हर वह इंसान, जो इतिहास में थोड़ी भी रूचि रखता है, उसने मंगोलों के बारे में जरुर सुना होगा. लगभग पूरे विश्व पर अपना खौफ़ कायम करने के उनके किस्से आम हैं.

इनके बारे में पढ़ने, सुनने के बाद हमेशा यह बात ज़ेहन में आती है कि आखिर वह कौन सी ताक़त थी, जिसने मंगोलियों को विश्व के अधिकांश हिस्सों में अनवरत जीत दिलवाई?

ऐसा क्या था कि खानाबदोश कबीले वालों के नाम भर से ही बड़े से बड़ा साम्राज्य थर-थर कांपने लगता था?

आइये इन सवालों के जवाब ढ़ूढ़ने की कोशिश करते हैं–

‘जीतने की चाह’ ने बनाया मजबूत

किसी भी देश या राज्य की ताकत उसके सैन्य बल के आधार पर आंकी जाती है. मंगोलों की सैन्य बल की बात की जाये, तो वह भले ही संख्या में दूसरे राज्यों से कम रहा हो, लेकिन उनके अंदर जीतने की इच्छा हमेशा दिखी. यह मंगोल सेना की सबसे बड़ी शक्ति थी. इसके दम पर मंगोल लगभग पूरे विश्व पर अपना दबदबा बनाने में कामयाब रहे.

मंगोल अपने कबीले के बच्चों को बचपन से ही युद्ध कला का प्रशिक्षण देते थे, ताकि जरुरत पड़ने पर वह दुश्मन से लड़ सकें. इसके अलावा मंगोल सेना की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह हार जाने के बाद भी हार नहीं मानते थे. उन्हें अपनी हार के कारणों को खोजना पसंद था, ताकि वह उनमें सुधार करते हुए दुश्मन पर  फिर से हमला कर सकें.

अपनी इस रणनीति के कारण वह बड़े से बड़े युद्ध को अपने नाम कर लेते थे. 1260 में ऐन जलुत की लड़ाई में हारने के 40 वर्षों बाद, फिर से 1299 में वादी अल ख़ज़ानदार में इजिप्ट माम्लुक्स को बुरी तरह मात देना इसका एक बड़ा उदाहरण है.

Mongol Army Tactics Weapons And Terror (Pic: horsenomads)

‘अनुशासित संगठन’ असल ताकत

मंगोल सभ्यता के अनुसार मजबूत अनुशासन उनके सैन्य बल की रीढ़ की हड्डी थी. इटली के अन्वेषक गिओवानी द पेन डेल कैप्रियन के अनुसार मंगोलियों से ज़्यादा आज्ञाकारी लोग पूरे विश्व भर में कोई नहीं रहा. ये अपने अधिकारियों का इतना सम्मान करते थे कि किसी भी परिस्थिति में उनसे झूठ नहीं बोलते थे.

मंगोलों ने सेना के अधिकारिक पदों की बागडोर को डेसिमल प्रणाली के अधार पर व्यवस्थित किया. इसमें हर अधिकारी की अपनी ज़िम्मेदारी तथा उसका अपना खास उपनाम होता था. सैन्य पदों के उपनाम इस प्रकार थे,

  • 10 सैनिक पर एक अर्बन
  • 100 सैनिकों पर एक जाग
  • 1000 सैनिकों पर एक मिघन
  • 10,000 सैनिकों पर एक ट्युमेन

इसी तरह मंगोल सेना को भी इन्हीं समूहों के अाधार पर व्यवस्थित किया गया. प्रत्येक अधिकारी को अपने उच्च स्तर को रिपोर्ट करने की हिदायत थी. ट्युमेंस और मिघंस की कमान नौयान के हाथ में थी. नौयान वह लोग थे, जिन पर विजयी इलाकों के प्रशासन का कार्यभार था. ये सभी समूह खानों अथवा जनरलों (बॉयन) के अधीन थे.

प्रत्येक पदाधिकारी के पास अपने समूह के सैनिकों को आदेश देने का अधिकार था, जिसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता था. यह सैन्य ढांचा हर परिस्थिति में प्रभावशाली साबित हुआ और जंग में मददगार भी बना. युद्ध के दौरान मंगोल अपनी सेना को 10 या उससे कम की संख्या में बांट देते थे. इनका प्रयोग दुश्मनों पर हमला करने और अपने फंसे हुए सैनिकों की मदद करना होता था.

मंगोल समाज में आम नागरिकों की तरह जीवन यापन करने की कोई भी सुविधा नहीं थी. युद्ध ही इनका मुख्य कार्य था. मंगोल या तो सैनिक होते या फिर सैनिकों के सहायक. वैसे मंगोल सैनिक बनना आसान नहीं था. इसके लिए एक कड़े प्रशिक्षण से होकर गुजरना पड़ता था.

