इतिहासकारों ने बड़ी सफाई से इतिहास के पन्नों से भारतीय योद्धाओं की अकल्पनीय विजय की एक कहानी को हटा दिया.

यह कहानी है इजराइल में लड़ी गई उन भारतीय रणबांकुरों की, जिन्होंने तोप—बंदूक का इस्तेमाल किए बिना ही तुर्की, ऑस्ट्रिया और जर्मनी की संयुक्त साधन सम्पन्न शक्तिशाली सेना का मुकाबला किया.

केवल एक ही दिन में इजराइल को 400 साल पुराने ऑटोमन साम्राज्य से आजादी दिला दी थी महान भारतीयों ने!

इतिहास में इसे हाइफा युद्ध के नाम से जाना गया. इस जंग में 900 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी. हाइफा का युद्ध मानव इतिहास का सबसे बड़ा और अपनी तरह का आखिरी युद्ध है. भारतीय योद्धाओं के पराक्रम और साहस को समझने के लिए हाइफा युद्ध के पन्ने पलटने होंगे.

तो चलिए चलें इतिहास में… और जानें आखिर क्या हुआ था उस युद्ध में–

हाइफा में था तुर्की सेना का खौफ

वो साल 1918 था.

इसी साल नवंबर में पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ था. पूरी दुनिया में बारूद की गंद फ़ैल चुकी थी. जंग की आग में पूरा विश्व झुलस चुका था. कोई भी देश एक—दूसरे पर विश्वास करने को तैयार नहीं था. जंग खत्म होने के बाद भी माहौल सुधरने में अ​भी वक्त था.

ऐसे में फिलिस्तीन से सटे समुद्र किनारे में बसे हाइफा शहर पर जर्मन और तुर्की सेना का कब्जा था. अपने रेल नेटवर्क और बंदरगाह की वजह से हाइफा रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण जगह थी, जो युद्ध के लिए सामान भेजने के काम भी आती थी.

तुर्क साम्राज्य में बहाई समुदाय के आध्यात्मिक गुरु अब्दुल बहा के समर्थक तेजी से बढ़ रहे थे और इसी वजह से उनकी जान पर खतरा बन आया था. सेना ने उन्हें उसी साल गिरफ्तार कर लिया. हाइफा के रहवासी और बहाई समुदाय के लोग अब्दुल बहा को रिहा कराने की योजना बना रहे थे.

Turkish Army Ruled The Haifa (Representative Pic: independent)

​भारतीय रियासतों से आए सैनिक

भारत की आजादी से पहले एक बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना के हिस्से थे. हाइफा को तुर्की सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी ब्रिटिश सेना की थी. इस जंग को अंजाम देना मुश्किल था क्योंकि दुश्मन ज्यादा ताकतवर था.

यहां तुर्की, जर्मनी और ऑस्ट्रिया की संयुक्त सेना की चौकियां थी. सैनिकों के पास बंदूक, तोप, गोला—बारूद किसी चीज की कमी नहीं थी. ब्रिटिश सेना के लिए यह जंग किसी चुनौती से कम नहीं थी. ब्रिटिश अधिकारियों को सैनिकों की जरूरत थी. तब भारत की 3 रियासतों मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद से मदद की अपील की गई. ​

रियासतों ने इस अपील को स्वीकार किया और अपने लगभग 150,000 सैनिक जंग के लिए भेज दिए.

हैदराबाद रियासत के सैनिक मुस्लिम थे, इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें तुर्की के खलीफा युद्ध में हिस्सा लेने से रोक दिया. निजाम के सैनिकों को युद्ध बंदियों के प्रबंधन और देखरेख का कार्य सौंपा गया. जबकि मैसूर और जोधपुर की घुड़सवार सैन्य टुकडिय़ों को मिलाकर एक विशेष इकाई बनाई गई थी.

वह सेना के पास भले ही झंडा ब्रिटिश का था. उनकी वर्दी ब्रिटिश की थी मगर वह सैनिक भारत के थे. उनके अंदर जो जज्बा था वह भारतीय था. वह यह नहीं जानते थे कि इस जंग से ब्रिटिश को क्या फायदा होगा. वह बस मजबूर लोगों को बेकार की गुलामी से रिहा करवाना चाहते थे.

British Army Choose Indian Soldiers For Battle (Representative Pic: pintrest)

भारतीय सैनिकों को पीछे हटना मंजूर नहीं था!

भारतीय सैनिकों के पीछे कुछ संख्या अंग्रेजों सैनिकों की भी थी. ब्रिगेडियर जनरल एडीए किंग को दुश्मन सेना के बारे में जानकारी मिली. उन्हें पता था कि यदि सेना अंदर गई तो उनका लौट कर आना नामुमकिन है… इसलिए उन्होंने सेना को जंग न लड़ने के लिए कहा.

अंग्रेजी सैनिक पीछे हट गए. पीछे हटने का मौका भारतीय सैनिकों के पास भी था, पर मेजर दलपत सिंह शेखावत की अगुवाई में कोई भी सैनिक अपने फर्ज से पीछे नहीं हटना चाहता था. सवाल यह था कि यदि आज पीछे हटे तो वापिस जाकर अपने देश, अपनी रियासत और परिवार को क्या मुंह दिखाएंगे?

इसलिए 150,000 भारतीयों ने हाइफा शहर में दाखिल होना स्वीकार किया.

