दूसरा विश्व युद्ध खत्म ही हुआ था कि तमाम देशों के बीच सोवियत संघ एक नई मुसीबत बनके आ गया. उन्होंने संभवतः जर्मनी को हथियाने की सोच ली थी, जिसके लिए वह अमेरिका के खिलाफ भी चला गया था.

एक जंग से अभी पूरी दुनिया उबर ही रही थी कि यह मामला दूसरी जंग के दरवाजे खोलने वाला था. इससे बचने के लिए सभी देशों ने एक आईडिया निकाला जिससे न तो को गोली चली और न ही कोई हिंसा हुई. बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से सोवियत के हाथों से जर्मनी का एक भाग छीन लिया गया. आखिर यह हुआ कैसे चलिए जानते हैं–

जर्मनी को हथियाना चाहता था सोवियत संघ?

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद मित्र देशों ने जर्मनी के विभाजन और शासन के लिए शांति सम्मेलन बुलाया. जर्मनी को चार क्षेत्रों में विभाजित कर दिया गया और चारों का शासन अलग-अलग सोवियत संघ, ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस को सौंप दिया गया. पूर्वी जर्मनी को जर्मन जनतांत्रिक गणराज्य और पश्चिमी जर्मनी को संघीय जर्मन गणराज्य का नाम दिया गया. जब कि बर्लिन को संयुक्त नियंत्रण में रखा गया. जर्मनी के पश्चिमी क्षेत्रों में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का विकास हुआ जिस पर अमेरिका का व्यापक प्रभाव था वहीं पूर्वी जर्मनी में साम्यवादी शासन व्यवस्था स्थापित हुई जिस पर यूएसएसआर (सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ) का प्रभुत्व था.

जर्मनी के विभाजन के बाद से उसके चारों हिस्सों में चार अलग-अलग अर्थव्यवस्था चल रही थी. थोड़े समय बाद तीन देशों ने सोचा कि जर्मनी को एक अर्थव्यवस्था बनाया जाए, लेकिन सोवियत इसके खिलाफ था.

1948 को सोवियत क्षेत्र से गुजरने वाले पश्चिमी जर्मनी को पश्चिमी बर्लिन से जोड़ने वाले प्रमुख हाईवे को मरम्मत कार्य का बहाना देकर अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया. ठीक इसके 9 दिन बाद रेल व जल यातायात भी पूरी तरह से बंद कर दिया गया. अब पश्चिमी बर्लिन पूरी तरह से कट चुका था. वहां की बिजली काट दी गई, उद्योग-कारखाने बंद हो गए, वहां रह रहे लाखों लोगों के सामने अचानक भूख और रोजगार का संकट खड़ा हो गया.

ऐसे में अमेरिका सैन्य कार्रवाई करके बर्लिन की घेराबंदी को खत्म कर सकता था, लेकिन इससे दो परमाणु शक्तियों के बीच शीत युद्ध वास्तविक युद्ध में बदल जाता जिससे भयावह हालात पैदा हो सकते थे. इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन बिना सैन्य कार्रवाई किए सोवियत नाकेबंदी को खत्म करना चाहते थे.

Soviet Union Divided The Germany (Representative Pic: worldwarphotos)

ऑपरेशन विटल्स: प्लेन से किया सामान डिलीवर

दूसरे विश्व युद्ध के बाद कोई भी सोवियत के साथ जर्मनी के मामले में लड़ाई नहीं करना चाहता था. इसलिए सभी ने सोचा कि कोई और तरीका अपनाया जाए लोगों की जरूरत पूरी करने. इसके लिए सभी ने सोचा कि क्यों न आसमान से अपने प्लेन से बम की जगह सामान भेजा जाए.

