भारत वीरों की भूमि है. इसके हर राज्य का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है. बुंदेलखंड उसी में से एक है. इसका कण-कण शूरवीरों की वीरता से महकता है. यहां कई वीर हुए, जिन्होंने अपनी वीरता से इतिहास के पन्नों में अपना स्वर्णिम नाम जोड़ा है.’

इन्हीं में एक नाम है. उनकी गौरव गाथा को इसी से समझा जा सकता है कि आज भी उनकी लोकगाथा को लोग अपने होठों से लगाये फिरते हैं.

कहते हैं कि ‘आल्हा’ एक ऐसे वीर योद्धा थे, जिन्होंंने जीवन में कभी पराजय का सामना नहीं किया. यहांं तक कि उन्होंने पृथ्वी राज चौहान जैसे वीर योद्धा तक को मात दे दी थी.

तो आइये इस वीर योद्धा को जरा नजदीक से जानने की कोशिश करते हैं–

कौन थे ‘आल्हा’?

अाल्हा चंदेल वंश के राजा परमाल के मंत्री व सेनापति थे. उनके कंधों पर महोबा की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी.

‘आल्हा’ का जन्म दसरापुर के जागीरदार तथा राजा परमाल के वफ़ादार दस्सराज के घर हुआ था. उनकी उम्र बहुत कम थी, जब उनके पिता रणभूमि में दुश्मनों के हाथों मारे गए. पिता की मृत्यु के बाद राजा परमाल ने उनका पालन पोषण किया. माना जाता है कि वह राजा परमाल की पत्नी मलिन्हा के बहुत प्रिय थे. वह उन्हें अपनी संतान की तरह लाड़ करती थीं.

‘आल्हा’ जैसे ही थोड़े बड़े हुए उन्हें राजा परमाल ने शिक्षा के लिए भेज दिया. इस तरह ‘आल्हा’ ने शिक्षा के साथ-साथ ऱणकौशल के गुर सीखे. ‘आल्हा’, जब वापस लौटे तो उनकी वीरता का सभी ने लोहा माना. इसी के चलते जल्द ही राजा परमाल ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति घोषित कर दिया.

‘आल्हा’ ने अपने पद की हमेशा गरिमा बनाये रखी. अपने सफर में वह राजा परमाल के उपकारों को कभी नहीं भूले. यही नहीं उन्होंंने राजा परमाल के लिए खुद को मरते दम तक समर्पित भी कर दिया था.

Aalha (Representative Pic: Pinterest)

तलवार की नोक पर ‘शादी’

‘आल्हा’ के विवाह की गाथा भी वीरता का एक प्रतीक ही मानी जाती है. उन दिनों शूरवीरों के विवाह करने का अलग सा ही तरीका था. ज्यादातर  शादियां तलवार की नोक पर होती थी. किसी राजा की पुत्री जब विवाह योग्य हो जाती थी तो राजा अपने नाई के हाथों अपने आस-पास के हर क्षेत्र में युद्ध का न्योता भिजवाता था. इस न्यौते को स्वीकार करके, जो भी वीर अपने पराक्रम से उन्हें पराजित करता… उसके साथ राजकुमारी की डोली जाती!

‘आल्हा’ के विवाह के समय भी कुछ ऐसा ही हुआ.

असल में ‘आल्हा’ नैनागढ़ की राजकुमारी सुमना से विवाह करना चाहते थे. सुमना से इसलिए क्योंकि उनके सौन्दर्य की चर्चा दूर-दूर तक थी. दूसरी तरफ सुमना भी ‘आल्हा’ की वीरता के कारनामों से प्रभावित थीं. उन्होंंने मन ही मन विवाह का मन भी बना लिया था. किन्तु यह आसान नहीं था. सुमना के पिता ‘आल्हा’ के साथ अपनी पुत्री के विवाह के खिलाफ थे.

‘आल्हा’ को जब इस बात की खबर मिली जो वह बारात लेकर ‘नैनागढ़’ पहुंच गये. फिर होना क्या था. उन्हें सुमना के पिता से दो-दो हाथ करना पड़ा. युद्ध अपने चरम पर था. ‘आल्हा’ तेजी से नैनागढ़ के सैनिकों को काटते हुए आगे बढ़ रहे थे, तभी सुमना के पिता को पता चला कि उनकी बेटी सुमना इस विवाह की इच्छुक है.

इसकी खबर मिलते ही उन्होंंने ‘आल्हा’ से संधि कर ली और सुमना का हाथ ‘आल्हा’ को दे दिया.

Aalah Marriage (Representative Pic: blog.indianweddingcard)

साजिश के चलते ‘महोबा’ छूटा

राजा परमाल ‘आल्हा’ को अपने पुत्र के सामान मानते थे. राज्य के प्रति ‘आल्हा’ की निष्ठा पर उन्हें पूरा विश्वास था. रानी मलिन्हा भी उनसे स्नेह रखती थी. बस यही बात रानी मलिन्हा के भाई माहिल को खटकती थी.

वह ‘आल्हा’ को नीचा दिखाने की कोशिश करता रहता था. कई बार उसने इसके लिए षडयंत्र भी रचे… किन्तु किसी न किसी वजह से वह फेल हो जाता था. इसी क्रम में उसने ‘आल्हा’ को राज्य से बाहर करने का पुख्ता प्लान तैयार किया. उसने राजा परमाल को भड़काते हुए कहा कि वह ‘आल्हा’ से अपना प्रिय घोड़ा भेंट करने के लिए कहें.

