दूसरे विश्व युद्ध के बारे में सुनते ही हत्या, प्रताड़ना और चीख जैसे शब्द कानों में सुनाई देते हैं. यह युद्ध मानव इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध था जिसमें ना जाने कितने ही लोगों की जानें गई.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद तमाम कहानियाँ बाहर आईं, जिनके जरिए पता चला कि कुछ लोग इस जंग में ऐसे भी थे, जिन्होंने बेहद साहस के साथ काम किया. ऐसी ही एक कहानी है ‘वायलेट शाबो’ की.

वायलेट शाबो एक निडर महिला थीं, जिनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत ब्रिटेन के दूसरे सबसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड जॉर्ज क्रॉस से सम्मानित किया गया था.

तो चलिये आज दूसरे विश्व युद्ध की इस वीरांगना की कहानी को जानने का प्रयास करते हैं–

14 साल की उम्र में छोड़ी पढ़ाई

वायलेट का जन्म 26 जून 1921 को पेरिस में हुआ था. उनके पिता एक अंग्रेजी टैक्सी चालक और कार विक्रेता थे. उनकी मां फ्रेंच कपड़े बनाया करती थीं. सन 1932 में वायलेट के माता-पिता दक्षिण लंदन में स्टॉकवेल में चले गए कुछ पैसे कमाने के लिए. अपनी छोटी बच्ची को वह उसकी आंटी के पास छोड़ कर गए थे. जैसे ही वायलेट 11 साल की हुईं, वह ब्रिटेन चली गयीं अपने माता-पिता के पास.

माना जाता है कि वायलेट बेहद खूबसूरत थीं, मगर उन्हें अपनी इस खूबसूरती का एहसास नहीं था. वे शुरुआत से टॉमबॉय यानी लड़कों जैसी थीं. वह उनकी तरह ही सिर्फ शर्ट और पैंट पहन कर रहा करती थीं. ऐसा माना जाता है कि वायलेट को साइकिल चलाना, आइस स्केटिंग करना और डांस करने का बेहद शौक था. क्योंकि वायलेट के माता-पिता फ्रांस से थे इसलिए उन्हें इंग्लिश के साथ-साथ फ्रेंच भी बोलनी आती थी.

ऐसा माना जाता है कि वायलेट बहुत तेज दिमाग की थीं, पर उन्हें पढ़ाई करने और स्कूल जाने में कोई खास मजा नहीं आता था. शायद इसलिए ही उन्होंने 14 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया और नौकरी शुरू कर दी.

British Spy Violette Szabo (Pic : historyanswers)

पति की मौत ने बनाया जर्मन का दुश्मन!

14 जुलाई को सन 1940 में जनरल चार्ल्स डी गॉल की अगुवाई में फ्रेंच सरकार ने ‘बेस्टिल डे’ को मनाने के उद्देश्य से लंदन में परेड का आयोजन किया.

वायलेट की मां ने उन्हें और उनकी दोस्त विनी को परेड के लिए आए सैनिकों को अपने घर खाना खाने का निमंत्रण देने को कहा. कुछ सैनिकों ने निमंत्रण लेने से मना कर दिया, पर अंत में इटियेन नाम के एक सैनिक ने वायलेट का निमंत्रण स्वीकार कर लिया.

खाने के टेबल पर पहली बार इटीयेन और वायलेट की दोस्ती हुई, जिसके बाद दोनों का मिलना जुलना भी शुरू हो गया. धीरे-धीरे वायलेट और इटियेन की मुलाक़ातें बढ़ने लगीं. दोनों के दिल एक दूसरे के लिए धड़कने लगे थे.

आखिर में दोनों ने ही अपने प्यार को कबूल कर लिया.

मुलाक़ात के महज़ कुछ ही हफ़्तों बाद वायलेट और इटियेन शादी के बंधन में बंध गए. उस वक्त वायलेट बस 19 साल की थीं और इटियेन 30 साल के थे. दोनों की उम्र में फर्क था पर प्यार के आगे उन्होंने उम्र को नजरअंदाज कर दिया.

शादी के थोड़े समय बाद ही इटियेन को जंग पर जाना पड़ा. उस समय वायलेट गर्भवती थीं. सन 1942 में, वायलेट ने अपनी बेटी तानिया को जन्म दिया. उस वक़्त इटियेन इजिप्ट में जर्मन आर्मी के ख़िलाफ लड़ाई कर रहे थे.

