रात के अंधेरे में छत पर लेटे हुए तारों की गिनती करना, कभी उनमें मन मुताबिक चेहरे तलाशना तो कभी अपने किसी पूर्वज को तारा बनते देखना… हर किसी ने ऐसा बचपन जीया होगा!

हर प्रेमी जोड़े को यकीन है कि टूटता तारा उनकी मुराद पूरी कर देगा. पर क्या कोई जानता है कि इन तारों की दुनिया आखिर है कैसी?

क्या ये वाकई हमारी मुरादें पूरी करते हैं या इनमें आत्माएं ​बसती हैं, जो हमें ऊपर से देख रही होती हैं?

आसमान को अपनी रौशनी से जगमगा देने वाले तारों का जीवन बहुत अनोखा होता है. ये हमारी तरह ही जन्म लेते हैं, जवान होते हैं, बूढ़े होते हैं और फिर एक दिन मर जाते हैं.

पूरे ब्रह्माण्ड में असंख्य तारे हैं, कुछ भीड़ में खोये हुए होते हैं और कुछ बिल्कुल अकेले… दूर-दूर तक कोई ग्रह नहीं, न कोई साथी तारा.

आकाश में देखने पर यही प्रतीत होता है कि सभी तारे किसी विशाल गोले पर बिखरे हुए हैं और साथ ही साथ हमें यह भी लगता है कि सभी तारे हमसे एक समान दूरी पर स्थित हैं. इस गोले को प्राचीन भारतीय खगोल-विज्ञानियों व यूनानी ज्योतिषियों ने ‘नक्षत्र-लोक’ नाम दिया था.

इसी अनुमान के आधार पर अमीर खुसरो ने इस पहेली की भी रचना की थी -‘एक थाल मोती भरा, सबके सिर पर औंधा पड़ा!’

इस पहेली को आप और हम कई बार हल कर चुके हैं. आज हम जानते हैं कि उनका यह अनुमान सही नहीं था, क्योंकि न तो सभी तारे एकसमान दूरी पर स्थित हैं और न ही कोई ऐसा गोल है जिस पर ये टिके हुए हैं. पर उनके बारे में अब भी ऐसा बहुत कुछ है जो जानना बाकी है.

आइए हम आपको लेकर चलते हैं तारों की दुनिया में… जानिए कि आखिर तारों के जीवन का सच क्या है–

ऐसे जन्म लेते हैं ‘तारे’

वर्तमान में सभी वैज्ञानिक इस सिद्धांत से सहमत हैं कि धूल और गैसों के बादलों से ही तारों का जन्म होता है. आकाशगंगा में उपस्थित गैस और धूलों से भरे हुए मेघ के घनत्व में वृद्धि होती है. उस समय मेघ अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण संकुचित होने लगता है.

इस संकुचन के होने के समय को ‘हायाशी-काल’ कहा जाता है. जैसे -जैसे मेघ में संकुचन होने लगता है, वैसे-वैसे उसके केंद्रीय भाग का तापमान और दाब भी बढ़ जाता है.

आखिर में तापमान और दाब इतना अधिक हो जाता है कि हाइड्रोजन के नाभिक आपस में टकराने लगते हैं और हीलियम के नाभिक का निर्माण करते हैं. तब ताप नाभिकीय अभिक्रिया (संलयन) प्रारम्भ हो जाता है. इस प्रक्रम में प्रकाश व गर्मी के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है.

इस प्रकार वह मेघ ताप और प्रकाश से चमकता हुआ एक तारा बन जाता है.

The Starburst Galaxy, Messier 82. (Pic: nasa)

द्रव्यमान तय करता है ‘तारों का जन्म चक्र’

सामान्यतः सितारे का जीवन चक्र दो तरह का होता है और लगभग सभी तारे इन दो जीवन चक्र में से किसी एक का पालन करते हैं. इन दो जीवन चक्र में चयन का पैमाना उस तारे का द्रव्यमान होता है. कोई भी तारा जिसका द्रव्यमान तीन सौर द्रव्यमान (एक सौर द्रव्यमान: सूर्य का द्रव्यमान) के तुल्य हो वह मुख्य अनुक्रम (नीले तारे से लाल तारे) में परिवर्तित होते हुए अपनी जिंदगी बिताता है.

