गाँव के पश्चिम एक दीना पांड़े रहते थे!

कहते हैं दीना पांड़े का एक पैर खेत में रहता था तो एक पैर कचहरी में, क्योंकि जर-जमीन, जोरू के लिए गांव का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिस पर उन्होंने मुकदमा न किया हो…

लोग गणित, विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी में शोध करते होंगे, लेकिन दीना पांड़े ने मुकदमा करने, गवाही देने, जमानत करवाने से लेकर कब्जा दिलवाने तक में शोध किया था.

गांव-गांव उनकी इस विशिष्ट ख्याति की पताका लहरा रही थी. अपनी कुछ इन्हीं विशेषताओं के कारण गाँव में उनको लोग मोकदिमा पांड़े भी कहते थे.. कुछ लोग तो यहां तक कहते थे कि कुत्ते-बिल्ली, सांड़, बैल के अपने कोर्ट कचहरी होते तो दीना पांड़े उनसे भी मुकदमा लड़ रहे होते.. क्योंकि ये आदमी नहीं बैल है, जिसे कचहरी को खेत की तरह जोतना पसन्द है. इस बैल को किसी आदमी पर दया नही आती…

लेकिन साहेब गांव के लोग ये भी कहते हैं कि साल भर गम्भीर रहने वाले इस पत्थर से भी ज्यादा सख्त दीना पांड़े को रोते हुए तब देखा जाता है, जब किसी की बेटी गांव से विदा होती है या किसी का गाँव से जनाजा उठ जाता है… गांव के लोगों का आँख आश्चर्य से फट जाता है.. “अरे! दिना पँड़इयाँ रो दिया रे भाई”

एक बार की बात है. एक सांझ चैत की गर्मी चरचरा रही थी कि गेंहू काटने को लेकर सीमंगल मिसिर के खेत में लाठियाँ चटचटाने लगीं… परम्परानुसार थाना, कचहरी, कोर्ट मोकदिमा सब हुआ..

लेकिन भाई साहब.. उसी अप्रैल में सीमंगल की बेटी की शादी थी. सीमंगल के दरवाजे के सामने वाली जमीन को लेकर ही दीना पांड़े उनसे कई पीढ़ी से लड़ते आ रहे थे.. सीमंगल को चिंता खाए जा रही थी कि बेटी की बरात कहाँ आकर लगेगी… क्या कहेंगे उनके रिश्तेदार?

कहते हैं दीना पांड़े ने वर्षों पुरानी रंजिश भुलाकर अपने दरवाजे के सामने बारात लगने दिया था.. और जोर से कहा था..”किसी की बेटी समूचे गाँव की बेटी होती है.. उसकी इज्जत बढ़ेगी तो गांव की इज्जत बढ़ेगी.. “झगड़ा तो हम कोर्ट में निपटेंगे, फिलहाल गांव की इज्जत का सवाल है.

लेकिन दुःख की बात ये कि एक साल पहले दीना पांड़े चल बसे.. और उन्हीं के साथ चल बसी दुश्मनी निभाने की वो रवायत वो तहजीब.. वो लहजा.. जहाँ खेत के झगड़े बस कचहरी तक थे, दुआर के झगड़े बस दुआर तक!

आज समय बदला है… गांव हो या शहर, भाजपा हो कांग्रेस, वामपंथ हो या दक्षिणपंथ, माहौल बड़ा तेजी से परिवर्तित हो रहा…

आज कोई किसी को प्रेम से सुनने को तैयार नहीं.. केरल हो या बंगाल या हो फिर कर्नाटक.. डाभोलकर हों या कलबुर्गी या फिर हों प्रशांत पुजारी कोई किसी के आगे जरा सा झुकने को तैयार नहीं!

अपने दुश्मनों को रास्ते से हटाने की परंपरा सी चल पड़ी है.. जरा सा विरोधी विचार किसी से सहन नहीं होता.. सोशल मीडिया पर आए दिन गाली, गलौज, ब्लॉक स्क्रीन शॉट का जनाजा निकाला जा रहा… शायद कुछ लोगों के वश में होता तो फेसबुक स्क्रीन से बाहर निकलकर अपने वैचारिक विरोधी की हत्या भी कर चूके होते.. समझ में नहीं आता कि लोग लड़ने के लिए इतनी शक्ति कहाँ से लातें हैं…

एक बार पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि-

“शक्ति असंयमित व्यवहार में नहीं बल्कि अच्छी तरह व्यवस्थित कार्रवाई में निहित है. भारतीय संस्कृति की मौलिक विशेषता है कि यह जीवन को एक एकीकृत समग्र रूप में देखती है. वहां जीवन में विविधता और बहुलता है लेकिन हमने हमेशा इसके पीछे की एकता को खोजने का प्रयास किया है.”

