Punjab Election 2017 Political Analysis Article in Hindi (Pic credit: Team Roar)

2017 शुरू हुआ नहीं कि देश में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज गई. यूं तो उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव कहीं ज्यादा चर्चा में है, क्योंकि एक तरफ यह देश का सबसे बड़ा राज्य है ही, तो दूसरी ओर वहां सत्ताधारी समाजवादी पार्टी में सिर-फुटव्वल मची हुई है. इस बीच, अगर गहन राजनीतिक विश्लेषण किया जाए तो पंजाब चुनाव का राष्ट्रीय महत्त्व उत्तर प्रदेश के चुनाव से भी ज्यादे महत्व का है इसका कारण कुछ यूं समझिए कि उत्तर प्रदेश चुनाव में वहीं राजनीतिक पार्टियां ही मैदान में हैं, जो हमेशा से राज्य की सत्ता पर काबिज रही हैं, मसलन सपा, बसपा, भाजपा! कांग्रेस यूपी में चुनाव जरूर लड़ रही है, किन्तु उसके पास खोने-पाने के लिए कुछ ख़ास है नहीं. हालांकि, 15 साल सत्ता से दूरी के बाद भाजपा भी इस बार यूपी में सत्ता पर दावेदारी ठोक रही है, पर समग्रता में देखा जाए तो यूपी में यही तीन पार्टियां चुनावी मुकाबले में हर बार की तरह रहने वाली हैं. वहीं जब बात करते हैं पंजाब की तो यहाँ का मामला स्पष्ट रूप से दूसरा नज़र आता है. इसके विभिन्न कारण हैं, जिसमें सबसे बड़ा कारण है ‘कांग्रेस और आम आदमी पार्टी’ में मुकाबला. वस्तुतः इनका चुनावी मुकाबला राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा असर छोड़ने वाला है और इसकी क्रमवार व्याख्या करने पर यह बात पूरी तरह साफ़ हो जाती है.

“आप” की अग्नि परीक्षा

देश में हुए अन्ना हजारे का विशाल आंदोलन हम सबको याद ही होगा, जिसके फलस्वरुप आम आदमी पार्टी का उदय हुआ और दिल्ली में उसने जबरदस्त ढंग से सफलता भी अर्जित की. आखिर, 70 में से 67 सीटें जीतना कोई साधारण घटना नहीं मानी जा सकती है, पर धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का ‘जल्दबाज ख्वाब’ देखने वाले अरविंद केजरीवाल ने अपनी चमक तेजी से खोई है. हालाँकि, कहने को तो उनकी पार्टी वाले पंजाब में भारी जीत के दावे कर रहे हैं और तमाम प्री-पोल सर्वेक्षणों में भी यही दिखाया जा रहा है कि आम आदमी पार्टी पंजाब की सत्ता पर काबिज हो सकती है, किन्तु मामला इतना आसान भी नहीं है. केजरीवाल की असल परीक्षा इसी बात को लेकर होनी है कि दिल्ली के पढ़े लिखे वोटर्स के साथ निचले तबके के लोगों को सपने दिखाकर वह दोबारा सीएम तो बन गए, किन्तु फ्री वाईफाई से लेकर रोजगार और प्रदूषण तक के मोर्चे पर वह कुछ ख़ास हासिल नहीं कर सके हैं. इससे इतर वह उप राज्यपाल के साथ लगातार भिड़ंत और देश के पीएम पर बदजुबानी को लेकर ही अक्सर चर्चित रहे होते रहे हैं. ऐसे में महत्वपूर्ण होगा देखना कि केजरीवाल क्या कुछ साबित कर पाते हैं?

पंजाब कांग्रेस और राहुल गाँधी

असल बात यहाँ कांग्रेस को लेकर ही है. राष्ट्रीय राजनीति में अपनी लगातार फीकी पड़ती चमक से परेशान राहुल गांधी की राजनीतिक लाइन अभी दुविधा में ही है, तो पंजाब चुनाव में कांग्रेसी जी-जान से इसीलिए जुटे हुए हैं, ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद राष्ट्रीय राजनीति में वह कुछ सम्मानजनक दर्जा हासिल कर सकें.

कांग्रेसी भविष्य यहाँ इसलिए भी दांव पर लगा है, क्योंकि अगर यहां यह पुरानी पार्टी नहीं जीती और आम आदमी पार्टी उससे बढ़िया पोजीशन पर आ जाती है तो फिर राष्ट्रीय राजनीति वह कांग्रेस का स्थान लेने का प्रयत्न शुरू कर देगी. ऐसे में कांग्रेस की पुरानी टीम जहाँ ढलते सूरज की तरह प्रतीत होगी, वहीं आम आदमी पार्टी उसकी जगह उगते सूरज की तरह नज़र आएगी.

