ए बाबू सावधान: हमरे बाबा पहलवान थे..

एक गिरधारी बाबा थे. छह फीट के जबर जवान. सीना तान के चलते तो गांव-जवार में शोर हो जाता. मने कि दू कोस दूर से देखते ही मुँह से निकल जाता..” अरे गिरधारी बाबा अवतारे हो”..

गांव-जवार में बाबा का सब सम्मान करते क्योंकि बाबा अपने जमाने के चैपिंयन पहलवान थे. न जाने कहाँ-कहाँ के पहलवानों को अखाड़े में धूल चटा दिया था… बिहार-बंगाल में बाबा के सैकड़ो चेले थे. सो अखाड़े से बाहर भी बाबा का भौकाल टाइट था. उस जमाने में उनकी तूती बोलती थी.. सिबचन तो कहते कि “बाबा के पेशाब से दिया जलता है…”
मने मंत्री-विधायक सांसद उनका पैर छूते थे..

इधर बाबा ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में गांव में बड़ी काम किया. पोखरा खोनवाया. गांव में महावीर जी का मंदिर बनवाया. वहीं एक अखाड़ा की स्थापना किया… न जाने कितने नए-नवेले लौंडे दूध-बादाम छानकर बाबा की देख-रेख में पहलवान हो गए. याद नहीं बाबा ने कितनों को कुश्ती जितवाया… कहते हैं कि बाबा के संरक्षण में जो कुश्ती के दांव-पेंच सिख गया उसे हराने की कूवत किसी को नहीं हुई..

लेकिन हुआ क्या कि गिरधारी बाबा बूढ़ा गए.. बूढ़ा गये तो बूढ़ा गये.. आखिर बूढ़ा तो सबको होना ही है.. मृत्यु की तरह ये भी एक सत्य है.. लेकिन बाबा जब बूढ़ाये तो बड़ी फजीहत हुई.. हुआ क्या कि बाबा को ग्लानि होने लगी.. अपने इंग्लिश मीडियम नाती-पोतों के रहन-सहन से दुख होने लगा.. बाबा समझाते की “अरे! अभी तो कुछ दाव-पेंच सिख लो रे.. जीवन मे बड़ी काम देगा”.. लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी..

अब जो पहलवान आदमी अपने आगे किसी की एक नहीं सुना हो वो लाचार होकर जीवन के इस उत्तरार्ध में उपेक्षित सा रहने लगा.. अनमना सा रहने लगा.. उसे अपने नाती-पोतों के रहन-सहन पर संताप होने लगा.. ऐसा लगने लगा कि ये क्या मैंने किया.. “दुनिया भर को तो पहलवानी सीखा दिया.. न जाने कितने मेरे पीठ की धूल अपने पीठ में लगाकर पहलवान हो गए.. लेकिन ये कम्बख्त नाती-पोते एक दांव तक न सिख सके.. कम से कम धोबियापाट तो सिख लेते.. अब इनका क्या होगा ?

एक दिन बाबा इसी चिंता में इस असार संसार से चल बसे. बाबा जब मर गए, तब बाबा की विरासत सम्भाली उनके क्यूट से नाती चुनमुन बाबू ने! चुनमुन बाबू एकदम चॉकलेटी ब्वाय ड्यूड थे.. दिन भर फिलिम का गाना सुनते.. और रात भर चिट्ठी लिखते थे. खूब इतर-फुलेल लगाते और कॉलेज से पढ़कर आ रही बबिता सविता को जवान होते देखते.. कुछ तो कहते कि चुनमुन बाबू की सारी पहलवानी खेत में होती थी.

कहते हैं चुनमुन बाबु के इस रहन से आस-पास पड़ोस के लोगों ने आंखें तरेरना शूरु किया.. एक दिन
चुनमुन बाबू का लफड़ा हुआ गांव के दीना से.. चुनमुन बाबू बउवाए गए. तब तक दीना के लौंडे ने चुनमुन बाबू को पटक दिया.. चुनमुन बाबू बौखलाए..