अपने इस ऑपरेशन को उन्होंने ऑपरेशन विटल्स का नाम दिया. अमेरिकी एयरफोर्स ने प्लेन में खाना और कोयला भरा और बर्लिन के ऊपर उड़ते हुए पैराशूट से उन्हें नीचे लोगों तक पहुंचाया. उन्होंने इससे सोवियत का खेल ही बदल दिया. वह रोजाना प्लेन ले जाते और लोगों तक जरूरत का सामान पहुंचाते. इस मिशन के लिए न सिर्फ लड़ाकू जहाज बल्कि कमर्शियल जहाज़ों को भी ब्रिटिश और अमेरिकी सरकार ने इस्तेमाल किया.

अपने इस काम के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने अपने लोगों से दान तक माँगा. उन्होंने अपने देश के लोगों से कपड़े और खाने की चीजें मांगी क्योंकि बाकी कई देश खुद इनकी कमी से जूझ रहे थे. इतनी दूर से जर्मनी तक सामान लाना मुश्किल था, फिर भी इन देशों ने इसे अंजाम दिया.

कई बार एक मिनट के अंदर चार-पांच प्लेन को निकलना पड़ता था सामान पहुंचाने. माना जाता है कि इस मिशन का सबसे कठिन दिन था ‘ईस्टर परेड’ का दिन. उस दिन करीब 12,940 टन का सामान बर्लिन भेजा गया था.

इस मिशन के कारण सोवियत और अन्य देशों के रिश्तों में कोई खटास भी नहीं आई, न ही लोगों को किसी प्रकार की बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ा. इस मिशन के दौरान करीब 3 लाख बार प्लेन उडाए गए और 2.4 मिलियन टन खाना जरूरतमंदों को पहुंचाया गया. यह मिशन इतने बड़े लेवल पर हुआ था कि इतिहास के पन्नों में इसका नाम दर्ज हो गया.

American & British Military Started To Give Food Supplies Through Plane’s (Representative Pic: nicolasbouliane)

और खत्म हुई नाकाबंदी

हालांकि बर्लिन एयरलिफ्ट के दौरान एक डर ये बना हुआ था कि कहीं सोवियत संघ पश्चिमी देशों के विमानों को मार न गिराए. हालांकि ऐसा नहीं हुआ और अंततः 1949 को घेराबंदी हटा ली और सड़कों, नहरों व रेलवे मार्गों को फिर से खोल दिया गया.

कहा जा सकता है कि बर्लिन की नाकाबंदी का उद्देश्य पश्चिमी देशों को बर्लिन पर सोवियत दृष्टिकोण को स्वीकार करने पर विवश करना था. हालांकि 1949 तक यह स्पष्ट हो चुका था कि पश्चिम बर्लिन की सोवियत नाकेबंदी विफल रही थी.

बल्कि, बर्लिन की नाकेबंदी ने ये ज़रूर स्पष्ट कर दिया था कि यूएसएसआर एक अच्छा साम्यवादी देश नहीं है.

सोवियत संघ ने अपना पूरा जोर लगा दिया बाकी देशों को अपने आगे मजबूर करने के लिए पर फिर भी वह कुछ नहीं कर पाया.

यह मिशन एक बेहद ही सफल मिशन साबित हुआ. न तो इसमें कोई गोली चली और न ही किसी प्रकार की कोई हिंसा हुई. हाँ थोड़ी बहुत परेशानियां सामने जरूर आई, लेकिन उसके बावजूद भी सोवियत के जबरन कानून से लोगों को निजात दिला दी गई.

After A Lot Of Attempts Berlin Airlift End The Soviet Blockage (Pic: kingdomoftots)

बर्लिन से सोवियत संग को बिना लड़े हटाना अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती थी. इस काम में अगर कोई भी गलती होती तो एक नई जंग शुरू हो सकती थी. बहुत ही सूझ-बूझ से अमेरिका और ब्रिटेन की सेना ने इस काम को अंजाम दिया और दुनिया को फिर जंग लड़ने से बचा लिया.

Web Title: Berlin Airlift: End of Soviet rule in Germany, Hindi Article

Feature Image Credit: emaze