महान विद्वान चाणक्य ने कहा है कि-

यस्मिन देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बांधव:।
न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि जिस देश में न सम्मान हो, न रोजी हो, न कोई मित्र या भाई या रिश्तेदार हो, जहां विद्या न हो, जहां कोई गुण न हो वैसे स्थानों पर निवास नहीं करना चाहिए.

आप ध्यान से देखें तो महान राष्ट्र निर्माता के तौर पर प्रतिष्ठित चाणक्य यहाँ आम जनमानस की समस्यायों और उसके लक्षणों की बात कर रहे हैं, पर हाल-फिलहाल चलन आया है कि सोशल मीडिया से लेकर तमाम चैनलों पर लोग बाग़ कोरे राष्ट्रवाद का नाम ले लेकर आपको और जनता की समस्यायों की बात करने वालों को पानी पी पीकर गरिया रहे हैं. कुछ लोग गोरक्षक बन कर लोगों की हत्या तक करने में संकोच नहीं कर रहे हैं, तो कई बड़े-बड़े नेता बात बेबात लोगों को पाकिस्तान भेजने को तैयार रहते हैं.

पिछले दिनों एक के बाद एक तीन ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने मुझ सहित कइयों को झिंझोड़ दिया होगा. इनमें से एक घटना थी छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली आतंकियों द्वारा सीआरपीएफ के दो दर्जन से अधिक जवानों की नृशंस हत्या. इससे एकाध दिन पहले ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों द्वारा मूत्र पीना और इंसानों की खोपड़ियों के साथ किया गया प्रदर्शन समूची मीडिया में छाया रहा था. और इससे भी कुछ दिन पहले जम्मू कश्मीर में हुए एक उप चुनाव में लगभग 7% के आस पास मतदान होना.

देखा जाए तो यह तीनों घटनाएं अलग-अलग प्रकृति और अलग स्थानों की हैं, किन्तु इनमें एक समानता तो अवश्य है कि यह सभी घटनाएं सरकारों की असफलता से भी जुड़ी हुई हैं. खासकर, केंद्र सरकार से लोग इस मामले में जवाबदेही मांगेगे ही, पर जवाबदेही की आवाज़ को कुछ यूं दबाने की कोशिश हुई.

छत्तीसगढ़ में पिछले 13 सालों से लगातार भाजपा सरकार होने के बावजूद, केंद्र में मजबूत बीजेपी सरकार होने के बावजूद इस क्रूर हमले की जवाबदेही सरकार ने ‘कड़ी निंदा’ और ‘मुलायम श्रद्धांजलि’ तक ही सीमित रखी. सरकार के तथाकथित रक्षक सोशल मीडिया पर उतर गए और लगे वामपंथियों को गरियाने. कई लेखक, ब्लॉगर जेएनयू को कोसने लगे.

अरे भाई, भारत भर में 785 के आसपास विश्वविद्यालय हैं. ले देकर एक जेएनयू और एकाध और विश्वविद्यालयों का उदाहरण दिया जाता है वामपंथियों के गढ़ के रूप में, जिससे नक्सलाइट बढ़ा है. मतलब बाकी के 780 विश्वविद्यालय घास छील रहे हैं, जो इसकी काट तैयार नहीं हो पा रही है?

Government Accountability, Naxal Attack in Chhattisgarh (Pic: thequint)

यदि कोई और सरकार से जवाबदेही मांगता है तो उसे दलाल, वामपंथी कहकर उसकी आवाज़ चुप कराने की कोशिश की जाती है. पिछले दिनों गुरमेहर कौर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. गुरमेहर ही क्यों, दूसरा कोई भी सरकार से प्रश्न पूछ ले, तो तथाकथित राष्ट्रभक्तों की नज़र में या तो वह वामपंथी है, या देशद्रोही या फिर पाकिस्तान परस्त तो निश्चित ही है.

