2014 के बीबीसी वर्ल्ड सर्विस सर्वे (Link in English) के अनुसार, 35% भारतीय चीन के खिलाफ नकारात्मक रूख रखते हैं तो इतने ही प्रतिशत चीनी भारतीय गणतंत्र के खिलाफ नकारात्मक धारणा से भरे हुए हैं. इसी पोल के अनुसार जहाँ 33% भारतीय चीन को लेकर सकारात्मक हैं, तो मात्र 27% चीनी ही भारत को लेकर पॉजिटिव हैं.

यह तो रही पुरानी बात, किन्तु हाल ही के विवाद के बाद द चारहार इंस्टिट्यूट के लोंग शिन्चुन कहते लिखते हैं कि भारत में 200 से ज़्यादा चीनी मामलों के विशेषज्ञ नहीं हैं. इनमें से भी मात्र 10 फ़ीसदी लोग मंदारिन पढ़ या बोल सकते हैं.

लोंग शिन्चुन के विचार अपनी जगह सही या गलत हो सकते हैं, किन्तु चीन के बारे में न केवल भारतीयों की बल्कि शेष विश्व की समझ भी कमोबेश यही है. समझना मुश्किल है कि आखिर चीन इतनी छुपम छुपाई खेलकर वैश्विक लीडर बनने का सपना कैसे पाल रहा है? समझना मुश्किल यह भी है कि फेसबुक, ट्विटर, गूगल, विकिपीडिया जैसी तमाम ऑथेंटिक और बड़ी वेबसाइट यहाँ पर ब्लॉक्ड हैं, तो आखिर लोग बाग इस बड़े देश को समझें तो किस तरह? आखिर इस समस्या की जड़ और उसका हल क्या हो सकता है?

रही बात भारत की तो परसेंटेज में बेशक थोड़ा ऊपर नीचे हो जाए, किन्तु 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों देश की जनता एक दूसरे के प्रति बड़ी संख्या में आशंकित रही है. सच कहा जाए तो युद्ध के 5 दशक बीत जाने के पश्चात् भी उसके घाव भरे नहीं है, बल्कि ताजे ही हैं. यह तब है जब चीन और भारत बड़े ट्रेड पार्टनर बन चुके हैं और चीनी कंपनियां बड़ी संख्या में भारतीय उपक्रमों में निवेश कर रही हैं. इन दोनों देशों का संभवतः एक दूसरे के प्रति नजरिया और रूख सबसे बड़ी समस्या बन कर सामने आया है.

आखिर ऐसा क्यों है और डोकलाम में चल रहे हालिया विवाद की दिशा किस तरफ मुड़ रही है? विभिन्न चरणों में इस अनसुलझी गुत्थी को समझने का थोड़ा बहुत ही सही, प्रयास किया जाना आवश्यक है.

पश्चिम से प्रतिद्वंदिता की आड़ और…

चीनी प्रशासन का सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स

बीते दशकों में चीन और भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ी है और इसका कारण कोई छिपा नहीं है. इन देशों की विशाल जनसंख्या ही इस प्रगति का इंजिन बना है. जाहिर तौर पर अब तक वैश्विक राजनीति को घुमाते रहने वाले अमेरिका सहित पश्चिमी देशों को इस मजबूती से कहीं न कहीं असुरक्षा महसूस हुई है. इस असुरक्षा का परिणाम ही है कि अपेक्षाकृत विकसित देश एशियाई देशों को लेकर पिछले दशकों में ‘ख़ास’ किस्म की ग्रंथि का शिकार रहे हैं. खासकर चीन यह आरोप लगाता है कि उसे लेकर प्रोपोगंडा फैलाने की कोशिश हुई है, किन्तु इससे बढ़कर सच यह है कि चीन के नेतृत्व ने इसे बहाना बनाकर अपने देश और विदेश की नीतियों में ट्रांसपेरेंसी की गुंजाईश बेहद कम कर दी. लोकतंत्र तो छोड़िये ही, सामान्य मानवाधिकारों के कुचलने की बड़े पैमाने पर खबरें आईं और इस बीच चीनी नेतृत्व मजबूत होता चला गया.

जाहिर तौर पर पिछले तीन दशकों में अर्थव्यवस्था मजबूत होने से चीन का दखल वैश्विक राजनीति में बढ़ा तो दक्षिण एशिया में वह भारत को घेरने की रणनीति बनाने को कोशिशों में जुट गया. इस बीच अमेरिका का नियंत्रण पाकिस्तान पर कमजोर पड़ा तो पाकिस्तान पूरी तरह चीन के पाले में जा बैठा. इस दौरान वैश्विक हालात में कुछ और घटनाएं हुईं, जैसे दक्षिणी चीन सागर पर चीन की मनमानी, उत्तर कोरिया विवाद पर अमेरिका द्वारा मदद मांगना और न्यूक्लियर सप्लॉयर ग्रुप में उसके वीटो के चलते भारत की एंट्री न होना. इन घटनाओं और तात्कालिक सफलताओं से चीनी प्रशासन की मानसिकता ‘सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स’ से ग्रसित हुई मालूम पड़ती है. अगर ऐसा न होता तो चीनी सेना के प्रवक्ता ‘डोकलाम विवाद’ पर यह कहने का ज़ोखिम नहीं उठाते कि ‘पहाड़ को हिलाना संभव है, किन्तु चीनी सेना को अपनी जगह से हटाना असंभव है.’

जाहिर तौर पर यह युद्ध की मानसिकता से ग्रसित बयान ही है, जिसकी जड़ में ‘उत्कृष्टता ग्रंथि’ छिपी हुई है. कहीं न कहीं इस ग्रंथि का बीजारोपण चीन अपने देश की जनता में भी लगातार करता रहा है. कहा जा सकता है कि यह खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है.

