पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण उत्तरप्रदेश का चुनाव ही था, क्योंकि देश का सबसे बड़ा राज्य होने के कारण यूपी के जनादेश को केंद्र सरकार के अब तक के कार्यकाल पर एक जनादेश की तरह देखा गया है. इस बात को मानने के पीछे पुख्ता कारण हैं. यूपी में भारी जीत का सन्दर्भ देते हुए जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम ओमर अब्दुल्ला ने कहा कि “अगर ऐसा ही रहा तो फिर विपक्षी दलों को 2019 में नहीं बल्कि 2024 में लोकसभा चुनावों की तैयारी करनी चाहिए”. मतलब साफ़ था कि भाजपा जिस प्रकार से यूपी में मजबूत हो चुकी है, 2019 में उसकी राह कुछ खास कठिन नहीं होने वाली. हालाँकि, इससे पहले गणित दूसरी थी…

2014 लोकसभा चुनाव के पहले बीजेपी का उत्तर प्रदेश में जनाधार उतना मजबूत नहीं था, जितना हाल-फिलहाल दिख रहा है और इसका कारण था, जातिवाद पर आधारित यूपी की राजनीति. यहाँ की दो मुख्य पार्टियां सपा और बसपा ‘खास जाति‘ की राजनीति करती रही हैं और सम्प्रदाय के रूप में ‘मुसलमानों’ को अपने साथ जोड़कर विभिन्न समीकरण आजमाती रही हैं. इस बार यह तो अनुमान लगाया जा रहा था कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है, किन्तु तमाम चुनावी विश्लेषकों को मात देते हुए भाजपा ने न केवल बहुमत के जादुई आंकड़े को पार किया, बल्कि सहयोगियों सहित 325 सीटें जीतकर विपक्षी पार्टियों को धूल चाटने पर मजबूर कर दिया. आखिर इस जीत में मुख्य कारक क्या रहे और जीत के सन्दर्भ में बने विभिन्न समीकरण क्या हैं? इस सन्दर्भ में मुख्यमंत्री दावेदारों से लेकर आने वाले समय में विकास की राजनीति और जातिगत समीकरणों से लेकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति पर पड़ने वाले बारीक बदलावों को महसूस किया जाना आवश्यक है.

मोदी बनाम अन्य एवं ध्रुवीकरण का ‘मास्टरस्ट्रोक’

उत्तर प्रदेश के चुनाव में इस बात को लेकर शुरू से बातों का बाजार गर्म था कि बीजेपी में मुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा. भाजपा पर सीएम पद का दावेदार घोषित करने को लेकर दबाव भी बनाया गया, क्योंकि विरोधी पार्टियों में बसपा सुप्रीमो मायावती, तो दूसरी तरफ सपा से तत्कालीन सीएम का चेहरा अखिलेश यादव थे. मगर 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपी में महत्वपूर्ण कसरत कर चुके अमित शाह की समझ इस मामले में कुछ और थी और उसी के सहारे बीजेपी ने यहाँ प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर ही चुनाव में उतरना उचित समझा. इस फैसले में कोई छुपा तथ्य नहीं था. पीएम की अपार लोकप्रियता के साथ हिंदुत्व के पैरोकार का सबसे मजबूत चेहरा उन्हीं का है. इसके अतिरिक्त, उत्तरप्रदेश जैसे विशाल राज्य के हर क्षेत्र के अलग अलग नेता होने से किसी एक नाम की घोषणा में बड़ी उलझन थी. चूंकि इस कदम से दूसरे नाराज होकर भीतरघात कर सकते थे. वैसे भी यूपी के लोगों की केंद्रीय राजनीति में ख़ास दिलचस्पी रहती है. आखिर, इस प्रदेश से यूं ही सर्वाधिक प्रधानमंत्री तो बने नहीं हैं! इस सन्दर्भ में भाजपा द्वारा यूपी में सीएम उम्मीदवार की घोषणा न करने का फायदा यह हुआ कि उत्तरप्रदेश का चुनाव मोदी बनाम सभी पार्टियों का हो गया. बिहार के सीएम नीतीश कुमार इस सन्दर्भ में कहते हैं कि ‘नोटबंदी का जनता में अच्छा सन्देश गया और इसका विपक्षियों द्वारा उस तरीके से विरोध नहीं करना चाहिए था, जैसा उन सबने किया’!