लगभग 90 प्रतिशत तारे इस प्रकार के होते हैं. यदि कोई तारा अपने जन्म के समय तीन सौर द्रव्यमान से ज्यादा द्रव्यमान का होता है तब वह मुख्य जीवन अनुक्रम में काफी कम समय के लिए रहता है, उसका जीवन बहुत कम होता है.

जितना ज्यादा द्रव्यमान उतनी ही छोटी जिंदगी और उससे ज्यादा विस्फोटक मृत्यु जो एक न्यूट्रॉन तारे या श्याम वीवर को जन्म देती है.

Life Cycle of a Massive Star. (Pic: astronomyisawesome)

ऐसे जीते हैं तारे

तारे के केंद्र में अत्यधिक दबाव यानि अधिक तापमान होता है और इस दबाव से ही संलयन प्रक्रिया प्रारंभ होती है. हीलियम से बना केंद्र सिकुड़ना प्रारंभ करता है और बाहरी तह फैलते हुए ठंडी होना शुरू होती है. ये तह लाल रंग में चमकती है.

यह तारा लाल दानव (red gaint) कहलाता है. केंद्र में अब हीलियम संलयन प्रारंभ होता है क्योंकि केंद्र संकुचित हो रहा है, जिससे दबाव बढ़ेगा और उससे तापमान भी!

यह तापमान इतना ज्यादा हो जाता है कि हीलियम संलयन प्रक्रिया से भारी तत्व बनना प्रारंभ होते हैं. इस समय हीलियम कोर की सतह पर हाइड्रोजन संलयन भी होता है क्योंकि हीलियम कोर की सतह पर हाइड्रोजन संलयन के लिए तापमान बन जाता है. लेकिन इस सतह के बाहर तापमान कम होने से संलयन नहीं हो पाता है. इस स्थिति में तारा अगले 100,000,000 वर्ष रह सकता है!

इतना समय बीत जाने के बाद लाल दानव का ज्यादातर पदार्थ कार्बन से बना होता है.

यह कार्बन हीलियम संलयन प्रक्रिया में से बना है. अगला संलयन कार्बन से लोहे में बदलने का होगा, लेकिन तारे के केंद्र में इतना दबाव नहीं बन पाता कि यह प्रक्रिया प्रारंभ हो सके. अब बाहर की ओर दिशा में दबाव नहीं है, जिससे केंद्र सिकुड़ जाता है और केंद्र से बाहर की ओर झटके से तरंगें (Shock wave) भेजना शुरू कर देता है.

इसमें तारे की बाहरी तह अंतरिक्ष में फैल जाती हैं, इससे ग्रहीय निहारीका (बादल) का निर्माण होता है.

बचा हुआ केंद्र सफेद बौना (वामन) तारा (white dwarf) कहलाता है. यह केंद्र शुद्ध कार्बन (कोयला) से बना होता है और इसमें इतनी ऊर्जा शेष होती है कि यह चमकीले सफेद रंग में चमकता है. इसका द्रव्यमान भी कम होता है क्योंकि इसकी बाहरी तह अंतरिक्ष मे फेंक दी गई है. इस स्थिति में यदि उस तारे के ग्रह भी दूर धकेल दिए जाते हैं, यदि वे लाल दानव के रूप मे तारे द्वारा निगले जाने से बच गए हों तो!

सफेद बौना तारा की नियति इस स्थिति में लाखों अरबों वर्ष तक भटकने की होती है. धीरे-धीरे वह ठंडा होते रहता है. अंत में वह पृथ्वी के आकार (8000 किमी व्यास) में पहुंच जाता है. इसका घनत्व अत्यधिक होता है… मतलब ऐसे में एक माचिस की डिब्बी के बराबर पदार्थ एक हाथी से ज्यादा द्रव्यमान रखेगा!