जाहिर तौर पर कांग्रेस के लिए या तो यहाँ ‘जीत’ मिले, अन्यथा कम से कम दूसरा स्थान तो जरूर मिले, अन्यथा उसके ‘दिग्विजयी’ कर्णधारों को रोना भी नहीं आएगा. पंजाब के साथ-साथ गोवा में भी 4 फरवरी को ही चुनाव होने हैं और वहां भी आम आदमी पार्टी सक्रीय होकर ‘ग्राउंड लेवल’ पर काम कर रही है और इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के पास खोने को कहीं ज्यादा है, बजाय दूसरों के. कांग्रेस भी अपनी इस उलझन को बखूबी समझ रही है और इसीलिए नवजोत सिंह सिद्धू जैसे कद्दावर नेता का पार्टी में पर्याप्त विरोध होने के बावजूद अमरिंदर सिंह ने अपनी पार्टी में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान दिया है. कहा तो यह भी जा रहा है कि नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा विधानसभा चुनाव लड़े जाने के पक्ष में अमरिंदर नहीं थे, किन्तु राहुल गांधी से सिद्धू की मुलाकात के बाद उनके रूख में नरमी आयी. इसके अतिरिक्त, नवजोत सिंह सिद्धू की हमनाम पत्नी के बारे में कहा जाता है कि वह ‘बारुद हैं और कई बार उन की तोप का मुंह अपनी ही पार्टी के नेताओं की ओर घूम जाता है. अगर यह सब जानते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह और पंजाब कांग्रेस ने रिस्क लिया है तो इससे उनकी हालत का सहज ही अंदाज हो जाता है.

एक बड़ा दांव जो इस चुनाव में खेला जा सकता है, वह नीतीश कुमार को लेकर भी है. बिहार में नीतीश कुमार कांग्रेस पार्टी के गठबंधन सहयोगी हैं और गुरु गोविंद सिंह के 350 वें प्रकाश वर्ष पर्व का सफलतम आयोजन कर न केवल भारत में बल्कि संपूर्ण विश्व के सिक्ख समुदाय में प्रशंसा बटोर चुके हैं. हालाँकि, उनकी अपनी पार्टी जदयू का पंजाब में कोई आधार नहीं है और ऐसे में पंजाबियों के बीच बनी उनकी वर्तमान सकारात्मक इमेज को कांग्रेस पार्टी अवश्य भुनाना चाहेगी.

Nitish role in Punjab Election can be Important (Pic credit: Bihar Government)

हालाँकि, राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश के रोल पर कांग्रेस बहुत सहज नहीं रही है, किन्तु पंजाब चुनाव के त्रिकोणीय मुकाबले में नीतीश कुमार का कद्दावर चेहरा कांग्रेस की ओर से भाजपा और आप दोनों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है. हालाँकि, नीतीश ऐसा करेंगे कि नहीं और अगर वह कांग्रेस की मदद करते हैं तो वह कौन सा राजनीतिक उपहार लेना चाहेंगे, इससे परदा कुछ ही दिनों में उठ जायेगा.

भाजपा-अकालियों का दर्द

आप और कांग्रेस के बाद अगर भाजपा और अकालियों की चर्चा करते हैं तो उनके लिए भी यह चुनाव अग्नि परीक्षा साबित होने जा रहा है, क्योंकि पंजाब में नशाखोरी को लेकर उनकी पार्टी पर पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से मजबूत हमले किए गए हैं, उसकी चर्चा पंजाब के साथ राष्ट्रीय मीडिया में भी खूब हुई है. खासकर, पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के रिश्तेदार एवं राज्य के राजस्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया के ऊपर बेहद व्यक्तिगत आरोप तक लगे हैं कि उनकी नशा कारोबारियों से मजबूत सांठगांठ है. यह बेहद दुःख की बात है कि पंजाब में आज चुनावी मुद्दा बन चुकी ‘नशाखोरी’ पर कहने को तो हर कोई चिंता जताता है, किंतु इस संपन्न राज्य का यह दुर्भाग्य ही है कि नशाखोरी से मुक्ति के लिए ठोस रूप में कार्य करने को कोई तैयार नहीं होता है. अकालियों से आगे, अगर भारतीय जनता पार्टी की बात करते हैं तो शहरी मतदाताओं में नोटबंदी के असर का फैसला परखने की घड़ी भी है पंजाब चुनाव, तो पाकिस्तान से सीमा इलाकों के जुड़े होने के कारण सीमा पर मारे जा रहे जवानों का मुद्दा भी थोड़ा ही सही, किन्तु फर्क अवश्य पैदा करेगा.

किसमें कितना है दम?