मतलब साफ़ था कि प्रधामंत्री मोदी जनता की नज़रों में खुद को पाक-साफ़ नियत का साबित करने में सफल रहे. इसके अतिरिक्त,

भाजपाई तरकस के पुराने तीरों मसलन शमशान-क़ब्रिस्तान, ईद-दिवाली जैसे ध्रुवीकरण के मुद्दों को भी इस्तेमाल करने से पीएम नहीं चूके. ध्रुवीकरण के मुद्दे का भाजपा को टिकट बंटवारे के माध्यम से जबरदस्त फायदा मिला, जब बीजेपी ने किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया और बहुसंख्यकों को ‘ख़ास सन्देश’ देने में सफल रही.

मायावती पहले 100 के आस पास मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर ‘मुस्लिम वोट बैंक’ का इस्तेमाल करने का सन्देश दे चुकी थीं, वहीं अखिलेश पर भी मुस्लिम उम्मीदवारों को अधिकाधिक टिकट देने का दबाव बनाया गया. जाहिर है, बहुसंख्यक हिंदुओं को ‘ख़ास’ तरह का मेसेज देने में भाजपा सफल रही. वैसे भी ‘राम मंदिर’ जैसे मुद्दे ने यूपी से ही जन्म लिया है, तो ‘ध्रुवीकरण’ की राजनीति यहाँ की जनता को खासी रास आती है और राजनेता रह रहकर उसे खुराक देते रहे हैं. रही सही कसर अखिलेश के पांच साल के शासनकाल की चर्चा जिसमें, मुजफ्फरनगर दंगा हुआ, तो कैराना इत्यादि के मुद्दों ने पूरा कर दिया.

आप गौर करें तो पाएंगे कि योगी आदित्यनाथ जैसे हिंदुत्ववादी चेहरों को बीजेपी ने इस चुनाव में खुलकर इस्तेमाल किया और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. हालाँकि, इन सबके बावजूद भाजपा रणनीतिकारों को भी इतनी बड़ी सफलता का अंदाजा नहीं था, अन्यथा नरेंद्र मोदी का कई दिनों तक वाराणसी में डेरा डालना, रोड शो करना लोकसभा चुनाव की याद ताजा न कर पाता. पूर्वांचल के मतदाताओं सहित पूरे यूपी के वोटर्स को नरेंद्र मोदी ने ठीक उसी जोश और मेहनत से साधा जैसा उन्होंने लोकसभा के समय किया था और इसका परिणाम अब सामने है.

सपाई कलह एवं मुस्लिम वोटर्स का बिखराव

पिछले दिनों जिस तरह सपा का पारिवारिक कलह ख़बरों में छाया रहा, उससे शायद ही कोई अनजान हो. उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के टूटने की खबरों को खूब चाव लेकर मीडिया ने दिखाया. यहाँ तक खबर आयी कि ये पारिवारिक ड्रामा जानबूझ कर रचा गया है, ताकि लोगों का ध्यान अखिलेश के “एंटी-इंकमबैंसी” से हटे और उससे भी बढ़कर अखिलेश समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा बन जाएँ. पर मुश्किल यह हुई कि यह ‘ड्रामा या रियल्टी शो जो भी कह लें’ कुछ ज्यादा ही लंबा खिंच गया और सपा के कोर वोटर कहे जाने वाले “मुसलमान” बिखर गए. मुस्लिम वोटर्स को खींचने में मायावती ने भी पहले से ही जी-जान लगा दिया था. हालाँकि, अखिलेश ने मुस्लिम वोटर्स को बचाने के लिए कांग्रेस के साथ पींगे बढ़ाई, किन्तु मामला कुछ ख़ास जमा नहीं. हाँ, कांग्रेस के साथ से उन्हें यह फायदा अवश्य हुआ कि मायावती से कम वोटर शेयर (सपा: 21.6 + कांग्रेस: 6, बसपा: 22%) होने के बावजूद उसकी सीटें अधिक रही और कम से कम अखिलेश की पार्टी को ‘नेता-विपक्ष’ का पद मिल जायेगा. पर मुलायम सिंह यादव की यह आशंका भी गलत नहीं है कि लंबे समय के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन से सपा को नुक्सान होगा.

