धीरज रखना बेहद ही मुश्किल काम है.

खास कर तब, जब आप किसी चीज के लिए न जाने कब से प्रयास में रहते हैं. उसे पाने की तमाम कोशिशें करने के बाद भी वो आपको न मिल पा रही हो. ऐसे में धीरज रख पाना और भी मुश्किल हो जाता है.

संभव है कि हम कई बार दूसरे रास्तों को चुन लेते हैं.

ऐसा ही कुछ ब्रिटेन में देखने को मिला. बात उन दिनों की है कि जब ब्रिटेन की औरतें सालों से उस पल के इंतजार में थी, जब वहां का पितृसत्तामक समाज उन्हें बराबरी का दर्जा दे. इसके लिए वह प्रयासरत्न भी रहीं.

किन्तु, जब अपने प्रयासों और सब्र का उन्हें कोई परिणाम निकलता न दिखा, तो उन्होंने ब्रिटेन की सत्ता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने वहां की सरकार को उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू किया. 

साथ ही उस सफराजेट्स क्रांति की शुरूआत की, जिसे ब्रिटेन का इतिहास हमेशा याद रखेगा.

तो आईए जानने की कोशिश करते हैं उस पूरे घटनाक्रम को-

'डीड्स नॉट वर्ड्स' के नारे ने उड़ाईं सत्ता की नींद

20वीं शताब्दी में न सिर्फ गुलाम देश के लोग अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे, बल्कि ब्रिटेन की खुद की जमीन पर उसके नागरिक अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे.

ये लड़ाई थी ब्रिटेन की औरतों की, जो वहां की उतनी ही जिम्मेदार नागरिक थी, जितने की मर्द. फिर भी उन्हें समान अधिकार प्राप्त नहीं थे. खास कर वोट करने का अधिकार!

ऐसे में आंदोलनरत औरतों का मानना था कि जब सरकार द्वारा लिए गए फैसले उन्हें भी प्रभावित करते हैं, तो उन्हें उस अधिकार से क्यों वंचित रखा जा रहा है.

यही वजह थी कि वे अपने अधिकारों की मांग के लिए हर मुमकिन रास्ते पर चल पड़ीं. उनका यह रास्ता शांतिप्रिय था, बावजूद इसके उन्हें कुछ खास हासिल नहीं हुआ. ऐसे में उन्होंने दूसरो विकल्पों को चुना.

ये तरीकों में उग्र क्रांति भी शामिल थी. वे महिलाएं, जो ब्रिटेन में अधिकारों की मांग कर रही थीं. उन्हें सफराजेट्स कहकर पुकारा गया था.

दिलचस्प बात यह है कि लगभग 52 साल तक चली अधिकारों की इस लड़ाई में ब्रिटेन की महिलाओं ने हर एक नेता से अनुरोध किया. फिर चाहे वो विंसटन चर्चिल ही क्यों न रहे हों, लेकिन उनकी ओर से भी सफराजेट्स को कुछ खास समर्थन नही मिला.

बल्कि, उनके ही गृह सचिव होते हुए 1910 में हुए सफराजेट्स के प्रदर्शन को बर्बरता से रोका गया था.

Winston Churchill (Pic: theverge)

एमिली पैनख्रस्ट ने किया सफराजेट्स का नेतृत्व

यूरोप और खासकर ब्रिटेन में ये वो दौर था, जिस वक्त महिलाओं के अधिकार सुंदर दिखने और अनुशासित गृहणी बनने तक सीमित थे. महिलाओं का सड़कों पर उतर कर अपने अधिकारों को मांगना. प्रदर्शन करना राजनीति करना.

ये सब न केवल सामान्य लोगों बल्कि, बड़े घराने के लोगों को भी मंजूर नही था.

किन्तु, इन सब चुनौतियों के बावजूद एक बड़े घराने से जुड़ी होते हुए भी एमिली पैनख्रस्ट ने सफराजेट्स के आंदोलन का न सिर्फ नेतृत्व किया, बल्कि उसे सरकार के दमन से बचाने की भरपूर कोशिश भी की.

1914 में अपनी ऑटोबायोग्राफी में एमिली लिखती हैं, 'आदमी, औरतों के लिए उनके सदाचार और व्याहार से जुड़े नियम बनाते हैं. फिर उम्मीद करते हैं कि वो उन्हें बिना विरोध के अपनाएं. आदमियों ने ये मान लिया है कि उनका अपने हक के लिए, अपनी आजादी के लिए लड़ना जायज है. लेकिन औरतों को ऐसा नहीं करना चाहिए' .

एमिली पैनख्रस्ट 1880 से ही महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करना शुरू कर चुकी थीं.

वो वूमन्स सोशल एंड पॉलिटिकल यूनियन के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल थी. ये यूनियन महिलाओं के अधिकारों के लिए उग्र कदम उठाने को लेकर जाना जाता रहा है. न सिर्फ एमिली बल्कि, उनकी बेटियां भी इस आंदोलन में उनका साथ दे रही थी.

