पिछले दिनों हफ्ते भर के लिए गाँव जाना हुआ. खरीफ़ की बुआई का सीजन चल रहा है और इस सीजन में पानी का विशेष महत्त्व होता है. खरीफ़ की महत्वपूर्ण पैदावार धान का बीजारोपण तभी स्वस्थ होता है, जब इसमें भरपूर पानी की मात्रा के साथ मौसम में भी आद्रता हो.

मेरे पिताजी आर्मी जेसीओ पद पर आने के बाद रिटायर हुए और अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर खेती कर रहे हैं. उनकी और उन जैसों की मेहनत देखकर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए, जब दिन भर वह मजदूरों के साथ खेतों की मेड़ सही कर रहे होते हैं और रात को पानी कहीं दूसरी तरफ न बह जाए, इस हेतु बार-बार बिस्तर की नींद छोड़कर खेतों की निगरानी. बताना आवश्यक है कि उन जैसे कई लोग दूसरे विकल्प के रूप में कहीं नौकरी करने का ऑप्शन चूज कर लेते हैं और पेंशन के साथ नयी सेलरी का लाभ अलग से उठाते हैं. पर कई लोग पुश्तैनी चीजों को मर्यादा-पालन की दृष्टि से देखते हैं, इसलिए इसे जज किये जाने की बजाय समस्याओं और रास्तों पर बात की जानी चाहिए.

बढ़ती लागत के अनसुलझे ‘पेंच’

अपने हफ्ते भर का अनुभव पकड़कर ही आगे चलता हूँ. मेरे घर में खेती के अधिकांश संसाधन मौजूद हैं, इसलिए दिन-रात पानी चलाकर अगले दिन सुबह खेत को तैयार कर दिया गया. पूर्वी उत्तर प्रदेश में महिला मजदूरों द्वारा (बलिया क्षेत्र में ‘बनिहार’) धान की रोपाई करने का चलन है. ऐसे में अगर अपने अनुभव से मैं कहूँ कि बदलते समय में तमाम किसानों को मजदूरों की मिन्नतें करनी पड़ती हैं, तो इसे पूरी तरह खारिज़ नहीं किया जा सकता है. मनरेगा जैसी योजनाओं के बारे में हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘यह यूपीए सरकार की असफलताओं का स्मारक है’.

राजनीतिक टीका-टिपण्णी अपनी जगह है, किन्तु इस अकेली योजना ने खेती-किसानी का ढांचा बदल दिया है, इस बात में दो राय नहीं! ख़ासकर मजदूरों की उपलब्धता के लिहाज से. मनरेगा ने समाज के दबे-कुचले हिस्सों को अवश्य ही तात्कालिक राहत पहुंचाया है, किन्तु महसूस किया जा सकता है कि देश की एक बड़ी आबादी अनस्किल्ड भी हुई है. किसानों और उनकी खेती के लिहाज से यह बड़ा संकट बना है.

कृषि-कार्य में न केवल मजदूरों की लागत बढ़ी है, बल्कि यह क्षेत्र और भी अस्त-व्यस्त हो गया है. स्पष्ट कर दूँ कि मजदूरों की मजदूरी बढ़ना बुरी बात नहीं है, बल्कि वह और भी बढ़नी चाहिए, किन्तु यही धान जब किसानों को रुला रुलाकर 1500 के आस पास बिकता है, तो फिर उसकी न्यूनतम लागत तय किये जाने की बड़ी आवश्यकता महसूस होती है.

आखिर, कभी 5 रूपये किलो टमाटर हो जाए या फिर 10 रूपये किलो प्याज हो जाए तो फिर किसान मरेगा नहीं तो क्या करेगा?

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है. एक मध्यमवर्गीय किसान किस प्रकार हर कदम पर घाटा सहन करता है, इसे समझने की कोशिश करने पर दांतों तले पसीना आ जाएगा. खरीफ़ की फसल चूंकि जून-जुलाई में लगाई जाती है, और ऐसे में पानी की भरपूर आवश्यकता किसानों का दम तोड़ देती है. हालाँकि, पिछले कुछ दिनों से यूपी में बिजली की हालत प्रशासनिक-स्तर पर ठीक अवश्य की गयी है, लेकिन इसका इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद कमजोर है, इसलिए ट्रांसफार्मर उड़ना, बिजली-कट होना, वह भी कई दिनों के लिए अभी भी आम बात है. ऐसे में डीजल-इंजिन से पानी निकाला जाता है, जिसकी कीमत जोड़कर अच्छे-भले लोग खेती-बारी करना छोड़ चुके हैं.

अब आप मौसम विभाग की बात नहीं कीजियेगा. उसकी भविष्यवाणी पर अगर किसान भरोसा करे तो कई किसान कुछ और दिन पहले ही आत्महत्या कर लेंगे. इसका खर्च इसलिए भी ज्यादा हो जाता है, क्योंकि किसानों को नयी तकनीक के प्रति स्किल्ड करने की जवाबदेही नहीं उठायी गयी है और ट्रेडिशनल तरीके की खेती अनिवार्य रूप से महँगी हो चुकी है.

शोध का अभाव या…

हफ्ते भर की छुट्टियां बिताने के बाद जब मैं ट्रेन से वापस लौट रहा था तो बोगी में कुछ और सहयात्री खेती-किसानी पर ही चर्चा कर रहे थे. एक मित्र किसानों को दोष देते हुए कह रहे थे कि उन्हें अपडेट रहना चाहिए, सरकार की वेबसाइट देखनी चाहिए, कृषि संस्थानों से संपर्क बनाये रखना चाहिए.