चूंकि, राहुल गाँधी की इमेज कतई प्रेरणास्पद नहीं है पर प्रशांत किशोर की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने अखिलेश और राहुल को एक साथ यूपी में घुमाकर राहुल की छवि बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह वही प्रशांत किशोर हैं, जिन्होंने बिहार में लालू-नीतीश का गठबंधन होने के बावजूद दोनों को एक मंच पर कभी नहीं आने दिया. इसके पीछे उनका तर्क था कि दोनों के वोटर्स अलग हैं और एक साथ आने से दोनों के वोटर्स भड़क सकते हैं. पर यहाँ राहुल की कमजोर इमेज को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने अखिलेश की छवि दांव पर लगाने में ज़रा भी कोताही नहीं की.

UP Election Results 2017, Akhilesh Yadav (Pic: Youtube)

इसके अतिरिक्त, ख़राब प्रशासन और गुंडाराज के धब्बों से अखिलेश अंतिम समय तक मुक्त नहीं हो पाए और उनके नारे ‘काम बोलता है’ की काट में नरेंद्र मोदी ने ‘कारनामा बोलता है’ प्रस्तुत कर खासी सुर्खियां बटोरीं. अपराधियों पर अंकुश नहीं होना और अपहरण, बलात्कार जैसी घटनाओं पर अखिलेश की लाख सफाई भी कुछ काम न आयी. मेट्रो और एक्सप्रेस वे के दावों के बावजूद जनता ने अखिलेश प्रशासन की नाकामियों को ही याद रखा.

यूं भी मुस्लिम वोटर्स को साधने के लिए मशहूर मुलायम सिंह इस चुनाव में ‘चुप्पी’ साधे रहे. गौर करने वाली बात ये है कि दोनों ही तरफ से कोई भी सीनियर नेता इनके पक्ष में प्रचार में नहीं उतरा. न ही मुलायम ने अखिलेश का प्रचार किया और न ही सोनिया खुलकर मैदान में उतरीं.

यहाँ तक कि गठबंधन पूर्व जिस बात कि चर्चा थी कि प्रियंका पूरे उत्तर प्रदेश में गठबंधन के प्रचार का जिम्मा लेंगी तो वो भी एकाध रैली कर के गायब हो गयीं. ऐसे में अखिलेश के ‘गुजरात के गधे’ जैसे बयानों ने कुछ सुर्खियां जरूर बटोरीं, किन्तु नरेंद्र मोदी और टीम भाजपा के सामने ये सभी बौने ही साबित हुए. वैसे भी चुनाव परिणाम के बाद अखिलेश पार्टी के भीतर शिवपाल और दूसरे धड़ों की बगावत कैसे थाम पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी.

मायावती से नहीं जुड़ रहे नए ‘लोग’

2014 लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की ‘शून्य’ सीटें आने के बाद 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में मायावती के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति थी. मायावती ने इसके लिए अपने स्तर पर कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और दलित-मुस्लिम समीकरण पर ही अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया. इसके उलट देखते हैं तो मायावती के साथ दो तीन बड़ी मुश्किलें रहती हैं. पहला तो यह कि पूरे 4 साल यह पार्टी सुसुप्ता अवस्था में रहती है और तभी हरकत में आती है जब चुनाव होने होते हैं. दूसरी मुसीबत यह कि इस पार्टी में जो भी हैं वह मायावती ही हैं और जहाँ दूसरी पार्टियां युवा नेतृत्व के सहारे मैदान में अपनी जड़ें जमा रही हैं, वहीं मायावती इस बात की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं समझतीं. जाहिर है, नए ज़माने के युवा (राहुल गांधी जैसे नहीं 🙂 ) कुछ हद तक ही सही, जनाधार को तो बढ़ाते ही हैं, साथ ही साथ टेक्नोलॉजी से भी पार्टी को अपडेट करते रहते हैं.

बसपा के साथ तीसरी समस्या है कि वह दलित वोट वर्ग को ‘फिक्स’ तो मानती है, किन्तु उससे आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करती है. 2007 की सोशल इंजीनियरिंग राजनीतिक विश्लेषकों को जरूर याद होगा, जब ब्राह्मणों सहित कुछ सवर्णों को जोड़कर ‘सर्वजन’ की राजनीति के सहारे मायावती ‘सत्ता’ में आयी थीं.

