महज 12 साल का था वो, जब पिता उमर शेख मिर्जा की मौत के बाद उसकी ताजपोशी बतौर फरगना (उज्बेकिस्तान) शासक हुई थी.

ये बालक बुलंद इरादे और मजबूत कद-काठी का था. वहीं तलवारबाजी में भी महारथी और घुड़सवारी में अव्वल रहता था. सपना एक ही कि एक दिन वह अपने पूर्वज तैमूर लंग के द्वारा बनाई गई राजधानी समरकंद को जीत लेगा!

वह बात और कि उसका ये सपना कभी हकीकत नहीं बन पाया.

बहरहाल, उसने उज्बेकों से सीखी युद्ध कलाओं के बल पर भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की और लंबे समय तक शासन किया.

जी हां! यहां बात हो रही है जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर की. कहते हैं कि उसके पास तुलुगमा नाम की एक ऐसी युद्ध नीति थी, जिसके बल पर वह अपने विरोधियों को पानी-पिला देता था.

तो आइए जानते हैं कि उसकी यह तुलुगमा युद्ध नीति क्या थी और –

छोटी उम्र में मिली फरगना की कमान

15 फरवरी 1483 ई. में फरगना रियासत के शासक उमर शेख मिर्जा के यहां एक लड़के का जन्म हुआ और उसका नाम रखा गया जहीरुद्दीन मुहम्मद. इस समय मध्य एशिया लालच और युद्ध के जाल में उलझा हुआ था और अपने ही अपनों के खून के प्यासे बने बैठे थे.

इसी अराजकता भरे माहौल में जहीरुद्दीन का बचपन बीता और जब वह अपनी किशोर अवस्था में पहुंचा उसके पिता उमर शेख मिर्जा की मौत हो गई, जिस कारण उसे अपने पिता के छोटे से साम्राज्य का सिंहासन सौंप दिया गया.

इस तरह से एक अपनी छोटी सी उम्र में ही जहीरुद्दीन फरगना का शासक बन गया. ठीक उसकी उम्र के विपरीत राज्य में चुनौतियां बड़ी थीं, जिनका सामना जहीरुद्दीन को करना था.

Zahiriddin Muhammad Bobur. (Pic: stapico)

समरकंद को पाने की लालसा

जहीरुद्दीन जब फरगना की राजगद्दी पर बैठा, तब उसका राज्य बाहरी आक्रमणों और खराब होती आंतरिक व्यवस्था से चरमरा चुका था. इन मुश्किलों से लड़ते हुए बाबर परिपक्व बन चुका था. वहीं वह एक बेहतरीन योद्धा भी था.

लिहाजा उसने अपने पूर्वज और कुख्यात आक्रमणकारी तैमूर की राजधानी समरकंद को जीतने के लिए ख्वाब बुनना शुरू कर दिया. साथ ही मौका मिलते ही उसने समरकंद पर हमला कर दिया. वह बात और है कि वह अपने पहले हमले में विफल रहा और उसे कैद कर लिया गया.

वहां से छूटने के बाद उसने समरकंद पर कई और हमले किए, लेकिन इस बार भी बाबर समरकंद को जीतने में सफल नहीं हो पाया. फिर एक बार सफलता मिली भी, लेकिन ज्यादा समय तक कायम नहीं रह पाई. ऊपर से इस प्रयास में उसका अपना राज्य फरगना भी उसके अपने ही रिश्तेदारों की साजिश का शिकार हो गया.

Battle of Samarkand. (Representative Pic: wikimedia)

तुलुगमा नीति से मिली हार तो…

समरकंद का सुल्तान बनने के लिए बाबर ने 3 बार आक्रमण किया, लेकिन उसे सभी अभियानों में कुल मिलाकर हार का सामना करना पड़ा.

इसका मुख्य कारण था उज्बेग शासक शैबानी खां. इसने बार-बार बाबर को हराया, उसका मुख्य हथियार थी तुलुगमा युद्ध नीति, जिसका तोड़ किसी के पास नहीं था.

तीसरी बार हारने और फरगना गंवाने के बाद जहीरुद्दीन अफगानिस्तान की ओर अपनी छोटी सेना के साथ चल पड़ा. इसी दौरान उसने उज्बेकों से तुलुगमा युद्ध नीति और युद्ध में बारूद का इस्तेमाल करना सीखा, जिसका उसने आगे आने वाले युद्धों में भरपूर इस्तेमाल किया.

महीनों भटकने के बाद उसने भारत का रुख किया और अपनी भारत यात्रा के पहले चरण में ही उसने काबुल को जीत लिया.

अचूक थी तुलुगमा युद्ध नीति

तुलुगमा मध्यकाल की एक सुदृढ़ युद्ध नीति थी, जिसका अविष्कारक उज्बेकों को माना जाता है. समरकंद अभियान के दौरान जहीरुद्दीन बाबर ने उज्बेकों से इसे ग्रहण किया था. इस युद्ध नीति में अपने विश्वस्त सिपाहियों के साथ रणभूमि में बीच में मौजूद राजा या बादशाह सेना को चार टुकड़ों में बांट देता था. पहली दो टुकड़ी आगे की ओर बादशाह के दाहिने और बाएं छोर की ओर व अन्य दो टुकड़ी पीछे की ओर इसी तरह तैनात रहती थीं.