यही हाल किसानों के प्रदर्शन में भी हुआ. लोग उन्हें वामपंथी, नौटंकी, पेट निकला हुआ और जाने क्या क्या कह कर अपमानित करने लगे. मीडिया में एक अलग तरह की खबरें ही चलने लगीं… मानो उन किसानों ने कोई अनोखी बात या मांग कर दी हो. कोई उन्हें फ्लाइट से जाने वाला बताने लगा तो कोई उन्हें मिनरल वाटर पीने वाला बताने लगा. अरे भाई, अगर किसान वाकई इतने समृद्ध हैं तो फिर यूपी में किसानों की क़र्ज़ माफ़ी क्यों की गयी? आखिर, अमीरों की क़र्ज़ माफ़ी का क्या मतलब? उनकी बात कोई नहीं सुन रहा है तो वह अपने दिमाग के हिसाब से अलग तरीके अपनाकर अपनी ओर ध्यान खींच रहे हैं तो इसमें सही और गलत कहाँ से आ गया?

Government Accountability, Hindi Editorial Article, Farmers (Pic: huffingtonpost)

किसानों की समस्याएं क्या छलावा हैं? क्या सरकार से इस सम्बन्ध में जवाबदेही नहीं माँगा जाना चाहिए? तमिलनाडु के किसान ही क्यों, समस्त देश के किसानों की हालत डावांडोल है… पर कोई प्रश्न न पूछे सरकार से… अन्यथा तथाकथित कोरे राष्ट्रभक्त उसे गरियाने से परहेज नहीं करेंगे!

इसी तरह तीसरा मुद्दा ‘कश्मीर’ का है. इस बात में दो राय नहीं है कि घाटी के हालात दिन ब दिन बिगड़े ही हैं. फौज की तमाम कड़ाई और इंटेलिजेंस झोंक देने के बावजूद वहां के हालात लगातार बिगड़ रहे हैं. अब देशवासी जवाब किससे मांगे? मीडिया किससे जवाब मांगे कि भाई आपको तो राज्य और केंद्र में बहुमत मिला था हालात सुधारने के लिए, पर यह बिगड़ क्यों रहे हैं? पहले हुर्रियत के आतंकी और कुछ विरोधी धड़ों के लोग ही पत्थरबाजी करते थे, पर इधर आम कश्मीरी लड़के-लडकियां भी सड़कों पर पत्थरबाजी करते दिख रहे हैं. ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार से सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए? कौन देगा भाई जवाब ?

पर नहीं, सवाल पूछने का मतलब गाली खाना है, ऊपर से देशद्रोही का टैग लगे सो अलग!

Government Accountability, Hindi Editorial Article, Kashmir Issue (Pic: youtube)

तो क्या आम-ओ-खास को कोरे राष्ट्रवाद का सिद्धांत स्वीकार कर लेना चाहिए, जिसमें जनता की समस्याओं का कोई ज़िक्र न हो? क्या सरकार की हाँ में हाँ मिलाकर उभर रही बड़ी समस्याओं पर चर्चा करने की प्रवृत्ति हमें त्याग देनी चाहिए? क्या अच्छे दिन का गुलाब सूंघने वालों की तरह हमें भी आत्ममुग्ध हो जाना चाहिए?

वस्तुतः सुकमा जवानों के नरसंहार का आरोप वामपंथियों पर, कश्मीर में पत्थरबाजी का आरोप पाकिस्तान पर, किसानों के दुःख दर्द व्यक्त करने का आरोप किसी एनजीओ पर लगा कर सरकार को साफ़ बचाने की कोशिश करने वाले पुराने समय के उन लोगों में से हैं, जो गाँव में कोई आपदा चोरी या साजिश होने पर किसी औरत पर अदृश्य ताकत के होने का आरोप लगाते थे और उसे चुड़ैल-चुड़ैल कह कर पत्थर मारने के लिए पूरे गाँव को उकसाते थे…. ताकि असल मामला ही लोग भूल जाएं.

आप देखिये, अपने आस पास ऐसे लोग हैं न… जो साजिश और नाकामी छिपाने के लिए किसी को भूत और चुड़ैल बनाकर… !पर तब क्या होगा, जब असल समस्याएं चुड़ैल के खोल से बाहर आ जाएँगी. हाल-फिलहाल ऐसा ही हो रहा है. समस्याएं बड़ी हो रही हैं, किसी भूत-चुड़ैल या वामपंथी, देशद्रोही से बड़ी… अब तो सरकार सामने आये… कि अब भी नहीं ??

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Web Title: Government Accountability, Hindi Editorial Article

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