाहे वह मैसोपोटामिया हो, हड़प्पा हो या फिर सिंधु घाटी सभ्यता हो.

ऐसे ही इतिहास में तुर्की की जमीन पर कई सभ्यताएं पली बढ़ी, जिसमें से कई सभ्यताएं समय के साथ खत्म भी हो गईं. उनमें से ही एक है मिदास सिविलाइजेशन.

तुर्की के याजीलिकाया में बसा मिदास शहर आज अपने नाम और यहां बचे खंडहरों के कारण अमर है. यहां का एक प्रसिद्ध शिलालेख ‘सोने के हाथ‘ वाले राजा को समर्पित है,  जिसके बारे में कहा जाता है कि वह जिस चीज को छू देता था, वह सोने में बदल जाती थी.

मिदास अपने अंदर ऐसी कई कहानियां सजोए हुए है!

ऐसे में मिदास सभ्यता को जानना दिलचस्प हो जाता है–

‘मिदास’ से जुड़ी दिलचस्प कहानी

मिदास फ्रिजिअन काल के पुरातात्विक अवशेषों के लिए जाना जाता है, खासकर उस एक शिलालेख के लिए जिस पर ‘मिदास’ का उल्लेख है. कई लोग इसे महान राजा मिदास का मकबरा भी कहते हैं. ऐसी धारणा है कि इस शहर को 8वीं शताब्दी ई. पू. के आसपास फ्रिजियनों द्वारा बसाया गया था, जोकि यहां के मूल निवासी थे.

तब फ्रिजिया का एक पौराणिक राजा हुआ करता था, मिदास. उसके बारे में एक कहानी बहुत चर्चित है. इसके हिसाब से मिदास को वरदान था कि वो जिस किसी वस्तु को छुएगा, वो ठोस सोने में बदल जाएगी. असल में एक दिन वह अपने बगीचे में टहल रहा था, इसी दौरान उसने भगवान डायोनिसस के साथी सिलेनस को पाया.

चूंकि, सिलेनस के साथ उसका व्यवहार अच्छा था, इसलिए डायोनिसस ने राजा को एक वरदान मांगने को कहा. मिदास पहले से ही बहुत अमीर था. उसके पास हद से ज्यादा सोना था, बावजूद इसके वह संतुष्ट न था और उसने वरदान मांगा कि वो जिस किसी वस्तु को छुए वो तुरंत ही सोने में बदल जाए.

भगवान ने उसकी ये इच्छा मंजूर कर ली. वह बात और है कि बहुत जल्द मिदास को मिला वरदान उसके लिए अभिशाप बन गया. वह अब न तो खाना खा पा रहा था और न हीं पानी पी पा रहा था. वह जिसे भी छूता वह सोने का हो जाता. यहां तक कि उसका आरामदायक बिस्तर तक सोने में तब्दील हो चुका था.

ऐसे में वह भूख से मरने की कगार पर पहुंच गया. अब उसे अपनी गलती का ऐहसास हो चुका था. उसने भगवान डायोनिसस से क्षमा याचना करते हुए इस वरदान को वापस लेने की मांग की. डायोनिसस ने उसे माफ करते हुए इस बंधन से मुक्त कर दिया.

राजा मिदास की स्थिति कुछ भारत की पौराणिक कथाओं के खलनायक भस्मासुर जैसी ही थी, जो दुनिया का सबसे ताकतवर राक्षस बनना चाहता था. भस्मासुर को भगवान शिव से किसी के सिर पर हाथ रखकर उसे भस्म करने का वरदान मिला था, जो अंततः उसकी मौत का कारण बना.

खैर, मिदास की कहानी राजा के बंधनमुक्त होने के बाद कुछ यूं आगे बढ़ी-

Apollo and King Midas. (Pic: wikimedia)

राजा मिदास के मकबरे का सच!

यूनान के इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार, फ्राइजियन एनाटोलिया के मूल निवासी नहीं थे, जबकि फ्रिजियन भाषा दक्षिणी बाल्कन प्रायद्वीप के लोगों से संबंधित है. बताया जाता है कि शिलालेख पर खुदा नाम मिदास साइबेले का उपनाम है, जिन्हें फ्रिजिअन की देवी कहा जाता है, इन्हें ईश्वर की माता माना जाता है.

यही नहीं जिस स्मारक को राजा मिदास का मकबरा माना जाता है, वह असल में फ्रिजिअन की देवी का अभ्यारण्य बताया जाता है.

मिदास स्मारक के दक्षिण में स्थित चट्टानों को काटकर बनाया गया कब्रिस्तान भी याजीलिकाया में दिलचस्प है. इस क्षेत्र में कई फ्रिजियन कब्रिस्तान मौजूद हैं.

चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के अंत में इस जगह को अचानक ही लोगों द्वारा छोड़ दिया गया. इसके बाद ये शहर लगभग विलुप्त हो चुका था, जब तक कि इसकी पुनः खोज नहीं हुई. सन 1800 में एक सैन्य मिशन के तहत यहां आए कर्नल विलियम मार्टिन ने ये शहर खोजा था. आगे 19वीं शताब्दी के बाद से याजीलिकाया शहर मिदास सिटी के नाम से जाना जाता है.

Phrygian Mother of the Gods. (Pic: greekmythology)

चट्टान काटकर बनी विचित्र कलाकृति

मिदास सिटी आधुनिक अफोन और एस्कीसेर के नजदीक मध्य अनातोलिया में विशाल पठार पर फैली हुई है. रहस्यमय शहर मिदास के आसपास फ्रिजियन साम्राज्य का विस्तार है, जिसे फ्रिजियन की घाटी कहा जाता है.

यहां सैकड़ों चट्टानों को काटकर बनी कब्रें, सुरंगें, तहखाने और हजारों सीढ़ियां फ्रिजियन की कहानी कहती हैं. यहां की विचित्र आकार की पहाड़ियां, सीढ़ियों और प्राचीन सुरंगें रहस्य पैदा करती हैं. यह शक्ति का एक अलौकिक स्थान माना जाता है, जहां धरती की नब्ज को महसूस किया जा सकता है.

क्लासिकल मायनों में मिदास देवताओं और आत्माओं का निवास स्थान माना जाता है. हालांकि, यहां आज कोई नहीं रहता’ लेकिन यहां के पुराने खंडहरों को देखकर लगता है कि खजाना ढूंढने आए लुटेरों ने इसे पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है.

वैसे, मिदास सिटी को अक्सर किला भी कहा जाता है, लेकिन यहां कोई भी दीवार नहीं है, जो इस किले के दावे को साबित करती हो! ये शहर चट्टानों से बनी अद्भुत आकृतियों से शुरू होकर इन्हीं से बनीं अनंत सुरंगों में जाकर खत्म हो जाता है.

यहां का मुख्य आकर्षण मिदास का मकबरा है, जो देखने कतई नहीं लगता कि यहां कब्रें हो सकती हैं या पहले कभी थीं. ये स्मारक 16 मीटर चौड़ा और 20 मीटर ऊंचाई है, जो एक विशाल चट्टान को काटकर बनाया गया है.

स्मारक में एक बड़े शिलालेख के ऊपर साफ अक्षरों में मिदास लिखा हुआ है. हालांकि, ये स्पष्ट नहीं है कि ये मिदास फ्रिजियन के राजा मिदास हैं या कोई और या उन्हें यहां दफनाया गया था, जैसा कि किंवदंतियां कहती हैं कि ये मिदास का मकबरा है.

Phrygian Church. (Pic: ewpnet)

इस मकबरे के ऊपर पहुंचने पर आप यहां की मुख्य विशेषताओं को देख पाएंगे. यहां सैकड़ों मीटर गहरी सीढ़ियां है, जो चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं. कोई नहीं जानता कि ये कहां जा रही हैं और कितनी गहरी हैं.

ये सीढ़ियां स्पष्ट रूप पुराने रास्तों को बताती हैं, जिनकी प्राचीन शैली में चट्टानों में खुदाई संभवत: हित्तिती या पूर्व हित्तिती काल की है. यहां कई ऐसी सीढ़ियां भी हैं, जो पठार के अंदर तक गहरी सुरंगों की ओर जाती हैं.

ये सुरंगें कारीगरी का उत्तम नमूना मानी जाती हैं. इसमें हित्तिती गेटवे की तरह गुंबददार छत भी है. तुर्की में बहुत सारे भूमिगत शहर हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि मिदास भी उनमें से एक है, जहां के स्मारकों तक गुप्त सुरंगों के माध्यम से पहुंचा जा सके.मिदास शहर आठवीं से सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है. लेकिन ये इससे भी पुराना हो सकता है और शायद यहां के स्मारक कांस्य युगीन भी हो सकते हैं.

यहां बनी चट्टानों को काटकर आकृतियां नवपाषाण काल के स्थलों में पाई जाती हैं. वैज्ञानिक मानते हैं कि शायद सालों तक चली हवाओं और मौसम के कारण यहां की चट्टानों में इस प्रकार की विचित्र आकृतियां बनी हैं.

वहीं फ्रिजियन के लोगों को मानना था कि उनके देवता पहाड़ों के नीचे गहराई में रहते हैं, शायद इसलिए ही मिदास इन लोगों के मूल देश के रूप में आज भी जीवंत शहर है.

Web Title: Midas City: Mysterious Civilization, Hindi Article

Feature Image Credit: brucatosturkey/wikimedia