सैन्य क्षमता को बढ़ाने अथवा बड़ी मात्रा में भोजन इकट्ठा करने के लिए मंगोल हर साल एक शिकार स्पर्धा का आयोजन करते थे, जिसे गोरग्न कहा जाता था. इसमें हिस्सा लेने वाले हजारों घुड़सवारों को एक ही क्षेत्र में भेजा जाता और हर घुड़सवार को शिकार के लिए एक ही तीर दिया जाता. इसमें हारने वाले सैनिक का अन्य सैनिकों द्वारा जमकर मज़ाक उड़ाया जाता. ऐसा इसलिए किया जाता है था ताकि, वह अगली बार अपनी पूरी क्षमता के साथ स्पर्धा में हिस्सा लें.

Mongol Army Tactics Weapons And Terror (Pic: pinterest)

छोटे घोड़ों और ‘संयुक्त धनुष’ का बेमिसाल प्रयोग

मोरिस रोसबी के अनुसार मंगोल साम्राज्य का विस्तार इतना अधिक कभी नहीं हो पाता, अगर उनके पास कद में छोटे दिखने वाले बलशाली घोड़े ना होते. मंगोलों ने हमेशा युद्ध में बेहतरीन भूमिका निभाने के लिए अपने घोड़ों की प्रशंसा की. युद्ध के मैदान में ये घोड़े सोच से कहीं ज़्यादा तेज़ थे. अपने लूट अभियान में अपने टारगेट से निकलने में यह घोड़े ही मदद करते थे.

इसके अलावा घुड़सवार धनुर्धारी मंगोल सेना के दूसरे महत्वपूर्ण अंग थे. 13वीं शताब्दी में लेग्निका के युद्ध के दौरान 20,000 मंगोल घुड़सवार तीरंदाजों ने विरोधी सेना के 30,000 घुड़सवारों को मात दे दी थी. मंगोल सेना के इन घुड़सवार धनुर्धारियों सबसे महत्वपूर्ण हथियार उनका संयुक्त धनुष था, जोकि जानवरों की सींगों, स्नायु और लकड़ी से बना होता था.

धनुष का आकार छोटा रखा गया था, जिससे घुड़सवारों को इसका प्रयोग करने में कठिनाई ना हो. इस धनुष से मंगोल सैनिक 200 मीटर तक तीर चला सकते थे. जबकि, आम धनुषों की मारक क्षमता केवल 150 मीटर ही थी.

मजबूत ‘सीक्रेट एजेंट्स’

मंगोलियों के अपने गुप्तचर थे, जो बड़ी सावधानी से दुश्मन द्वारा किए जाने वाले किसी भी हमले का पहले ही पता लगा लेते थे. उदाहरण स्वरूप यूरोप के हमले से पहले मंगोलों ने दस वर्षों तक यूरोप में अपने गुप्तचर भेजे, जिन्होंने पुराने रोम की सड़कों के नक़्शे तैयार किए. व्यापार मार्ग स्थापित किए और दुश्मन की हर सैन्य गतिविधि पर नज़र रखी.

मंगोलों का युद्ध के दौरान मनोवैज्ञानिक हमला करना भी कई बार उनकी जीत का विशेष कारण बना. वे अपने विरोधियों के कस्बों अथवा शहरों में आतंक फैलाते. वे अपने विरोधी को यह कह कर धमकाते कि या तो वह आत्मसमर्पण कर दें नहीं तो उन्हें पूरी तरह नष्ट कर दिया जायेगा. यूं तो वह आत्मसमर्पण करने वाले शहरों पर हमला नहीं करते थे, किन्तु जब मंगोल सेना में संसाधनों की कमी होती, तो वह किसी को नहीं छोड़ते थे.

मंगोल इतने चालाक थे कि जब उन्हें लगता था कि वह अब जंग नहीं जीत पायेंगे तो वह आत्मसमर्पण कर देते. बाद में जब उन्हें मौका मिलता वह अपने दुश्मन को खत्म कर देते.

Changej Khan (Pic: Pinterest)

इन कुछ खूबियों की वजह से मंगोल तेजी से मजबूत हुए और अनगिनत लोगों का खून बहाते हुए विश्व के अधिकांश हिस्सों पर अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहे.

आप क्या सोचते हैं… लगातार जीत हासिल करने के लिए किसी व्यक्ति या संगठन में मंगोलों से क्या सीख ली जा सकती है?

Web Title: Mongol Army Tactics Weapons And Terror, Hindi Article

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