राजशाही, तानाशाही और उपनिवेशवाद के जाल से निकलने के लिए दुनिया ने एक बड़ी कीमत चुकाई, तब जाकर कहीं उसने सरकारी तंत्र के रूप में लोकतंत्र को पाया है.

इसी क्रम में तुर्की ने भी ऑटोमन एम्पायर और इस्लामिक रूल से बाहर आने के बाद मुस्तफा केमल पाशा के नेतृत्व में लोकतांत्रिक सरकारी तंत्र को अपनाया. वो पहला ऐसा मुस्लिम बाहुल्य देश उभर कर सामने आया, जिसने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया और दुनिया को स्तब्ध किया.

हालांकि, 2016 में हुई तख्तापलट की नाकाम कोशिश ने न सिर्फ तुर्की, बल्कि दुनियाभर में ये डर पैदा कर दिया कि कहीं तुर्की अपने पड़ोसी मुल्कों की तरह राजनैतिक अस्थिरता औऱ धार्मिक कट्टरपन का शिकार ने हो जाए. 

दिलचस्प बात तो यह है कि इससे पहले भी 1960, 1970, 1973 और 1997 में भी तुर्की सरकार का तख्ता पलट करने की कोशिश हो चुकी है.

ऐसे में जानना दिलचस्प हो जाता है कि कितना बदल गया है तुर्की-

तख्तापलट को रोकने में कामयाब रहे थे तुर्क

जुलाई 2016 में हुई तख्तापलट की कोशिश ने तुर्की की राजनीति में एक अहम मोड़ ला दिया. 15 जुलाई 2016 को तुर्की की सेना के एक हिस्से ने एर्दोआन सरकार की तख्तापलट करने की कोशिश में, वहां के दो बड़े शहरों इस्तानबुल और अंकारा पर हमला बोल दिया.

सेना बोर्डर की बजाए शहरों की सड़कों पर मिलिट्री टैंकों के साथ उतर गई थी, तुर्की के फाइटर जेट्स अपनी ही संसद पर बमों की बारिश कर रहे थे. किन्तु, सेना के इस गुट से अपने देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए लोग बिना हथियार और मामूली रसोई के सामान के साथ सड़कों पर उनसे लड़ने के लिए उतर आए. वो सेना के उस गुट और पुलिस के साथ खड़े थे, जो तुर्की के टुकड़े-टुकड़े होने से बचा रहे थे.

तख्तापलट की इस कोशिश में 241 लोगों की जान चली गई और 2194 लोग जख्मी हुए.

तुर्की सरकारी ने इस तख्तापलट का साजिशकर्ता फेतुल्लाह गुलेन को ठहराया, जो कभी तुर्की की सत्ताधारी पार्टी एकेपी का करीबी माना जाता था. फेतुल्लाह गुलेन ने तुर्की के राजनीति में सेना की भूमिका को कम करने में एर्दोआन का साथ दिया था. इससे ये समझा जा सकता है कि गुलेन ने इसी बीच सेना के गुट को अपने साथ कर लिया होगा.

तुर्की की राजनीति के अलावा भगोड़े की तरह अमेरिका में रह रहे गुलेन की तुर्की के लोगों के बीच धार्मिक उपदेशक के रूप में काफी पकड़ थी.  हालांकि, 2010 में गुलेन और एकेपी के बीच पड़ी दीवार के बाद तुर्की की राजनीति में बदलाव आने शुरू हुए, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा.

Citizens Took to the Streets to Oppose the Attempted Coup (Pic: aljazeera.com)

गुलेन ने खराब किए अमेरिका और तुर्की के रिश्ते!

अब्दुल्लाह गुलेन, जो अभी भी अमेरिका में पनाह लिए हुए है,  उसे तुर्की अपना गुनेहगार समझता है. यही कारण है कि वह उसका जल्द से जल्द प्रत्यर्पण चाहता है. हालांकि, अमेरिका की ओर से गुलेन के प्रत्यर्पण में इतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई गई है. इस कारण तुर्की और अमेरिका के रिश्तों में तल्खियां पैदा हो रही हैं. इस तरह कुर्दों के बाद अब गुलेन अमेरिका और तुर्की के रिश्तों में दीवार बन गया है.

दोनों देशों के बीच तकरार इस कदर बढ़ गई थी कि दोनों के बीच लगातार दो महीने तक वीजा सेवाएं बंद रही.

हालांकि, अमेरिका ने तख्तापलट के बाद इस घटना की निंदा की और तुर्की सरकार को समर्थन के देने की बात कही, लेकिन वो गुलेन को इसमें घसीटने से बचता नजर आया. हफिंगटन पोस्ट में छपी एक रिपोर्ट की मानें तो गुलेन के प्रत्यर्पण से अमेरिका की मिडिल-ईस्ट की नीति पर असर पड़ सकता है, जिसकी वजह से वो गुलेन को तुर्की को नहीं सौंपना चाहता.

वहीं कुछ रिपोर्ट्स गुलेन को निर्दोष मानते हुए दावा करती हैं कि गुलेन की मिलिट्री की बजाए, पुलिस और तुर्की की न्यायिक व्यवस्था में ज्यादा पकड़ है. यही वजह रही कि तख्तापलट के बाद एर्दोआन सरकार ने करीब 3000 हजार जजों को हिरासत में ले लिया था. 

