मुंबईया सिनेमा की शुरुआत चाहे जो भी रही हो, किंतु धीरे-धीरे एक इंडस्ट्री के रूप में इसने विश्व भर में सर्वाधिक फिल्में बनाने का रिकॉर्ड यूं ही नहीं कायम किया है! बड़े पापड़ बेलने पड़े हैं इसके कर्ताधर्ताओं को… चूंकि, देश के कोने-कोने से लड़के-लड़कियां हीरो, हीरोइन, मॉडल बनने के लिए मुंबई शहर का रुख करते हैं, इसलिए उन्हें सही मार्गदर्शन दिखलाने के लिए तथाकथित ‘कैम्प्स’ को धन्यवाद तो बनता ही है. आखिर ‘कैम्पबाजी’ ही तो वह तत्व है, जिसके कारण फिल्म इंडस्ट्री में ‘कॉम्पिटिशन’ आता है और जब कॉम्पिटिशन होता है, तभी तो बढ़िया फिल्में निकलती हैं! पर काश कि बॉलीवुड के बड़े ‘कैम्पबाज’ यह समझ पाते कि उनकी कैम्पबाजी के चक्कर में इंडस्ट्री की बदनामी भी होती है, तो एक दूसरे के प्रति शत्रुता निकालने से ‘प्यार और मुहब्बत’ का सन्देश देने वाली फिल्म इंडस्ट्री ‘नफरत की सन्देश वाहक’ बन जाती है. यूं तो बॉलीवुड के भीतर कैंपबाजी को लेकर काफी समय से कयास लगाए जाते रहे हैं, किन्तु हाल-फिलहाल यह मामला सतह पर आ गया है. अमुक व्यक्ति, अमुक कैंप का है और कोई अन्य व्यक्ति दूसरे कैम्प का, इस तरह का खेल अब खतरनाक हो चला है, जो फिल्म इंडस्ट्री को बांटने की कगार पर खड़ा कर चुका है. इससे और कुछ हो न हो, किंतु एक दूसरे कैंप को नीचा दिखाने के लिए किए जाने वाले बद प्रयासों की वजह से बॉलीवुड का बदनुमा चेहरा ही उजागर हुआ है.

शाहरुख खान का वर्चस्ववादी ‘खेमा’

इस ‘खेमे’ को बॉलीवुड में सबसे बड़ा वर्चस्व रखने वाला भी माना जाता है, जो फिल्म-निर्माण से लेकर, फिल्म का डिस्ट्रीब्यूशन और कलाकारों में ग्रुप बाजी से लेकर हर उस कार्य को अंजाम देता है, जिससे इस खेमे का वर्चस्व बना रहे. आपको याद होगा शाहरुख़ खान द्वारा अभिनीत फिल्म ‘जब तक है जान’ और अजय देवगन की ‘सन ऑफ सरदार’ के बीच हुए विवाद की, जिसे लेकर खूब हो हल्ला हुआ. अंततः शाहरुख खान ‘खेमे’ ने अपना वर्चस्व साबित किया और ज्यादा सिनेमाघरों में अपनी फिल्म को शामिल कराने में सफल रहा. अजय देवगन ने तब खूब शोर मचाया, किन्तु क्या मजाल की अजय की ओर से कोई आवाज उठा दे! कुछ वैसा ही फिर हुआ, जब शाहरुख खान की ‘रईस’ और रितिक रोशन की ‘काबिल’ को लेकर टकराहट सामने आयी.

बॉलीवुड से जो खबरें छन-छनकर बाहर आईं, उसके अनुसार शाहरुख खान ने अपनी फिल्म को प्रमोट करने और राकेश रोशन की काबिल को पीछे करने के लिए हर वह तरीका अपनाया, जो संभवतः पर्दे के बाहर आने पर गलत कहा जाएगा.

पर परदे पर ‘रोमांस किंग’ का खिताब हासिल कर चुके शाहरुख़ खान को गलत-सही से मतलब नहीं होता है, इसलिए वह येन-केन-प्रकारेण अपना हित देखने में यकीन करते हैं. ठीक उनकी हालिया फिल्म ‘रईस’ के डायलॉग की तरह … “जो धंधे के लिए सही वो सही, और जो धंधे के लिए गलत, वो गलत”!

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करण जौहर की ‘ग्रुपिज्म’

वैसे तो करण जौहर को भी शाहरुख़ खेमे का ही माना जाता है, किन्तु करण जौहर के ‘खेमेबाजी’ की पोल भी कई बार खुल चुकी है. हाल फिलहाल फिल्म अभिनेता गोविंद ने करण जौहर पर खुलकर वार किया है और करण को इंडस्ट्री का सबसे चालाक और खतरनाक व्यक्त‍ि बताया. गोविंदा ने कहा है कि करण जौहर ने बॉलीवुड में ग्रुपिज्म को हवा दी है और वह उन अभिनेताओं की बिल्कुल परवाह नहीं करते जो उनके ग्रुप में शामिल नहीं हैं. साफ़ जाहिर है कि करण जौहर के हाथ ‘बेहद लंबे’ हैं. मामला यहाँ तक भी रहता, तो कुछ हद की गुंजाइश थी, किन्तु आपको करण जौहर पर अजय देवगन की ‘शिवॉय’ फिल्म के बारे में दुष्प्रचार करने के लिए लगे आरोप तो याद ही होंगे.

