इधर स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां आरम्भ होते ही हर सुबह कोई न कोई बालक इस बूढ़े का हाल जानने के लिए आ ही जाता है. एक सुबह एक बालक ने पूछा, ‘बाबा, जबरदस्त गर्मी के इस महीने का नाम जेठ (ज्येष्ठ) क्यों रखा गया?’

कहा भी जाता है कि बच्चा बूढ़े का गुरु होता है. जाने- अनजाने बहुत कुछ सिखाता है. परम्परागत तरीके से भी बताया जा सकता था कि चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्र (मार्च-अप्रैल), विशाखा नक्षत्र से वैशाख (अप्रैल-मई), ज्येष्ठा नक्षत्र से ज्येष्ठ (मई-जून), आषाढ़ा नक्षत्र से आषाढ़ (जून-जुलाई), श्रवण नक्षत्र से श्रावण (जुलाई-अगस्त), भाद्रपद (भाद्रा) नक्षत्र से भाद्रपद (अगस्त -सितम्बर), अश्विनी नक्षत्र से आश्विन (सितम्बर-अक्तूबर), कृत्तिका नक्षत्र से कार्तिक (अक्तूबर -नवम्बर), मृगशीर्ष नक्षत्र से मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसम्बर), पुष्य नक्षत्र से पौष (दिसम्बर-जनवरी), मघा नक्षत्र से माघ (जनवरी- फरवरी) तथा फाल्गुनी नक्षत्र से फाल्गुन (फरवरी-मार्च) का नामकरण हुआ है…

लेकिन बुद्धि ने कहा उस बालक को कुछ सरल अर्थ में जेठ (ज्येष्ठ) का अर्थ बताओ. इसलिए मैंने अक्षित से पूछा, ‘जब तुम्हारे ताऊ जी आते हैं तो तुम्हारी मम्मी सिर क्यों ढक लेती है?’
जब उसने सहज मुद्रा में कहा, ‘पता नहीं!’ तो उसे बताना पड़ा कि उसके ताऊजी उसकी मम्मी के जेठ हैं. अतः जेठ का सम्मान करते हुए कभी बहुएं घुंघट करती थी, पर अब जमाने में हुए बदलाव के अनुसार कम से कम सिर तो ढक ही लेती है. इसलिए बेटा इस जबरदस्त गर्मी में लोग जब घर से निकलते हैं तो सिर पर तौलिया, गमछा, टोपी रख लेते हैं. कुछ लोग छाता लेकर चलते हैं. अगर ऐसा न किया जाये तो प्रकृति का यह जेठ (ज्येष्ठ) नाराज होकर ‘लम्बा’ कर सकता है. यह सिर ढकने का महीना है, इसलिए इसे जेठ (ज्येष्ठ) कहना उचित है.’

अक्षित बोला, ‘तो क्या चैत्र का भी कुछ ऐसा ही भाव होता है?’

मैंने कहा, ‘हाँ, चैत्र में फसल तैयार होती है. किसान को सचेत रहना पड़ता है. छात्रों को भी परीक्षा की तैयारी के लिए ‘चेतने’ की सलाह दी जाती है. यदि किसान ‘चेत’ नहीं रहेगा तो गीदड़, नीलगाय आदि उसकी पूरे वर्ष की मेहनत को बर्बाद कर सकते हैं. तुम भी तो मार्च-अप्रैल, यानी चैत्र में रात-रात भर जाग कर पढ़ते हो. इसलिए इस माह को चेत (चैत्र) कहना उचित है.’

‘और बैशाख???’

‘आज के लिए इतना ही. कल सुबह पार्क से लौटते हुए आओ तब आपको बैशाख और बैशाखनंदन के बारे में बतायेंगे.’

अगली सुबह वे फिर हाजिर थे. आते ही बोले, ‘बैशाख तो बाद में पहले बैशाखनंदन के बारे में बताओ.’