इसका अधिकतम द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से 1.4 (चन्द्रशेखर सीमा) गुना हो सकता है. ठंडा होने के बाद यह एक काले बौने (black dwarf) बनकर कोयले के ढेर के रूप मे अनंत काल तक अंतरिक्ष में भटकते रहता है.

इस कोयले के ढेर में विशालकाय हीरे भी हो सकते हैं!

The Life Cycle Of A Star. (Pic: tes)

और फिर हो जाती है ‘मौत’

लगभग 100 से 150 लाख वर्ष में (मुख्य अनुक्रम तारे के लिए 10 अरब वर्ष) एक महाकाय तारे की कोर कार्बन की कोर में बदल जाती है और वह एक महाकाय लाल दानव (gignatic red gaint) में परिवर्तित हो जाता है.

इस स्थिति में मुख्य अनुक्रम के तारे और महाकाय तारे में अंतर यह होता है कि महाकाय तारे में कार्बन को लोहे में परिवर्तित करने के लायक दबाव होता है जो कि मुख्य अनुक्रम के तारे में नहीं होता. लेकिन यह संलयन ऊर्जा देने की बजाय ऊर्जा लेता है, जिससे ऊर्जा का ह्रास होता है. अब बाहर की ओर के दबाव और अंदर की तरफ के गुरुत्वाकर्षण का संतुलन खत्म हो जाता है.

अंत में गुरुत्वाकर्षण जीत जाता है. तारा केंद्र एक भयानक विस्फोट के साथ सिकुड़ जाता है, यह विस्फोट सुपरनोवा कहलाता है. 4 जुलाई 1054 में एक सुपरनोवा विस्फोट 23 दिनों तक दोपहर मे भी दिखायी देता रहा.

इसके बाद इन तारों का जीवन दो रास्तों में बंट जाता है. यदि तारे का द्र्व्यमान 9 सौर द्रव्यमान से कम लेकिन 1.4 सौर द्रव्यमान से ज्यादा हो तो वह न्यूट्रॉन तारे में बदल जाता है. वहीं इससे बड़े तारे श्याम वीवर (black hole) में बदल जाते हैं जिसका गुरुत्वाकर्षण असीम होता है जिससे प्रकाश भी बच कर नहीं निकल सकता.

जब ये तारे मृत होते हैं तो ये सरलता से ग़ायब हो जाते हैं. इनके पास हीलियम संलयन के लिए दबाव ही नहीं होता, ये धीरे-धीरे बुझते हुए अंतरिक्ष में विलीन होते हैं.

Ringed Planet in the Blue Nebula. (Pic: wallpaperbetter)

तारों से जन्मे हैं हम!

तारों के अवशेषों में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, लोहा, निकिल, सिलिकॉन आदि अन्य सभी तत्व पाए जाते हैं. हमारा जीवन अतीत में हुए सुपरनोवा विस्फोट की ही देन है!

यह बात अमेरिकी खगोलशास्त्री, लेखक, विज्ञान संचारक कार्ल सैगन ने अपने शोध में सिद्ध की है. उन्होंने 1980 में 13 खण्डों में एक टेलीविज़न सीरीज बनाई थी: ‘कॉसमॉस: ए पर्सनल वोयेज’.

Stars in the Sky. (Pic: tes)

आज तक यह अमेरिका में निर्मित सबसे लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम है और इसे 60 देशों के 50 करोड़ लोग देख चुके हैं. उपरोक्त उद्धरण इसी नाम की पुस्तक से है जो सैगन ने टीवी सीरीज के साथ लिखी थी.

आपको तारों का सफर कैसा लगा… कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में शेयर जरूर करें.

Web Title: The Life Cycle Of A Star, Hindi Article

Featured Image Credit: wallpapersite