लेकिन भाई साहब आज किसे फुर्सत है कि वो पंडित दीनदयाल उपाध्याय को पढ़े? एकता और अखंडता खोजने का ज्यादा से ज्यादा प्रयास करे.. आज तो पंडित जी को अपना वैचारिक पुरोधा मानने वालों ने भी उनके आदर्शों को भुला दिया है.

कल मैं बड़े दुख और खेद के साथ देख रहा था कि फेसबुक पर दिन भर अखंड राष्ट्रवाद की अखंड ज्योति जलाए फिरने वाले एक भाई साहब, कर्नाटक की महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का जश्न मना रहे हैं.. कह रहे हैं कि “बढ़िया हुआ जो कुतिया मर गयी..”

मुझे ये पढ़कर धक्का सा लग रहा है… कि आखिर लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो गए हैं.. इतने जजमेंटल… किसी को सजा देने का अधिकार किसी व्यक्ति को कैसे मिल गया? क्या ये देश अब व्यक्तिगत कानून से चलेगा…?

लोग किसी की हत्या का जश्न कैसे मना पा रहे हैं?

क्या हम दिन पर दिन अमानवीय होते जा रहे हैं? क्या इसके लिए बस दक्षिणपंथ या वामपंथ जिम्मेदार है? सोचने पर बड़े सवाल उमड़ते हैं… जवाब एक भी नहीं.

अब सबको समझने की जरूरत है कि राजनीतिक और वैचारिक विरोध चुनावी भाषणों, मंचों और सदनों में होता है… हथियारों से नहीं… कौन कितना बढ़िया और कौन कितना खराब है इसका निर्धारण जनता ‘बैलेट पेपर’ और अब ईवीएम से करती है, हथियार नहीं करते! कौन कितना दोषी है इसका फैसला बन्दूक नहीं करती अदालत करती है.

लेकिन देख रहा सब एक ही रंग में रंगे हैं… ज्ञान और विद्वता का सदैव दम्भ भरने वाले प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का दोष कम है क्या? ये जरा सा भी निरपेक्ष होते तो आज ये हालात ही उत्पन्न न होते.

आज गौरी लंकेश की हत्या पर ये भी खूब छाती-पीट रहे, लेकिन भी बेचारे अपनी मांद में तब छिप जाते हैं जब सीआरपीएफ के जवानों की नक्सलियों द्वारा हत्या पर इसी जेएनयू में विजय दिवस मनाया जाता है… या केरल में लगातार मारे जा रहे संघ बीजेपी के कार्यकर्ताओं को फर्जी बताया जाता है.

अरे भाई… एक आम आदमी को बहुत दुख तब होता जब किसी की हत्या होती है, लेकिन तब सबसे ज्यादा दुख होता है जब किसी की मौत पर मातम तो किसी की मौत पर जश्न मनाया जाता है.

इसलिए हे अखंड राष्ट्रवाद के नायकों… हे तथाकथित साम्यवाद के लाल रहनुमाओं… इस देश को बख्श दो अब..

इस देश को अभी बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा जैसी मूलभूत चीजों की जरूरत है.. न कि लाशों के राजनीति की… आपको अपनी राजनीति का केंद्र इन मुद्दों को बनाने की जरूरत है तभी इस देश और जनता का भला होगा.

केरल में मारे जाने वाला एक संघ और बीजेपी का कार्यकर्ता हो या बिहार में माफिया के खिलाफ लिखने वाला पत्रकार… या फिर कर्नाटक की एक्टिविस्ट गौरी लंकेश हों या फिर हिन्दू हो या मुसलमान, भाजपाई हो या कम्युनिस्ट, जब भी कोई मरता तो एक आदमी ही है.. आज नीरज याद आ रहें हैं-

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए.
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए.

जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए.

आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए.

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए.

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए.

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए.

Web Title: Political Ideology and Murders, Hindi Article, Atul Kumar Rai

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