उस नए ‘वोटवर्ग’ को बचाने की पहल मायावती ने नहीं की और सिर्फ ‘दलित वोटर्स’ के सहारे बैठी रहीं.

UP Election Results 2017, Mayawati (Pic: southlive.in)

भाजपा ने मायावती की इस ‘सोच’ को हथियार बनाया और अपना दल, भाजपा जैसी छोटी पार्टियों के सहारे ‘जाटव वोटर्स’ को छोड़कर सभी को अपने साथ जोड़ने में सफलता प्राप्त की. इस बात पर एकमत होया जा सकता है कि हर पार्टी का अपना एक ‘खास’ वोट वर्ग है, किन्तु सिर्फ उसी के सहारे सत्ता का स्वाद नहीं चखा जा सकता. 2007 में मायावती के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले के बाद 2012 में भी अखिलेश ने सवर्ण वोटर्स को जोड़ने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की थी, तो भाजपा ने इस बार अपने सवर्ण वोटर्स के अतिरिक्त पिछड़े वोटर्स में गहरी पैठ बनायी.

जाहिर है, भाजपा का जातिगत ‘विनिंग कॉम्बिनेशन’ और नरेंद्र मोदी का मेल ‘सुनामी’ के रूप में सामने आया.

रही बात मुस्लिम वोटर्स की तो पूर्व में मायावती और भाजपा के साथ गठबंधन करने के कारण, बसपा द्वारा भारी संख्या में उम्मीदवार उतारने के बावजूद मुस्लिम वोटर्स एकमुश्त होकर बसपा के साथ खड़े न हो सके. इतना ही नहीं, पुरुष मुस्लिम वोटर्स में कन्फ्यूजन की स्थिति में ‘मुस्लिम महिलाओं’ द्वारा भाजपा का समर्थन करने की बात कई हलकों में गूँज रही है, जिसे एक तरह से चमत्कार ही माना जाना चाहिए. गौरतलब है कि मुस्लिम महिलाओं से जुड़े मुद्दों ‘तीन तलाक’ जैसे गंभीर मुद्दों पर कैंपेन चलाया था, जिसका असर पड़ने की बात कही जा रही है. तो ध्यान से देखा जाए तो पुरुष मुस्लिम वोटर्स जहाँ सपा और बसपा में बंट गए, वहीं एक हद तक सुधारवादी मुस्लिम महिलाएं भाजपा के खेमे में भी संभवतः गयी हैं. हालाँकि, इनकी संख्या बेहद कम हो सकती है. मायावती के सन्दर्भ में देखा जाए तो उन्हें अपना नेतृत्व शेयर करने की राह ढूंढनी ही होगी, अन्यथा 2019 के बाद उनके कोर वोटर्स बिखर जायेंगे. 2019 का लोकसभा चुनाव शायद मायावती के लिए आखिरी मौका होगा, क्योंकि एक तो लगातार वह हार रही हैं, दूजे उनके पुराने चेहरे में उनके कोर वोटर्स के अतिरिक्त दूसरे वोटर्स को खींचने का करिश्मा नहीं बचा है. बसपा की मुश्किल यह भी है कि जो दलित वोटर्स (गैर जाटव) उसकी मजबूती थे, उन्हें भाजपा ने एक तरह से अपने पाले में खींच लिया है. वैसे भी उनकी तानाशाही प्रवृत्ति से हर बार उनके मजबूत नेता बसपा छोड़कर निकल जाते हैं. पहले तो मायावती इसकी परवाह नहीं करती थीं, किन्तु बदलते समय के साथ उन्हें इस बात की परवाह करनी ही होगी.

उत्तर प्रदेश की भावी ‘चुनौतियां’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी में जीत के बाद कहा कि भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं को और अधिक विनम्र होने की आवश्यकता है, किन्तु क्या वाकई इन पर अमल होने वाला है? यूपी में जब तक भाजपा के हाथ में सत्ता नहीं थी, तब तक वह आसानी से राम मंदिर, विकास और अपराध मुक्त प्रशासन की बात कह दिया करती थी. अब जबकि वह सत्ता में है तो क्या वाकई यह सब इतना आसान रहने वाला है?

एडीआर ने चुने गए 403 में से 402 विधायकों के आपराधिक रिकार्ड का विश्लेषण किया है. एडीआर के आंकलन में 143 (36 फीसद) विधायकों पर आपराधिक रिकार्ड और इनमें से भी 107 (26 फीसद) पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. हालाँकि, पिछली बार यह संख्या कहीं ज्यादा (47 फीसद) थी, पर क्या वाकई यह विधायक और उसके नेता आसानी से कानून का राज कायम करने देंगे?