नन्हीं तानिया अपने पिता को कभी नहीं देख पाई क्योंकि इटियेन की जंग में मौत हो गई. वायलेट और तानिया बस दरवाजे की चौखट पर नजर गड़ाए ही रह गए थे कि इटीयेन वापस आएँगे, लेकिन वापस बस उनकी देश के झंडे में लिपटी लाश ही आई. इटियेन के जाने का दुख वायलेट के लिए असहनीय था जिसके कारण उनके दिल में जर्मन आर्मी से बदला लेने की चिंगारी लग चुकी थी.

उन्होंने सोच लिया था कि कुछ भी हो वह जर्मन से अपने पति की मौत का बदला तो लेके ही रहेंगी.

कड़ी ट्रेनिंग के बाद बनीं ब्रिटिश एजेंट

अपने पति की मौत का बदला लेने का मौका वायलेट को सन 1943 में मिला जब उन्हें पेंशन मंत्रालय से बुलावा आया. उस समय वायलेट इस बात से अनजान थीं कि उन्हें ब्रिटिश एजेंट बनने के लिए बुलाया गया है.

उन्हें सेलविन जेपसन ने बुलाया था जो ‘स्पेशल ऑपरेशन एग्ज़ीक्यूटिव’ (एसओई) के भर्ती अधिकारी थे. एसओई एक गुप्त एजेंसी थी जो सीक्रेट मिशन के लिए लोगों को ट्रेन करती थी.

वायलेट का नाम एसओई को चलाने वाले जॉर्ज क्लेमेंट ने प्रस्तावित किया था, जो वायलेट से लंदन डांसहॉल में पहले मिल चुके थे.

जब वायलेट को ये पता चला कि उन्हें सीक्रेट एजेंट बनने के लिए बुलाया गया है, तो उन्होंने तुरंत हां कर दी. इसके बाद शुरू हुआ वायलेट का चुनौती भरा सफर.

अपनी सीक्रेट एजेंट की पहचान समाज से छिपाने के लिए वायलेट ने नर्स का काम शुरू कर दिया. वह नहीं चाहती थी कि किसी भी तरह से उनके हाथों से जर्मन से बदला लेने का यह मौका छूट जाए. उन्होंने अपनी बेटी तानिया को रिश्तेदार के पास देखभाल के लिए छोड़ दिया और अपनी एसओई की ट्रेनिंग के लिए निकल गई.

वायलेट ने फील्डकॉफ्ट, नेविगेशन, हथियार, विस्फोटक, तोड़फोड़ और जासूसी की ट्रेनिंग प्राप्त की. वायलेट ने हर परीक्षा को सफलतापूर्वक पूरा किया. सन 1944 में उन्होंने अंतिम चरण में पैराशूट ट्रेनिंग को भी पूरा किया. यूँ तो वह कहने के लिए एक आम लड़की थी मगर उनके अंदर का जज्बा बाकियों से बहुत अलग था. उन्होंने खून-पसीना एक कर दिया जासूस बनने की इस ट्रेनिंग को पार करने के लिए.

कड़े परिश्रम और हर मुश्किल को पार करने के बाद वायलेट आखिर में एक ब्रिटिश सीक्रेट एजेंट बन ही गई.

Violette Sazbo Got Selected For British Secret Agency (Pic: dnw)

हंसते-हंसते मौत को गले लगाया

एजेंट बनते ही वायलेट को उनका पहला मिशन दे दिया गया. अपने पहले मिशन के लिए उन्हें फ्रांस का रुख करना था. वहां पर जर्मन सेना ने अपना जबरन राज चला रखा था. वायलेट का काम था कि वह फ्रांस में अपने दूसरे जासूसों से मिले और जर्मन की कमजोरी और उनकी खुफिया जानकरी इकठ्ठा करे.

क्योंकि यह काम जर्मन के खिलाफ था तो इसमें जान का भी खतरा था मगर वायलेट हर खतरे के लिए तैयार थी. उन्होंने करीब दो हफ़्तों का समय बिताया फ्रांस में. इस दौरान उन्हें हिरासत में भी लिया गया मगर थोड़े ही वक़्त में उन्हें छोड़ भी दिया गया.