छोटे देशों को दबाने की रणनीति

चीन को लेकर शायद ही कोई देश विश्वास से कह सके कि वह उसे दबाएगा नहीं, पाकिस्तान को छोड़कर! चूंकि, पाकिस्तान तो वैसे ही उस पर आश्रित हो चुका है. पर दूसरे देशों में चीनी रणनीति के खिलाफ लोग बाग सड़कों पर मजबूती से उतरे हैं. भारत सरकार के मजबूत विरोध से चीन को इस बार बेशक झटका लगा हो, किन्तु चीन की फितरत हमेशा से छोटे पड़ोसी देशों पर दबाव बनाकर, उनसे अपनी बात मनवाने की रही है. चीन का यह दबाव आर्थिक क्षेत्र में भी रहा है. तजाकिस्तान, किर्गिस्तान, वियतनाम, लाओस, कम्बोडिया, ताइवान और जापान तक चीन के इस दबाव का शिकार हुए हैं. यह बात भी सामने आयी है कि कोई देश अगर ब्याज ज्यादा होने की वजह से लोन नहीं चुका पाता है तो चीन उस प्रॉजेक्ट और जमीन का अधिग्रहण कर लेता है.

कई पड़ोसी देशों के साथ जमीनी और समुद्री सीमा विवादों की वजह से चीन के संबंध खराब हुए हैं और इसका न केवल एशियाई, बल्कि वैश्विक राजनीति पर भी बुरा असर पड़ा है.

थोड़ी तथ्यात्मक बातें करें तो चीन 13 देशों के साथ तकरीबन 22,000 किलोमीटर का बॉर्डर शेयर करता है. इनमें नॉर्थ कोरिया, रूस, मंगोलिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाओस और वियतनाम शामिल हैं. पाकिस्तान के साथ भी चीन की सीमा है, पर वह पाक द्वारा क़ब्ज़ाये गए कश्मीर के जरिए है. दिलचस्प बात यह है कि पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद के अधिकतर मामलों में चीन का दावा सदियों पुराने अप्रमाणित इतिहास पर आधारित रहा है. सबसे ताजा उदाहरण भूटान का ही है, जिसमें अनाधिकृत इतिहास का ज़िक्र करते हुए चीन कह रहा है कि डोकलाम इलाके का इस्तेमाल तिब्बत के लोग पारंपरिक चारागाह के रूप में करते रहे हैं.

अब यह क्या बात हुई भला?

अगर यह तर्क भारत भी अपनाये तो अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत और एशिया के ज्यादातर क्षेत्र प्राचीन भारत के हिस्से के रूप में नज़र आएंगे. ऐसे ही अगर ब्रिटिश अपने काल का इतिहास बताने लगें तो पूरा विश्व उनका ही तो उपनिवेश था. ऐसे ही कुतर्क अपनाकर इस्लामिक स्टेट के आतंकी सम्पूर्ण विश्व को खलीफाई साम्राज्य के तहत लाने की कोशिश करते रहे हैं. पर सच्चाई आज की है और यह न्यायोचित भी है कि चीन जैसा बड़ा देश भूटान या दूसरे देशों के साथ विवादित हिस्सों पर ज़ोर ज़बरदस्ती करने की प्रक्रिया न अपनाये.

समुद्री विवाद को ही ले लीजिये. आठ दक्षिण-पूर्वी देशों जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई, इंडोनेशिया और ताइवान ने चीन के खिलाफ हाथ मिलाया है और अंतर्राष्ट्रीय अदालत तक ने उसके खिलाफ फैसला दिया है, किन्तु क्या मजाल चीन टस से मस हो जाए. ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि चीनी प्रशासन के लोग ख्वाबी दुनिया में जी रहे हैं और शेष विश्व को अपनी विस्तारवादी नीतियों से दबाने का ख्वाब देख रहे हैं.

इन तथ्यों पर जब नज़र दौड़ाते हैं तो चीनी विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ वैश्विक मोर्चा जरूरी लगता है. यह मोर्चा न केवल विश्व के देशों के बीच हो, बल्कि चीन के भीतर और बाहर उसके नागरिकों से कम्युनिकेशन के लिए भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए. युद्ध के नुक्सान के बारे में न केवल वहां की सरकार, बल्कि वहां के आम जनमानस को भी समझ होनी चाहिए. इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन जैसे देशों का विस्तारवादी हठ सम्पूर्ण विश्व को युद्ध की विभीषिका में झोंक सकता है. इसलिए सेना और ताकत के बारे में ‘उत्कृष्टता ग्रंथि’ को त्यागकर वैश्विक कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ा जाना चाहिए.

हां, अगर चीनी सेना इतनी ही ताकतवर है तो जहाँ आतंकवाद फ़ैल रहा है, वहां वह शान्ति अभियानों में जाए. उत्तर कोरिया का तानाशाह किम जोंग उन, जो पड़ोसी देशों पर परमाणु हमले की धमकी देता है, उसे संभाले.

पाकिस्तान में छिपे आतंकियों पर लगाम लगाए चीन की सेना, जो उसके नागरिकों को भी निशाना बना रहे हैं. पर असल सवाल वही है कि क्या चीन वाकई ऐसा करेगा या फिर… !!

Web Title: China’s Expansionist Policy, Worldwide, Hindi Editorial

Keywords: Indo China Clashes, China Bhutan Clash, China Japan Clash, South China Sea, China and Small Countries, Chinese People and Democracy, Being World Leader, World Politics, International Politics, Indian Sub Continent

Featured image credit / Facebook open graph: neverstoplearning