इसके अतिरिक्त कई और पहलु हैं, जहाँ उत्तर प्रदेश को काफी प्रयासों की जरूरत है. देश में और खासकर भाजपा में अक्सर ‘गुजरात मॉडल’ की बात की जाती रही है तो गुजरात से अगर यूपी की तुलना करते हैं तो तस्वीर बेहद निराशाजनक नज़र आती है. देश की महज 5 फीसदी जनसंख्या वाला गुजरात देश की जीडीपी में 7.6 फीसदी, यानी 11 लाख करोड़ रुपये तो उत्तर प्रदेश देश की 16 फीसदी से अधिक जनसँख्या रखने के बावजूद जीडीपी में योगदान महज 8 फीसदी (12 लाख करोड़ रुपये) ही कर पाता है. इसी तरह गुजरात 2004-05 से 2014-15 के दौरान 12 फीसदी विकास दर से साथ आगे बढ़ा, वहीं इसी दौरान उत्तर प्रदेश महज 6 फीसदी की ग्रोथ दे पाया. जाहिर तौर पर मामला उलझा हुआ है. इसी तरह गुजरात प्रदेश में 800 बड़ी फैक्ट्रियों के साथ 4 लाख 53 हजार से अधिक स्मॉल और मीडियम फैक्ट्रियां है, तो उत्तर प्रदेश आज भी कृषि के सहारे अपनी नौका चला रहा है. इसी तरह यूपी में बेरोजगारी ने 2016 के दौरान 7.4 फीसदी के आंकड़े को पार कर लिया है, जबकि बेरोजगारी का राष्ट्रीय औसत ही 5 फीसदी है. गुजरात की तो बात ही छोड़ दीजिये, इस मानक पर यूपी बिहार जैसे राज्यों से भी पीछे खड़ा दिखता है.

स्वास्थ्य और शिक्षा की बातें न ही की जाएँ तो बेहतर होंगी, क्योंकि इस मामले में सिर्फ घाव ही हरे होंगे. जाहिर तौर पर भाजपा की सरकार केंद्र में है, अब राज्य में भी है और ऊपर से पीएम का संसदीय क्षेत्र भी इस उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल है तो उम्मीदें भी लोगों की अधिकाधिक होंगी और 2019 में लोग अवश्य ही भाजपा को विकास की तराजू पर रखेंगे.

अभी मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा में माथापच्ची चल रही है, किन्तु इस विशाल राज्य का सीएम झारखण्ड के रघुबर दास या हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर जैसा ढूंढ निकालना आसान नहीं होगा. वैसे भी हरियाणा की जाट राजनीति ने पिछले दिनों खट्टर का स्वाद ‘खट्टा’ करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी.

UP Election Results 2017, Rajnath Singh (Pic: telanganatoday.news)

जाहिर तौर पर यूपी में कई जातीय समूहों और जटिलताओं को देखते हुए भाजपा किसी सशक्त और स्वीकार्य चेहरे पर ही दांव लगाना चाहेगी, जो दीर्घकालिक रूप से सफल हो सके. हालाँकि, सशक्त और मजबूत चेहरे अमित शाह और मोदी की सभी बातों को आँख मूद कर मानने की बजाय अपना दिमाग भी लगाएंगे और ऐसे में केंद्रीय राजनीति के सामने राजनीतिक रास्ते बहुत कम बचते हैं.

वैसे अभी नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र अमित शाह की इतनी हैसियत अवश्य है कि वह किसी ‘घोड़े गधे’ को सीएम बना दें तो कोई आपत्ति नहीं कर सकेगा. देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में तमाम चुनौतियों से पार पाते हुए भाजपा इस विशाल राज्य से मिली लोकप्रियता को किस हद तक कायम रख पाती है. दिलचस्प यह भी देखना होगा कि सपा, बसपा और दूसरे विपक्षी दल नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई राष्ट्रीय मोर्चा खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे अथवा… 2019 में नरेंद्र मोदी को “वाक ओवर” दे दिया जाएगा.

Web Title: UP Election Results 2017, Political Analysis in Hindi

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