“साले हमको पटकते हो. हमसे आंख मिलाते हो.. हमसे पंगा.. साले पंगा न लो. बाबा हमारे पहलवान थे.. साले हमरे बाबा के अखाड़े पर तुम्हारे बाबा नाक रगड़ते थे.. ई जो सड़क बनी है.. ई हमरे बाबा ने बनवाई.. ई जो स्कूल देख रहे हो.. ई हमरे बाबा की जमीन पर बना है.. हउ जो अस्पताल है उहो बाबा ने मंत्री जी से कह के बनवाया था. तनिक होश में रहो. बाबा हमारे पहलवान थे. आंख न मिलाओ हमसे..”

लेकिन अचानक जमाना बदला है.. आज गांव के चार फुटिया लौंडे अब कट्टा लेकर स्कार्पियो से घूमते हैं..
झट से सटा चुनमुन बाबू के कमर में सटा देते हैं कि सारी पहलवानी गायब हो जाती है..

मित्रों… आज गांव से आया तो एक कांग्रेसी मित्र मिले थे.. बड़े ही प्रचण्ड समर्थक हैं.. हमको रास्ते भर समझाते रहे..”आप क्या जानें आप अभी बबुआ हैं. अरे नेहरू ने ये किया इंदिरा, राजीव ने वो किया… नेहरू ने अस्पताल बनवाया राजीव ने स्कूल. इंदिरा ने पाकिस्तान को सबक सिखाया. राजीव ने कम्यूटर लगाया.. ब्लाह-ब्लाह टाइप… हमारे कान दुखने लगे.

हमने कहा कि अच्छा “मने आप हमको डरा रहें हैं कि आपके बाबा पहलवान थे.. मित्र हंसे.. मैं लौटते समय सोच रहा था की कितनी प्रासंगिक है ये कथा है. जरा गिरधारी बाबा की जगह नेहरू-इंदिरा को रख लीजिए… और चुनमुन बाबू की जगह राहुल जी को..

मुझे बड़ा अफसोस है कि इस देश मे एक मजबूत विपक्ष नहीं है… जो है भी वो यही कहकर अखाड़े में कूद जा रहा कि “हमारे बाबा पहलवान थे… डरो हमसे.. हमारे बाबा ने गांव में कुंआ बनवाया.. तुम उसी का पानी पीकर हमको ही हड़काते हो. बाबा के नाम पर गांव में अस्पताल बना है.. कैसे कृतघ्न हो जी.. बाबा हमारे पहलवान थे. और तुम गुणगान इस हथियार वाले का कर रहे हो.अरे कुछ तो लिहाज करो..”

बस आज का विपक्ष यही है.. जिसके पल्ले खुद तो कोई उपलब्धि नहीं. वो बस मेरे बाबा पहलवान थे… इसी सहारे लड़ रहा है और बार-बार अखाड़े में हार जा रहा है.. हारकर सामने वाले पहलवान का नक्शा निकाल रहा है.

इनको कौन समझाए की अरे! भाई बाबा का जमाना गया अब.. अब कुश्ती अखाड़े पर कम मैट पर ज्यादा लड़ी जाती है.. दांव-पेंच बदल गए हैं अब… बस बाबा के सहारे कुश्ती नहीं लड़ी जा सकती..आपको खुद पहलवान होना पड़ेगा… दांव-पेंच सीखना पड़ेगा.

किसी चार सौ करोड़ के पीके नामक पेंटर से डेंट-पेंट कराके पहलवान का कॉस्ट्यूम पहन लेने से आदमी पहलवान नहीं हो जाता.सर्दी,  गर्मी, बरसात में बड़ी पसीना बहाना पड़ता है.. हड्डियां तुड़वाणी पड़ती है.

लेकिन कौन समझाए युवराज और
उनके चेलों को… अरे ! ये बात जितनी जल्दी समझ मे आ जाएगी.. उतना ही अच्छा रहेगा.. इस देश के राजनैतिक अखाड़े में सकारात्मक और रचनात्मक राजनीति की पहलवानी करने वाले विपक्ष की जरूरत है.. ऐसे पहलवान की नहीं जो अखाड़े में उतरा ही नही.. और दूर से ही चिल्ला रहा कि
“बाबा हमारे पहलवान थे जी डरो हमसे..”

Web Title: Political Satire on Opposition in India, Atul Kumar Rai

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