गोवा और उत्तराखंड दो ऐसे प्रदेश रहे हैं, जहाँ के मुख्यमंत्रियों को हालिया विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है. उत्तराखंड के हरिद्वार ग्रामीण सीट और किच्छा, दोनों जगहों से मुख्यमंत्री हरीश रावत हार गए हैं. जबकि गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर को भी शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा है. गौरतलब है कि पारसेकर को मनोहर पर्रिकर के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद नवंबर, 2014 में गोवा का मुख्यमंत्री बनाया गया था.

इनके दुःख और कष्ट पर आगे बात करेंगे, किन्तु सबसे दुःख की बात केजरीवाल के लिए है. राष्ट्रीय नेता और उसमें भी प्रधानमंत्री बनने का भूत उन पर अब तक सवार था, जो पंजाब और उससे बढ़कर गोवा के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद निश्चित रूप से उतर गया होगा. खैर, गोवा की 40 सीटों के लिए इस बार 83 प्रतिशत का भारी मतदान हुआ था और इस मतदान को सभी पार्टियां अपने अपने तरीके से आंकलित कर रही थीं, किन्तु किसका आंकलन ठीक निकला और किसका गलत, यह सामने है.

केजरीवाल का ‘अंडा’

सोशल मीडिया पर अरविन्द केजरीवाल को लेकर वैसे ही जोक बनाये जाते रहे हैं, किन्तु इस बार उनकी परफॉरमेंस ने उनके विरोधियों को जबरदस्त मौका दे दिया है. किसी फेसबुकिये ने अपनी वाल पर लिखा कि-“गोवा में अरविन्द केजरीवाल ने मुर्गियों से प्रतिस्पर्धा करते हुए ‘अंडा’ दिया है”.

जाहिर है केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के लिए यह बड़े आत्ममंथन का अवसर है. जिस तरह से पार्टी के मुख्य रणनीतिकारों को एक-एक करके केजरीवाल ने साइडलाइन किया उस पर उन्हें माफ़ी मांगने की आवश्यकता है.

आखिर योगेंद्र यादव जैसे पार्टी के चाणक्यों सहित प्रशांत भूषण और दूसरे नेताओं की अनदेखी कर केजरीवाल ने अपनी महिमा को ही श्रेष्ठ बताना उचित समझा तो उसका नतीजा यही आया कि अब वह दिल्ली तक सिमट गयी है. पंजाब या गोवा में जो थोड़े बहुत नेता उससे जुड़े थे, उनमें वह नेता ज्यादा थे जिन्हें इस पार्टी द्वारा ‘दिल्ली वाला करिश्मा’ दुहराने की उम्मीद थी. जाहिर है, अब जबकि ऐसा नहीं हुआ है तो वह तेजी से छिटकेंगे भी और ऐसे में यह पार्टी दिल्ली में सिमट गयी है. ‘आप’ ने गोवा के लिए पूर्व नौकरशाह एल्विस गोम्स को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था, जो खुद अपनी सीट नहीं बचा पाए. वैसे गोम्स पर कई तरह के आरोप लगाए गए, जो अंततः उनके साथ ‘आम आदमी पार्टी’ को भी ले डूबा.

भाजपा का परफॉरमेंस ‘इसलिए’ बुरा रहा

गोवा में भाजपा की जड़ें बेहद मजबूत रही हैं और केंद्र में रक्षामंत्री का दायित्व संभाल रहे मनोहर पर्रिकर के रूप में उनके पास एक अतिरिक्त प्रचारक भी था, जिसकी सादगी की चर्चाएं न केवल गोवा में, वरन देश भर में होती रही हैं. तो ऐसे में पार्टी का प्रदर्शन गोवा में इतना बुरा कैसे हो गया? हालाँकि, पहले वहां भी पंजाब की ही तरह त्रिकोणीय मुकाबले की बात कही जा रही थी, किन्तु मामला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रह गया. भाजपा और कांग्रेस कमोबेश बराबरी पर ही छुटे हैं, किन्तु भाजपा की परफॉरमेंस इसलिए बुरी मानी जा सकती है, क्योंकि इसका ग्राफ इस प्रदेश में ऊपर से नीचे की ओर आया है. इसका एक बड़ा कारण वहां के मुख्यमंत्री का अलोकप्रिय होना था, और खुद उनके चुनाव हारने के बाद यह बात प्रमाणित भी हो गयी है.

गौरतलब है कि आरएसएस के वरिष्ठ नेता रहे सुभाष वेलिंगकर भारतीय भाषा सुरक्षा मंच नामक संगठन के माध्यम से राज्य की बीजेपी सरकार की इस बात को लेकर आलोचना करते रहे थे कि सरकार कोंकणी और मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेज़ी को तरजीह दे रही है.

Goa Election Results 2017, Subhash Velingkar (Pic: newsmanthan.com)

सुभाष वेलिंगकर ने खुलकर चेताया था कि बीजेपी गोवा में विधानसभा चुनाव हार सकती है. हालाँकि, उन्हें आरएसएस ने सभी दायित्वों से मुक्त कर दिया था पर उसी दिन 400 से अधिक आरएसएस कार्यकर्ताओं ने संघ से इस्तीफा दे दिया था. यह खबर राष्ट्रीय सुर्खी बनी. इसके अतिरिक्त मनोहर पर्रिकर का सही उत्तराधिकारी नहीं मिल पाना भी गोवा भाजपा के लिए नुकसानदायक साबित हुआ.

कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, मगर…

आम आदमी पार्टी को जिस तरह गोवा की जनता ने नकारा, उससे साफ़ जाहिर होता है कि भाजपा विरोधी वोट पूरी तरह ‘कांग्रेस’ की झोली में गिरे. 37 सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था और समझा जा सकता है कि मामला उसके लिए ठीक ठाक रहा. कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत अपनी सीट से जीत चुके हैं और कांग्रेस के लिए यह सुकून वाला परिणाम रहा है गोवा का चुनाव!

चूंकि, कई राज्यों में कांग्रेस की हालत खस्ता है, ऐसे में गोवा और पंजाब का परिणाम उसके लिए स्थानीय तौर पर कुछ न कुछ तो राहत लाएगा ही.

2014 की हार के बाद खुद को फिर से जिंदा करने की कोशिश में जुटी कांग्रेस गोवा में अपने सहयोगी दल एनसीपी के अलग होने से मुश्किलों में थी. गौरतलब है कि एऩसीपी ने 17 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था. जाहिर तौर पर इन सभी उलझनों से कांग्रेस की सीटें कुछ कम रह गयीं.

Goa Election Results 2017, Digambar Kamat (Pic: deccanchronicle.com)

गोवा चुनाव के सन्दर्भ में देखें तो यहाँ तिकड़म से सरकार बनती नज़र आ रही है. चूंकि, भाजपा कांग्रेस से 4 सीटें ही पीछे है, इसलिए जोड़ तोड़ से इनकार नहीं किया जा सकता. देखना दिलचस्प होगा कि सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और भाजपा में कौन बाजी मारता है. हालाँकि, जोड़ तोड़ से सरकार की स्थिरता पर अवश्य ही प्रश्नचिन्ह खड़े होंगे, किन्तु इसके सिवाय विकल्प ही क्या है?

Web Title: Goa Election Results 2017, Hindi Article

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