...और सफराजेट्स ने शुरु किए असहयोग आंदोलन

शुरूआत में इन सफराजेट्स ने कुछ असहयोग आंदोलन किए. थोड़ी तोड़-फोड़ मचाकर लोगों का ध्यान अपने मुद्दे  की ओर आकर्षित करने की कोशिश भी की. वो संसद सदस्यों के घरों पर पत्थरों से हमले करती.

उनकी गाड़ियों के आगे आकर खड़े हो जाती, लेकिन 10 अक्टूबर 1910 को एमिली पैनख्रस्ट की डॉयरेक्ट एक्शन की अपील पर लगभग 60,000 सफराजेट्स आंदोलनकारियों ने संसद का घेराव कर लिया.

हालांकि, सफराजेट्स को कुचलने के लिए ब्रिटेन प्रशासन ने कोई कमी नहीं छोड़ी. प्रदर्शनकारियों के साथ शारीरिक शोषण हुआ. उन्हें जेलों में डाल दिया गया, लेकिन सफराजेट्स अपने इरादे की पक्की थीं.

वो जेल में भी अनशन करती रही और अपने मुद्दे को जिंदा रखती रखा. सरकार ने जेल में उनके अनशन को खत्म करने के लिए घटिया से घटिया कदम उठाए और इंसानियत की हद पार कर दी, किंतु वह अपने रास्ते से नहीं हटीं.

Emmeline Pankhurst, founder of the Women's Social and Political Union (Pic: telegraph.co.uk)

 मशहूर अदाकारा 'किटी मैरिऑन' भी रहीं सक्रिय

सफराजेट्स में सिर्फ एक तरह की महिलाएं शामिल नहीं थी, बल्कि आम महिला से लेकर बड़ी अदाकाराओं ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया और उसे कामयाब बनाया. एक रिपोर्ट के मुताबिक किटी मैरिऑन, जोकि ब्रिटेन की काफी जानी-मानी अदाकारा थी. उसने भी सफराजेट्स के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई.

यहां तक कि उन्हें भी बाकी सफराजेट्स की तरह आतंकी करार दिया गया. किटी मैरिऑन 15 साल की उम्र में जर्मनी से लंदन अपने रिश्तेदारों के घर रहने आई थी. क्योंकि बचपन में ही उन्होंने अपनी मां को खो दिया था. 

लंदन आकर जल्द ही किटी ने अंग्रेजी बोलना सीख लिया और उन्होने लंदन की अपर क्लास सोसाइटी में अपने लिए जगह बना ली थी. इस समय उनका परिचय कुछ ऐसी महिलाओं से हुआ, जो काफी आजाद विचार रखती थी.

हालांकि किटी मैरिऑन, औरतों के अधिकारों की वकालत पहले से ही करती थी, लेकिन म्युजिकल हॉल के एजेंट द्वारा हुए उनके शारीरिक शोषण के बाद से वो महिलाओं के अधिकारों को लेकर और भी संजीदा और गंभीर हो गई.  

एमिली का बलिदान नहीं भूलीं ब्रिटेन की महिलाएं

किटी मैरिऑन के अलावा भी एक ऐसी महिला थी, जिसने अपनी जान की बाजी लगाकर अपने हक की आवाज को बुलंद किया था. ये महिला थीं, एमिली विलडिंग डेविडसन.

एमिली, 'डीड्स नॉट वर्ड्स' से इतना प्रेरित थी कि वो अपनी लड़ाई के लिए किसी भी हद तक चली जाती थी.

संसद सदस्यों की गाड़ियों पर पत्थर फेंकना. जबरदस्ती संसद में घुसना और प्रधानमंत्री से मिलने की कोशिशें करना. इन सब कारणों से एमिली को न जाने कितनी बार जेल जाना पड़ा था, लेकिन अपने मकसद के लिए उन्हें सबकुछ मंजूर था.

एक बार तो ब्रिटेन के सेंसन के समय उन्होंने खुद को संसद में छुपा लिया था. ताकि, उसमें उनकी गिनती न हो पाए. आखिरकार एमिली, एप्सम डर्बी में राजा के भागते हुए घोड़े के सामने कूद गई, जिसके बाद उनकी मौत हो गई.

हालांकि, ये अभी भी एक राज है कि उन्होंने यह किस मंशा से किया था. किन्तु, इसमें दो राय नहीं कि वो सफराजेट्स के बीच एक बड़ा कद रखती थीं.

Emily Wilding Davison (Pic: birkbecklibrary)

आज के समय में भी जब महिलाओं को कई तरह की असमानताओं का शिकार होना पड़ता है, तो सफराजेट्स की क्रांति प्रासंगिक लगती है. भले ही वक्त के साथ तरीके बदल गए हों, लेकिन ये लड़ाई जारी है.

फिर चाहे वो #MeToo के जरिए हो या शांतिपूर्वक प्रदर्शनों के बल पर.

क्यों सही कहा न?

Web Title: Woman Suffrage Activists, Hindi Article

Representative Feature Image Credit: marieclaire