बोलने का मन तो बहुत कर रहा था, किन्तु आर्ग्युमेंट करने का कोई खास फायदा था नहीं. हाँ, कृषि-शोध पर अवश्य मन रूक गया और अपने स्मार्टफोन पर फॉर्मर.जीओवी.इन (http://farmer.gov.in) पोर्टल खोल लिया. एक तो डिजिटल इंडिया का नारा देने वाली इस सरकार की यह महत्वपूर्ण वेबसाइट मोबाइल में ‘रेस्पॉन्सिव’ नहीं थी, जबकि तमाम सांसदों, मंत्रियों और खुद अपने पीएम की वेबसाइट कितनी रेस्पॉन्सिव है, यह आप खुद देख सकते हैं. खैर, हिंदी में वेबसाइट की भाषा सेट की और आगे बढ़कर मुख्य पृष्ठ से यूपी स्टेट पर क्लिक किया. तत्काल वेबसाइट की भाषा अंग्रेजी में रिसेट हो गयी. फिर उसे हिंदी में सेट किया, किन्तु ज़िलों के नाम अंग्रेजी में ही आते रहे. फिर ब्लॉक के नाम पर क्लिक किया तो क्षेत्रवार कुछ फसलों के नाम और मार्किट प्राइस, मशीनरी इत्यादि के लिंक आ रहे थे, किन्तु सब इतना उलझाऊ (और अंग्रेजी में ही) कि उसे आम किसान तो क्या, कोई टेक-एक्सपर्ट भी शायद ही समझ सके.

एकाध लिंक और क्लिक किया तो वेबसाइट पर एरर आ गया.

यह छोटी बातें इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ ताकि सरकार की कृषि के सम्बन्ध में गंभीरता का मापन किया जा सके.

खैर, मैं भी किस जाल में फंस गया और किसकी गंभीरता का मापन करने लगा… रही बात कृषि-शोध संस्थानों की तो इंडियन कौंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) की वेबसाइट मात्र अंग्रेजी पढ़ने वालों के लिए ही बनायी गयी है और इसके ऑफिसियल ट्विटर हैंडल पर जुलाई 17 के आखिर तक मात्र 12.8K फॉलोवर थे.

तात्पर्य यह कि यह शोध कितनी गंभीरता से भारत की लगभग आधी आबादी यानी किसानों तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है, यह समझा जा सकता है.

वैसे ‘डिजिटल इंडिया’ पैरामीटर से हटकर देखें तो लगातार इस क्षेत्र में आ रही गिरावट ही तमाम शोध-संस्थानों के कर्ताधर्ताओं की ऐयाशी की पोल खोलने के लिए काफी है.

युवा-प्रतिभा पलायन

दिल्ली से मैं ट्रेन से अपने गाँव गया था और वापसी भी ट्रेन से ही हुई. आते समय मेरी ट्रेन संयोगवश कुछ लेट हो गयी और फिर वह लगातार लेट होती चली गयी. इसके पीछे लॉजिक कुछ ऐसा बताया जाता है कि जो ट्रेन लेट हो गयी, उसकी खातिर दूसरी ट्रेनों को लेट नहीं किया जाता है और फिर लेट हुई ट्रेन की लाइन क्लियर होने में दिक्कतें आने लगती हैं.

कुछ ऐसा ही हाल एग्रीकल्चर सेक्टर का भी है. वह पिछड़ा है और लगातार पिछड़ता चला जा रहा है. इसका एक बड़ा कारण काबिल युवाओं का इससे दूर भागना है. चूंकि, सुविधा और आमदनी के लिहाज से यह क्षेत्र निराशाजनक बन चुका है, इसलिए योग्य लड़के दूसरे क्षेत्रों का रूख करने में ज़रा भी संकोच नहीं करते हैं. अब ज़रा गौर कीजिये, दुनिया का ऐसा कौन सा क्षेत्र है, जहाँ प्रॉब्लम्स नहीं आती हैं, किन्तु अधिकांश जगहों पर उसे सुलझाने के लिए युवा जोश-ओ-खरोश के साथ जुटे रहते हैं, पर खेती में यह मामला कुछ ऐसा है कि रिटायर होने की कगार पर खड़े बूढ़े लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं.

जाहिर है, ऐसे में जंग तो जीती नहीं जा सकती. ऐसे में युवाओं का आकर्षण इस क्षेत्र के प्रति कैसे पैदा हो, यह एक बड़ा प्रश्न है. यकीन मानिये, इस प्रश्न के उत्तर में ही किसानों की दशा-दुर्दशा का भविष्य छिपा हुआ है.

ऐसा नहीं है कि युवा खेती-किसानी में हैं ही नहीं, किन्तु प्रतिभावान युवा तो बिल्कुल नहीं दिखते. होंगे भी तो नगण्य, जिन्हें मजबूरी में कोई और राह नहीं मिली होगी. बाकी अनुशासनहीन, आलसी, राजनीतिक बातों के माध्यम से टाइम पास करने वाले युवा जरूर मिलेंगे, जो जैसे-तैसे अपनी ज़िन्दगी काट रहे हैं.

वैसे, इतना अनुभव पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस राह में और भी काफी पेंच हैं…  जिस पर अगली कड़ी में बात रखने की कोशिश होगी.

पर यह बात साफ़ है कि जब तक हम बेसिक बातों पर विमर्श करने को तैयार न होंगे, दुनिया की कोई ताकत भारत की आधी से अधिक किसानों की आबादी की हालत नहीं सुधार सकती और वगैर इनकी हालत सुधरे सुपर पावर बनने का हमारा दावा खोखला ही साबित होगा, इस बात में दो राय नहीं!

Issues and Solutions of Indian Agriculture Sector (Pic: fb/mithilesh2020)

Web Title: Real issues of Indian Agriculture Sector and Farmers, Hindi Article

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Featured image credit / Facebook open graph: fb/mithilesh2020