Fethullah Gülen (Pic: balkaneu.com)

संवैधानिक बदलाव से बदलेगी तुर्की की राजनीति!

तुर्की में हुए तख्तापलट के बाद, जो बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया गया था, वह था वहां संसदीय व्यवस्था को बदलकर राष्ट्रपति प्रणाली को लागू करना. 16 अप्रैल 2017 में हुए जनमत संग्रह ने तुर्की को एक राष्ट्रपति प्रणाली के साथ-साथ एर्दोआन को कुछ ऐसी शक्तियां भी दी, जिससे वो निरंकुश बन सकते हैं.

बताते चलें कि राष्ट्रपति प्रणाली औऱ संविधान में संशोधन की सिफारिश करते हुए एर्दोआन ने कहा था कि इससे देश में राजनैतिक स्थिरता आएगी और इससे वो अपने दुश्मनों को ठिकाने लगा सकेंगे. दुश्मनों को ठिकाने लगाने में अब विपक्षी पार्टियां भी तुर्की में अपनी जगह खो रही हैं और सरकार हर उस व्यक्ति को दुश्मन की श्रेणी में रख रही है, जो उसकी निंदा कर रहे हैं.

जनमत संग्रह में तुर्की के लगभग 85 प्रतिशत लोगों ने हिस्सेदारी ली और उनमें से मात्र 51.4 प्रतिशत लोगों ने ही सैंवधानिक संशोधन के हित में अपना मत दिया. यानी 48.6 प्रतिशत तुर्की के लोग अभी भी राष्ट्रपति प्रणाली के लिए तैयार नहीं हैं! हालांकि, 1960 के बाद से लगातार 'सैन्‍य दखल' से सरकार गिरने और गठबंधन की सरकार से मुक्ति पाने के लिए इस संशोधन को जरूरी भी माना गया है.

Supporters of the Turkish president celebrate the referendum result (Pic: theguardian)

राष्ट्रपति की जवाबदेही लगभग खत्म कर दी गई

तुर्की में तख्तापलट के बाद, जिस तरह से अपनी राजनीति को संतुलन में रखने की कोशिश की है, उस पर देश और दुनिया भर के स्कॉलर्स ने अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं. द इक्नॉमिस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक तख्तापलट के बाद से लगभग 6000 सैनिकों और हजारों पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था. कई शिक्षाविदों, अध्यापकों और सिविल सर्वेंट्स को भी शक के घेरे में लेकर हिरासत में ले लिया गया.

जबकि. उनका तख्तापलट से कोई ताल्लुक ही नही था.

इसके साथ-साथ तुर्की के अल्पसंख्यक समुदाय, वहां के अतिराष्ट्रवादी और धार्मिक कट्रपंथी समुदायों का निशाना बन रहे हैं. नए कानून संशोधनों के मुताबिक तुर्की संसद के सदस्य पहले की तरह प्रधानमंत्री से सवाल नहीं पूछ पाएंगें. वो केवल लिखित में ही संसद में सवाल कर पाएंगे, वो भी या तो मंत्रियों से या फिर उपराष्ट्रपति से. मतलब राष्ट्रपति की जवाबदेही बिल्कुल खत्म कर दी गई है.

हालांकि, राष्ट्रपति के महाभियोग का प्रावधान किया गया है, किन्तु उसकी प्रक्रिया काफी जटिल रखी गई है. इसमें संसद के 60 प्रतिशत सदस्यों की मंजूरी जरूरी होगी. महाभियोग का आखिरी फैसला सैंवधानिक अदालत करेगी, जिसके सदस्यों का चुनाव राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा.

Recep Tayyip (Pic: timesheadline)

...तो आगामी चुनाव तय करेंगे दशा-दिशा

तुर्की में जून में होने वाले चुनाव बहुत अहम होंगे. इसके लिए एर्दोआन ने न सिर्फ तुर्की, बल्कि जर्मनी और यूरोप में रहने वाले तुर्की लोगों को अपने प्रभाव में लेना शुरू कर दिया है. हालांकि, इसकी वजह से एक नया विवाद भी खड़ा हो गया था. इस विवाद की मुख्य वजह थी एर्दोआन द्वारा जर्मनी के उन खिलाड़ियों से मिलना, जो तुर्की ऑरिजन के माने जाते हैं!

एर्दोआन ने उनसे मिलकर जर्मनी में रहने वाले तुर्क लोगों को प्रभावित करने की कोशिश की, जिससे न केवल एर्दोआन, बल्कि जर्मन नागरिकता पा चुके फुटबॉल खिलाड़ियों की जर्मनी के प्रति वफादारी पर भी सवाल खड़े हुए. इसके अलावा विवाद की वजह ये भी थी कि जिस तरह से तुर्की की एर्दोआन सरकार वहां की मीडिया और पत्रकार पर दबाव बनाने का काम कर रही है, उसे लेकर यूरोप काफी चिंता में है!

खैर, एर्दोआन का जीतना तुर्की के भविष्य को काफी हद तक प्रभावित करेगा!

किन्तु, ये देखना भी दिलचस्प होगा कि संवैधानिक संशोधन का फायदा तुर्की के लोगों को होगा या उनके राष्ट्रपति को.

Web Title: Turkish Constitutional Referendum and Coup to Effect the Upcoming Election, Hindi Article

Feature Representative Image Credit: turkiyeonline