सबसे आगे पंक्ति में ढेर सारी बैलगाड़ियां रखी जाती थीं और उनको चमड़े के रस्सों से आपस में बांध दिया जाता था. उसके बीच इतनी जगह छोड़ी जाती थी कि दो घुड़सवार सैनिक एक साथ निकल सकें. बैलगाड़ियों की मजबूत रक्षा पंक्ति के पीछे तोपखाना और धनुष बाण के माहिर निशानेबाज तैनात होते थे.

इसकी खास बात यह थी कि इसमें एक बार में एक ही टुकड़ी बाहर निकलती और जोरदार हमला बोलकर वापस रक्षापंक्ति में चली जाती थी. वहीं इस टुकड़ी के हमले से पहले दुश्मनों पर बाण और तोप के गोलों की बरसात की जाती थी, ताकि दुश्मन को संभलने का मौका ही न मिल सके और इस तरह दुश्मन चाहकर भी इस मजबूत घेरेबंदी को तोड़ नहीं पाता था.

Battle between Ibrahim Lodi and Babur. (Representative Pic: balance-athletics)

भारत की ओर कूच में मददगार बनी

जब बाबर काबुल पर अपना आधिपत्य स्थापित कर रहा था, तब भारत में लोदी साम्राज्य अपनी आपसी रंजिश के कारण अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था. इस समय दिल्ली की गद्दी पर लोदी वंश का एक युवा और अपरिपक्व, कमजोर शासक बैठा था, जिसका नाम था इब्राहिम लोदी.

उसका चाचा दौलत खां लोदी लाहौर का गवर्नर था और वहां का स्वतंत्र शासक बने रहना चाहता था, वहीं इब्राहिम लोदी का भाई आलम खां लोदी दिल्ली के तख्त का आकांक्षी था.

जब इनको बाबर के बारे में पता चला तो उन्होंने उसे भारत पर आक्रमण करने का लालच दिया. उनको लग रहा था कि शायद बाबर भारत पर हमला कर उन्हें दिल्ली की राजगद्दी सौंप देगा.

किन्तु, अफसोस ऐसा नहीं हुअा.

बाबर तो ऐसे ही मौके की तलाश में था. वह सबसे पहले पंजाब पहुंचा और विभिन्न कारणों से दौलत खान लोदी पर विश्वासघात का आरोप लगाकर उसे बंदी बना लिया, फिर आलम खान लोदी भी पराजित हुआ और उसने आत्म समर्पण कर दिया.

हमले का समाचार सुनकर इब्राहिम लोदी भौचक्का रह गया. चूंकि, वह इस युद्ध के लिए पहले से तैयार नहीं था, इसलिए आनन-फानन में उसने सेना जुटाई, इसमें अधिकांश अप्रशिक्षित और अयोग्य सैनिक थे. इब्राहिम लोदी ने भी बाबर का मुकाबला करने के लिए दिल्ली से कूच किया.

Army of Babur. (Representative Pic: imdb)

मुगल साम्राज्य की स्थापना

21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में इब्राहिम और बाबर की सेनाएं टकराईं. हालांकि, इब्राहिम लोदी के पास एक विशाल सेना थी, जिसमें घुड़सवार, हाथी और पैदल सैनिक थे, पर वह सभी अप्रशिक्षित थे.

वहीं बाबर के पास सैनिकों की संख्या कम थी, लेकिन वह पूरी तरह से सुसज्जित और पर्याप्त प्रशिक्षित प्राप्त थे. इसमें योग्य घुड़सवार, तलवारबाज, निशानची, धनुर्धर, तोपखाना व उस्ताद अली और मुस्तफा जैसे कुशल तोपची भी थे.

इब्राहिम और बाबर की सेना पानीपत के मैदान में टकराई और इब्राहिम लोदी ने अपनी पूरी सेना को आगे बढ़कर हमला बोलने का हुक्म दे दिया.

इस तरह इब्राहिम की सेना एक साथ आगे बढ़ी, लेकिन अचानक उनके पांव ठिठक गए.

असल में उनके सामने तुलुगमा की मजबूत किलेबंदी थी, चमड़े के रस्सों से बंधी बैलगाड़ियों की श्रृंखला ने उनके कदम रोक लिए. अब वे बाबर के बिछाए जाल में फंस गए थे. इब्राहिम की सेना कुछ समझ पाती इससे पहले उन पर गोलों और तीरों की बौछार शुरू हो गई और बारूद की वजह से लगी आग के कारण उनके हाथी बिदक गए और अपने ही खेमे में उत्पात मचाने लगे.

इसी समय इब्राहिम की बौखलाई सेना पर बाबर की पहली टुकड़ी ने जोरदार हमला बोला और फिर चौथी टुकड़ी ने पीछे से हमला बोल दिया. अब इब्राहिम चौतरफा घिर चुके थे.

दोपहर के युद्ध में ही लोदी सल्तनत की सेना धराशाई हो चुकी थी, इब्राहिम लोदी भी मारा गया.

First Battle of Panipat. (Pic: gkexperts)

और इस तरह से एक तुलुगमा कुशल युद्ध नीति के सामने इब्राहिम लोदी की बड़ी सेना को बाबर की छोटी सी सेना के सामने घुटने टेकने पड़े और हिंदुस्तान में मुगल वंश की स्थापना हो गई.

Web Title: Babur and his Tulughma Military Strategy, Hindi Article

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