भारतीय सैनिक घोड़े पर सवार थे. उनके पास लड़ने के लिए केवल भाले और तलवारें थीं. अंग्रेज सरकार ने पैदल चलने वाले कुछ सैनिकों को बंदूकें थमा दीं. भारतीय घुड़सवार सैनिकों को हाइफा में मौजूद तुर्की सेना और माउंट कार्मेल पर तैनात तुर्की तोपखाने को तहस-नहस करना था. जोधपुर लांसर्स ने अपने सेनापति मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत के नेतृत्व में सबसे पहले शहर में कदम रखा.

Indian Soldier Did Not Step Back (Representative Pic: vegabomb)

एक दिन में ही हुआ दुश्मन ढेर

15वीं (इम्पीरियल सर्विस) घुड़सवार ब्रिगेड ने सुबह 5 बजे हाइफा की ओर बढ़ना शुरू किया और 10 बजे तक शहर के मुख्य द्वार पर पहुंच गए. इसके बाद सेना ने हाइफा पर धावा बोल दिया. इससे पहले कि तुर्की सैनिक अचानक हुए इस हमले से सावधान हो पाते, भारतीय सैनिकों ने बंदूकों से गोलियां बरसाना शुरू कर दिया.

जोधपुर के सैनिक माउंट कार्मेल पर भालों से हमला कर रहे थे. वहीं मैसूर के सैनिकों ने पर्वत के उत्तरी तरफ से हमला किया. इसके बाद घुड़सवार तेजी से शहर में दाखिल हुए और एक—एक कर तुर्की सैनिकों को भाले से मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया.

सेना के एक कमांडर कर्नल ठाकुर दलपत सिंह लड़ाई की शुरुआत में ही मारे गए. इसके बाद उनके डिप्टी बहादुर अमन सिंह जोधा आगे आए. शुरुआत में भले ही तुर्की सैनिक नहीं संभल पाए थे पर बाद में उन्होंने मोर्चा संभाला और मशीनगन से घुड़सवारों को निशाना बनाया.

यह दुनिया के इतिहास में घुड़सवार सेना का महान अभियान था. घोड़े घायल हो रहे थे पर रूक नहीं रहे थे. भारतीय सैनिकों पर चारों ओर से गोलीबारी शुरू हो गई. भारतीय सैनिक एक—एक कर मरते जा रहे थे और मारते भी जा रहे थे.

मैसूर लांसर्स की एक स्क्वाड्रन शेरवुड रेंजर्स ने दक्षिण की ओर से माउंट कार्मल पर चढ़ाई की. सैनिकों ने कार्मल की ढलान पर दो नौसैनिक तोपों पर कब्जा कर लिया. इसके बाद सैनिकों ने तुर्की सेना के हथियारों से ही उन पर हमला शुरू कर दिया. उनके दुश्मन यह देख कर हैरान हो गए थे कि आखिर कैसे भारतीय सैनिकों ने उनके ही हथियारों से उन्हें मारना शुरु कर दिया था.

‘बी’ बैटरी एचएसी के समर्थन से जोधपुर लांसर्स ने दोपहर 2 बजे के बाद शहर के बाहर से अपने बाकी घुड़सवार सैनिकों को बुलाया. दोपहर 3 बजे तक घुड़सवार सैनिकों ने तुर्की सेना की अधिकांश चौकियों को नष्ट कर दिया और बाकी पर कब्जा कर लिया. लगभग 4 बजे तक हाइफा शहर तुर्की सेना की गिरफ्त से आजाद हो चुका था.

Indian Army Used Enemy Artillery (Representative Pic: defenceforumindia)

भारत ने दिखाया अपना शौर्य

हाइफा युद्ध में 900 भारतीय सैनिकों ने अपनी कुर्बानी दी. भारतीय शूरवीरों ने जर्मन- तुर्की सेना के 700 सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया. इसके अलावा 17 तोपें, 11 मशीनगन और हजारों की संख्या में जिंदा कारतूस भी जब्त किए गए. अदम्य साहस दिखाने वाले ठाकुर दलपत सिंह को ब्रिटिश हुकूमत ने मरणोपरांत मिलिटरी क्रॉस से सम्मानित किया. उनके अलावा कैप्टन अनूप सिंह और से़कंड ले. सागत सिंह को भी मिलिटरी क्रॉस पदक दिया गया. ब्रिटिश हुकूमत ने कैप्टन बहादुर अमन सिंह जोधा और दफादार जोर सिंह को भी उनकी बहादुरी के लिए इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट पदक दिए.

हाइफा, यरुशलम, रामलेह और ख्यात बीच सहित इजराइल के सात शहरों में इस युद्ध से जुड़े कुछ अवशेष आज भी सही सलामत रखे हुए हैं. इजराइल की जनता हर साल 23 सितंबर को ‘हाइफा दिवस‘ मनाती है. वहां के स्कूलों में हाइफा युद्ध और भारतीय सैनिकों के शौर्य की गाथा पढ़ाई जाती है.

हाइफा युद्ध भारत के सैनिकों द्वारा लड़ा गया वह युद्ध था जिसे आज शायद ही कोई जानता होगा. इतिहास के पन्नों में यह कहानी न जाने कितने सालों से धुल खा रही है. यह युद्ध भले ही ब्रिटिश सेना ने लड़ा था मगर इसमें जीत भारतीय सैनिकों ने ही दिलाई. उन्होंने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि आखिर भारत के सैनिक कितने फौलादी हैं.

Web Title: Battle Of Haifa, Hindi Article

Feature Image Credit: careerwiki