‘बैशाखनंदन गधे को कहा जाता है. बैशाख में फसल तैयार हो जाती है. उसे जल्दी से जल्दी सुरक्षित करने के लिए गधे की तरह लगना पड़ता है. बेशक आज फसल काटने से निकालने तक के लिए आधुनिक मशीने आ गई हैं, लेकिन अब भी जब तक फसल घर न आ जाये या बाजार तक न पहुंच जाये, दिन रात खूब मेहनत करनी पड़ती है. लेकिन तब की सोचो जब फसल काटने से निकालने और बैल गाड़ियों पर लाद कर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने तक सब काम खुद करना पड़ता था, तब किसान और उसके परिवार की हालत क्या होती होगी? एक तरह से गधे की तरह लगे रहने वाला पूरा महीना है बैशाख!’

बैशाख के बाद जेठ (ज्येष्ठ) की चर्चा तो कल हो ही चुकी है. अब आगे बढ़ते हैं. ज्येष्ठ के बाद आषाढ़ आता है. आषाढ़ में खूब गर्मी पड़ती है. वैसे इन दिनों खेत पर कुछ विशेष काम काज नहीं होता. आप बच्चों की भी तो इन दिनों छुट्टियां रहती हैं, अतः जरूरी होने पर ही बाहर निकला जाता है, क्योंकि बाहर तपता सूर्य इंतजार करते हुए कहता है- ‘आ सड़’. आओ और तेज धूप में सड़ो! ‘आ सड़’ का ही उपभ्रंश यानी बदला उच्चारण है आषाढ.

ऐसे ही, आषाढ़ के बाद आता है श्रावण. आम बोलचाल में इसे सावन भी कहा जाता है. सभी जानते हैं कि इन दिनों वर्षा का मौसम होता है. वर्षा मतलब सा.. सा.. सा.. करती तेज हवाओं के साथ तेज बारिश. परिणाम चारों ओर देयर इज ओनली वन सीन – “हरियाली ही हरियाली”. यानी सा..सा.. करती हवाएं और लहलहाते वन. हुआ न सावन. विशेष बात यह भी कि इसी माह की पूर्णिमा को श्रावणी यानी रक्षाबंधन का त्यौहार भी होता है.

भादो (भाद्रपद) भी बरसाती महीना है. अच्छी बरसात हो जाये, फिर अच्छो- अच्छो की धुलाई हो जाती है. कहीं काई तो कहीं कीचड़ के दर्शन होते हैं. फिसलन, गंदगी, बदबू भी हो सकती है. चूंकि इस माह की आठ तारीख को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी होती है. इसलिए अच्छी तरह कर धोकर सारी गंदगी ‘बहा दो’-‘बहा दो’ यानी ‘भा दो’.

अब बारी है आश्विन की. इसे कहीं अस्सू तो कहीं आसौज तो कहीं क्वार भी कहा जाता है. इस माह में 16 दिन पितृपक्ष के और 9 नवरात्र तथा विजयदशमी भी होती है. सर्वत्र दुर्गापूजा की धूम रहती है. श्रद्धालु जन पूजा, उपासना, उपवास करते हैं तो उनके मन में जरूर कोई ‘आस’ भी होती है. परम शक्ति सबकी आस को सफलता प्रदान करें. सुधीजन आशीर्वाद देते हैं- तुम्हारी आस विजयी हो यानी ‘आस विन’ हो.

अक्षित बिना कुछ बोले सुनता जा रहा था…

फिर मैंने कहा, कार्तिक के आरम्भ से ही त्यौहारों की टिक, टिक शुरु हो जाती है. चतुर्थी को करवाचौथ, त्रयोदशी को धनतेरस, चौदह को नर्कचौदस यानी छोटी दिवाली, अमावस्या को दिवाली. अमावस्या तो जानते ही हो न, जब चन्द्रमा घटते घटते पूरी तरह नदारद मिले. जितनी मर्जी टकटकी लगाकर देखकर नहीं दिखेंगे. इसलिए किसी ने कहा होगा, ‘आसमान में ‘का टिक’ टिकी लगाये हो? इतने दीप जलाओ कि घर-घर चांद सी रोशनी हो. वास्तव में कार्तिक का संदेश ही है- इधर उधर टकटकी लगाने की बजाय कुछ खुद करो. का टिक, काटिक..