अगर ‘आल्हा’ ऐसा नहीं करता तो इसका मतलब वह आपके राज्य के लिए ईमानदार नहीं है.

शुरुआती आनाकानी के बाद राजा परमाल इसके लिए सहमत हो गये. उन्होंने ‘आल्हा’ को बुलाया और अपनी बात रखी. इत्तेफाक से ‘आल्हा’ ने अपना घोड़ा माहिल को देने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा, ‘एक सच्चा राजपूत भले ही किसी के लिए अपने प्राण हंसते हुए दे दे, मगर अपने अस्त्र-शस्त्र और घोड़ा किसी को नहीं दे सकता’.

‘आल्हा’ का इंकार सुनते ही राजा को माहिल की बात सही लगने लगी. उन्होंंने क्रोध में आकर ‘आल्हा’ से राज्य छोड़ कर चले जाने को कहा. ‘आल्हा’ ने भी अपने राजा के आदेश का सम्मान रखा और महोबा से कन्नौज चले गये.

Jahangir Mahal, Bundelkhand (Pic: en.wikipedia)

जब पृथ्वीराज ने किया हमला

‘आल्हा’ के महोबा से जाते ही पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर हमले की घोषणा कर दी. हमले की सूचना मिलते ही रानी मलिन्हा ने राजा परमाल से ‘आल्हा’ को वापिस बुलाने की विनती की. पहले तो राजा परमाल राजी नहीं हुए, किन्तु समय के साथ उन्हें ‘आल्हा’ को बुलाना ही पड़ा.

राजा की सूचना मिलते ही ‘आल्हा’ जल्द ही पृथ्वीराज चौहान से लोहा लेने वापस महोबा पहुंच गये.

महोबा पहुंचते ही ‘आल्हा’ ने मोर्चा संभाल लिया. उनके साथ उनके भाई उदल भी थे. कहते हैं कि उदल बिल्कुल आल्हा की परछाई थे. वह भी इतने वीर थे कि सामने से उसे मार पाना लगभग असम्भव था!

पृथ्वीराज की सेना इस बात को समझती थी. वह जानती थी कि आल्हा को खत्म करने से पहले उसे उदल को अपने रास्ते से हटाना पड़ेगा. वह जानती थी कि जब तक उदल खड़ा है, तब तक एक कदम भी आगे बढ़ना आसान नहीं होगा. खैर, वह युद्ध के मैदान में थे, इसलिए किसी भी कीमत पर उन्हें आगे बढ़ना था. इसके लिए उन्होंंने एक प्लान के तहत उदल पर हमला बोल दिया.

इसी बीच दुश्मन को मारते हुए उदल पृथ्वीराज के नजदीक पहुंच गया. वह उन्हें मारने वाला ही था, तभी पृथ्वीराज के सेनापति चामुंडा राय ने उदल के पीठ पर वार कर उसकी हत्या कर दी. उदल की मृत्यु की सूचना पाते ही ‘अाल्हा’ क्रोधित हो उठे. उन्होंंने दुश्मन पर अपने प्रहार तेज कर दिए और अंत में पृथ्वीराज को पराजित करने में सफल रहे.

यही नहीं ‘अाल्हा’ अपने भाई की मृत्यु के प्रतिशोध की आग में पृथ्वीराज चौहान को मारने ही वाला थे, तभी उनके गुरु गोरखनाथ आ गये. उन्होंने कहा कि प्रतिशोध के लिए किसी की जान लेना धर्म नहीं है. गुरु की आज्ञा मानते हुए ‘अाल्हा’ ने पृथ्वीराज को प्राणदान दे दिया.

किन्तु, इस युद्ध के बाद वह खुद बैरागी हो गये. ‘अाल्हा’ की निस्वार्थ राज्यभक्ति ने उन्हें लोगों के बीच लोकप्रिय किया.

Aalha During War With Prithviraj Chauhan (Pic: witam-pl)

लोकगीतों में जीवित हैं ‘आल्हा’

जगनिक द्वारा रचा गया अाल्हाखंड, आज भी उत्तर भारत के कई राज्यों में वीररस से भरे लोकगीत के रूप में बहुत लोकप्रिय है. मुख्य रूप से बुन्देली और अवधी के इस महत्वपूर्ण छंद काव्य की रचना 11वीं शताब्दी में कालिंजर के परमार राजाओं के दरबारी भाट जगनिक ने की थी.

क्षेत्रीय भाषा में इसे ‘अाल्हा’ भी कहा जाता है. सभी हिन्दी भाषी प्रदेशों में गाई जाने वाली इस लोकगाथा पर क्षेत्रीय भाषाओं का बहुत असर पड़ा. भोजपुरी क्षेत्रों में इसे भोजपुरी भाषा के रस में गया जाता है, तो मगध में मगही भाषा में. इसी तरह यह अलग-अलग राज्योंं में अपनी अलग-अलग भाषाओं में लोकप्रिय है.

छंद के रूप में गायी जाने वाली इस लोकगाथा में ‘अाल्हा’ और उदल द्वारा लड़ी गयी 52 लड़ाइयों का वर्णन मिलता है. कुल मिलाकर आज के युग में भी ‘अाल्हा’ जिंदा हैं, फिर वह लोक गीतों के रुप में ही क्यों न हो!

Web Title: Alha The Warrior Who Defeat Prithviraj Chauhan, Hindi Article

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