दो हफ़्तों के समय में वायलेट ने सभी जानकारी इकठ्ठा की और वापस ब्रिटेन की ओर निकल पड़ी. जर्मन सेना की नाक के नीचे वह काम करती रहीं और किसी को भनक तक नहीं लगी. अपने पहले मिशन की सफलता के साथ वायलेट अपने घर लौटी.

वायलेट ब्रिटेन लौटी ही थीं कि दो दिन बाद ही उन्हें दूसरे मिशन पर फिर से फ्रांस भेजा गया ताकि वे दक्षिण-पश्चिमी शहर लिमोज में प्रतिरोध नेटवर्क की मदद कर सकें. इस बार भी उन्होंने बेहद ही आराम से अपना मिशन पूरा किया और वापस अपने देश को लौटने लगी.

वायलेट अपने मिशन से लौट ही रही थीं कि अचानक से ही सड़क के पास जर्मन सैनिकों ने रोडब्लॉक कर दिया और चेकिंग शुरू कर दी. चेकिंग देख वायलेट थोड़ा घबरा गई क्योंकि उनकी गाड़ी में बंदूक और गोलियां पड़ी थीं. वह जानती थी कि अगर जर्मन सैनिकों ने उनके पास यह बंदूकें देख ली तो वह उन्हें पकड़ लेंगे.

वायलेट के साथ गाड़ी में उनका एक साथी भी था जिसे बचाने की जिम्मेदारी भी उनके ही ऊपर थी. उन्हें कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने बंदूक बाहर निकाली और गोलियां बरसाना शुरू कर दिया. गोलियों की आवाज सुनके जर्मन सैनिक भी हरकत में आ गए और उन्होंने भी वायलेट पर गोलियां चलानी शुरू कर दी. दोनों तरफ से गोलियों की बौछार होने लगी. करीब 20 मिनट तक गोलियां चलती रही जिसमें से गोली वायलेट के कंधे में जा लगी. वायलेट घायल तो हो गई थी, लेकिन उनके अंदर अभी भी हिम्मत बाकी थी.

घायल वायलेट थोड़ी देर और लड़ती रही मगर वह जर्मन सैनिकों के आगे ज्यादा देर टिक नहीं पाई. वायेलट को जर्मन पुलिस ने पकड़ लिया और पूछताछ के लिए जेल ले गए. कैद में रहने के दौरान वायलेट को खूब प्रताड़ित किया गया, लेकिन वायलेट ने जर्मन सैनिकों को एक भी जरूरी जानकारी नहीं दी. वह मार खाती रही मगर उनका मनोबल नहीं टूटा. नाजी सैनिक परेशान हो गए वायलेट पर अत्याचार करते हुए पर वायलेट टस से मस नहीं हुई.

जर्मन सैनिकों के लिए वायलेट कुछ काम की नहीं थीं, इसलिए उन्होंने उन्हें कंसंट्रेशन कैंप भेज दिया जो नाजी सेना का बनाया नरक था. कंसंट्रेशन कैंप में जाने वाले अक्सर लोगों से पहले काम करवाया जाता था और बाद में उन्हें मार दिया जाता था. वायलेट कैंप में कई दिनों तक काम करती रही. वहां भी उनपर कई अत्याचार हुए पर वह कभी भी टूटी नहीं. आखिर में एक दिन वायलेट को गोली मार दी गई और 24 साल की उम्र में ही वायलेट अपने देश के लिए कुर्बान हो गई.

वायलेट की इस कुर्बानी के लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने जॉर्ज क्रॉस मेडल से सम्मानित किया. वायलेट के इस सम्मान को लेने उनकी बेटी तानिया गई थी.

Daughter Of Violette With George Cross Medal (Pic : dnw.co)

वायलेट की मृत्यु के 13 साल बाद उनकी जीवन पर आधारित फिल्म ‘कार्व हर नेम विद प्राइड‘ आई. इस फिल्म में वायलेट की अमर कहानी को पेश किया गया.

वायलेट की ज़िंदगी भले ही बेहद छोटी रही, पर उनकी कहानी ने उन्हें लोगों के दिलों में अमर बना दिया.

Web Title: Story Of Courageous British Spy Violette Szabo, Hindi Article

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