अगर इस विश्लेषण को थोड़ी गहराई से देखते हैं तो 117 सीटों पर लड़ा जाने वाला पंजाब विधानसभा चुनाव पारंपरिक पार्टियों के विकल्प के तौर पर उभरने की कोशिश करने वाली “आप” के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. हालांकि इस पार्टी ने शुरू में जिस तेज रफ्तार से चुनाव प्रचार शुरू किया था और जड़ जमाई थी, बाद में उसने अपने महत्वपूर्ण नेताओं को खो दिया.

नवजोत सिंह सिद्धू के रूप में एक असरदार चेहरे को आम आदमी पार्टी खुद में समाहित करने में सफल नहीं हो पाई, बावजूद इसके कि सिद्धू कई दिनों तक केजरीवाल के दरवाजे पर चक्कर काटते रहे थे.

Navjot Singh Sidhu can play positive for Congress (Pic credit: India.com)

अब लोकसभा की जीत के भ्रम में इस पार्टी को नहीं रहना चाहिए, जब 24.4 फ़ीसदी वोट लेकर इस नई नवेली पार्टी ने 13 लोकसभा सीटों में से 4 सीटें झटक ली थीं, तो एक सीट पर वह दूसरे स्थान पर आई थी. हालाँकि, आंकड़ों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में ‘आप’ का प्रदर्शन 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में तीसरे मोर्चे के प्रदर्शन से काफी बेहतर था, किन्तु अब जबकि आम आदमी पार्टी पर टिकट बेचने और राजनीतिक चंदे की लिस्ट को अपनी वेबसाइट से हटाने जैसे बेसिक आरोप लग रहे हैं, जिसकी बुनियाद पर यह पार्टी बनी थी, तो मामला कहीं ज्यादा गंभीर हो जाता है. इससे पढ़ा लिखा मध्य वर्ग ‘आप’ से छिटका है. हालाँकि, निचले तबके के वोटर्स में ‘आप’ की पहचान अपने प्रतिद्वंदियों से कहीं आगे है, पर त्रिकोणीय मुकाबलों में आप सिर्फ एक वोटवर्ग के सहारे नांव नहीं चला सकते! 

वैसे भी, साल 2015 में राज्य में की कई जगहों पर स्थित धार्मिक स्थानों को आप नेताओं द्वारा अपवित्र करने की घटनाएं और छावा गांव में सरबत खालसा के एकजुट होने की घटना ने एक बार फिर पंजाब की राजनीति में धर्म के सवाल को ऊपरी परत पर ला दिया है, जिसका लाभ शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन को मिल सकता है.

इसके अतिरिक्त पंजाब के पटियाला में कैप्टन अमरिंदर सिंह के गढ़ में उन्हीं को हराने वाले धर्मवीर गांधी समेत पार्टी के चार में से दो सांसदों को पार्टी से निकाल दिया गया है, जो जाहिर तौर पर पार्टी के लिए संकट बन सकते हैं. सुच्चा सिंह छोटेपुर पंजाब में आप का एक बड़ा नाम था और अब उनके नेतृत्व में निकाले गए नेता ‘अपना पंजाब पार्टी’ नाम से एक नई राजनीतिक पार्टी का समर्थन कर रहे हैं, जो चुनाव तक मुख्यधारा पार्टियों की राजनीति में जीतने और हराने के खेल में शामिल हो ही जाएगी. छोटेपुर की रणनीति केजरीवाल एंड पार्टी को ज्यादा से ज्यादा नुक्सान पहुंचाने की होगी, जिसका लाभ कांग्रेस और भाजपा-अकाली गठबंधन को अलग-अलग सीटों पर मिल सकता है. देखना दिलचस्प होगा कि 4 फ़रवरी को पंजाब के मतदाताओं द्वारा किस विकल्प पर मुहर लगाई जाती है, क्योंकि इसके साथ ही फैसला होगा आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों की राष्ट्रीय राजनीति की संभावनाओं का भी! दोनों को इस कसौटी पर तौला जाएगा कि राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में इन दोनों का क्या रोल होने वाला है? क्या आम आदमी पार्टी दिल्ली जैसे संघ शासित प्रदेशों में ही सिमटी रहने वाली है या फिर उससे बाहर निकलने की भी उसके भीतर क्षमता और योग्यता है? इसी तरह से ११ मार्च को आने वाले चुनाव परिणामों से कांग्रेस को भी यह समझ आ जाएगा कि यूपीए सरकार के दौरान हुए घोटालों की छाया से उसे अभी जूझना पड़ेगा या नरेंद्र मोदी के नोट बंदी जैसे कड़े फैसलों ने यूपीए घोटालों के जख्म को भुला दिया है.

Web Title: Punjab Election 2017 Political Analysis Article in Hindi

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