तब बाकायदा करण जौहर के बारे में तथाकथित फिल्म समीक्षक ‘केआरके’ को 25 लाख रूपये देने के आरोप लगे थे, क्योंकि आरोप के अनुसार करण जौहर चाहते थे कि ‘केआरके’ शिवाय की बुराई करें.

वैसे भी करण जौहर के बारे में कहा जाता है कि टैलेंटेड होने के साथ-साथ बॉलीवुड में बातें इधर से उधर करने में उनका कोई मुकाबला नहीं है और दबी जुबान से गोविंदा की कही बातों को कई लोग सच भी मानते हैं.

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ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड में सिर्फ नकारात्मक खेमे ही हैं, बल्कि दूसरे ऐसे खेमे भी हैं, जिनका अपना अंदाज है और वह नयी प्रतिभाओं को ‘लांच’ करने और उन्हें ‘प्रमोट’ करने में यकीन करते हैं. हालाँकि, कई बातें दबी परतों के बीच ही रह जाती हैं, जो तब सामने आती हैं जब मामला कंट्रोल से बाहर जा चुका होता है…

भट्ट कैम्प

नयी प्रतिभाओं को चांस देने के मामले में ‘भट्ट कैम्प’ का कोई मुकाबला नहीं है. बड़े स्टार्स की बजाय न्यू कमर को चांस देकर, उनसे 2 चार साल या 3 चार फिल्मों का अनुबंध करने के लिए यह ‘कैम्प’ जाना जाता है. हालाँकि, गाहे बगाहे इस ‘कैम्प’ पर भी शोषण का आरोप लगा है, किन्तु सामान्य तौर पर यह कैम्प दूसरे को गिराने में नहीं लगता है. कम से कम प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं ही!

एकला चलो रे …

  • इस सीरीज में कई बड़े सितारे शामिल हैं. आमिर खान का अगर नाम लें तो वह ‘एकला चलो’ ग्रुप के सबसे बड़े नाम माने जा सकते हैं, जिनकी फिल्मों से कोई दूसरा ‘कैम्प’ नहीं टकराता है. वैसे आमिर खान पर फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों के काम में हस्तक्षेप का आरोप जरूर लगता है, किन्तु दूसरों को गिराने में इस सितारे का नाम प्रत्यक्ष रूप से कभी नहीं सुना गया है.
  • अमिताभ बच्चन, जिन्हें बॉलीवुड का ‘शहंशाह’ कहा जाता है, वह ‘किसी खेमे में नहीं और सबके साथ’ रहते हैं. बड़े मुद्दों पर अमिताभ बच्चन के बोलने की उम्मीद की जाती है, किन्तु विवादों से यह बड़ा अभिनेता इतना ज्यादा बचता है कि जहाँ अपनी राय रखनी चाहिए, वहां भी यह चूक जाता है. दबी जुबान में अमिताभ बच्चन के इस ‘रवैये’ की आलोचना भी होती है, किन्तु उनके सामने कोई आने की हिम्मत नहीं करता है.
  • सलमान खान, अक्षय कुमार, अजय देवगन, सोनम कपूर जैसे कलाकारों को भी ‘एकला चलो’ की श्रेणी में रखा जा सकता है. हालाँकि, यह तीनों-चारों अभिनेता हाल-फिलहाल कई सामाजिक/ राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने लगे हैं, किन्तु ‘खेमेबंदी’ जैसी शब्दावली से अभी तक ये दूर ही रहे हैं.
  • कपूर खानदान के रूप में बॉलीवुड के पास एक मजबूत ‘इतिहास’ रहा है, किन्तु हाल-फिलहाल यह सारा बोझ रणवीर कपूर के कन्धों पर आ टिका है. चूंकि करीना अब शादी करके सेटल हो चुकी हैं! वैसे, रणवीर अभी ‘लड़कपन’ और ‘प्लेबॉय’ की छवि में ही घूम रहे हैं. हालाँकि, उन्हें तेज दिमाग का माना जाता है, किन्तु प्रत्यक्ष रूप से वह किसी ‘गैंग’ में शामिल नहीं दिखे हैं.

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कुल मिलाकर देखा जाए तो बॉलीवुड के रूप में हमारे पास एक सशक्त माध्यम है, जिससे समाज में सार्थक बदलाव लाया जा सकता है. पर तब दुःखद स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जब विभिन्न मुद्दों पर बॉलीवुड में आपसी टकराहट इतनी ज्यादा बढ़ जाती है, जहाँ से नकारात्मकता उत्पन्न होने लगती है. ऐसे में ‘फिल्म इंडस्ट्री’ और उसके खेवनहार हास्य के पात्र बन जाते हैं और एक ‘रोल मॉडल’ के रूप में खुद को प्रस्तुत करने से चूक जाते हैं.

बात तब और गंभीर हो जाती है, जब बॉलीवुड में लाखों नयी प्रतिभाएं अपना कैरियर बनाने आती हैं, किन्तु ‘गैंगबाजी’, खेमेबंदी और ‘ग्रुपिज्म’ जैसे शब्दों से उनका कैरियर नकारात्मकता से घिर जाता है.

जाहिर है, ऐसे में इन सब चीजों को सार्थक तो नहीं ही माना जा सकता और बेहतर होगा अगर इन सबसे उबरकर बॉलीवुड क्वालिटी पर ध्यान दे. शायद तब करण जौहर जैसे लोग ‘बाहुबली‘ डिस्ट्रीब्यूट करने के साथ-साथ वैसी फिल्में बना भी सकेंगे … है कि नहीं?

Web Title: Camps of Bollywood, Hindi Article

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