मार्गशीर्ष त्यौहारों के बाद सर्दी की शुरुआत का अवसर है, इसलिए सावधानी आवश्यक है. बदलते मौसम में अगर जरा सा भी असावधान रहे, तो बीमार पड़ सकते हो. किसान जरा सा असावधान रहा तो फसल के नाम पर जीरो. सड़क पर असावधान तो दुर्घटना. यानी ये दिन मार्ग से खेत तक सावधानी को शीर्ष प्राथमिकता देने के हैं.

पौष कड़ाके की सर्दी का माह है. इन दिनों जमकर ओस पड़ती है. धुंध, कोहरा होता है. कुछ दूरी का भी नहीं दिखता. लगता है जैसे प्रकाश ओस एकाकार हो गये हों. इसे पौष न कहें तो फिर क्या कहें? स्वयं और परिवार के पोषण के लिए किसान को जमा देने वाली ठण्ड में खेत में पानी देना पड़ता है तो पशुओं से फसल की रक्षा भी करनी है.

ऐसे ही माघ एक ऐसा महीना है जो बाघ की तरह डराता है. जमा देने वाली सर्दी में बाहर निकलते हुए ऐसा महसूस होता है, जैसे बाहर बाघ बैठा है जो निगल जायेगा. पर हिम्मत वाले पवित्र नदियों में स्नान कर माघी (मकर संक्रांति) मनाते हैं. कहा जाता है कि जो इन दिनों गजक, मुंगफली, तिल आदि का सेवन करते हैं ठण्ड का बाघ उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है.

फागुन (फाल्गुन) में अनेक गुण हैं. इसीलिए तो ऋतुराज बसंत स्वयं इसके स्वागत के लिए तैयार रहते हैं. अब तक ठण्ड से सिकुड़े मनुष्य, जीव, जन्तु आदि सब अपने खून में कुछ फड़फड़ाहट महसूस करने लगते हैं. पक्षी पंख फड़फड़ाते हैं तो पेड़ पौधों पर प्रकृति के रंग अपनी पूरी फड़फड़ाहट के साथ हाजिर होते हैं. फाल्गुन पूर्णिमा को मस्ती का त्यौहार होली होता है. एक खास बात यह कि फसल तैयार है, चौकसी करने वाले रात भर फगुआ गान, ढोल, नगाड़ा, बजाकर पशुओं को दूर रहने का संदेश भी देते हैं. वास्तव में फाल्गुन हर कष्ट, रोग, शत्रु को दूर रहने और प्राकृतिक सौंदर्य को और निकट आने और सर्वत्र छाने का नाम है. अब जिसमें इतने गुण है कि सबको गिनवाना कठिन है, इसलिए शोर्ट में कह रहा हूं इसमें फलां, फलां गुण हैं… यानी ये फागुन है.

लगातार छ दिन आकर अक्षित नेे भारतीय महीनों के नाम के संदर्भ जान लिये. आज अंतिम दिन उसने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘बाबा, आपको मालूम है, बूढ़े को बाबा क्यों कहते हैं?’

मैंने अन्जान बनते हुए कहा, ‘मैं ठहरा पुराने जमाने का बूढ़ा. नए जमाने का ज्ञान-विज्ञान मुझे सीखना पड़ेगा, आपसे.’

अक्षित उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘अभी मुझे स्कूल से मिला होमवर्क करना है. जब समय मिलेगा तब आऊंगा आपके पास. ओ के, बाय, बाय! बा बा!’

वो बा-बा करते हुए नज़रों से ओझल हो गया.

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