2 दिसम्बर 1984!

इतिहास के पन्नोंं में दर्ज एक ऐसी तारीख, जो अपने अंदर ढ़ेर सारे जख्म संजोए हुए है. इस दिन मध्य प्रदेश के भोपाल में एक ऐसी त्रासदी हुई, जिसने देखते ही देखते शहर के हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया.

चूंकि, यह हादसा जहरीली गैस लीक होने की वजह से हुआ था, इसलिए इसे भोपाल गैस कांड कहा गया.

कहा जाता है कि इस त्रासदी की नींव उस वक्त ही रखी गई थी, जब 1969 में अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड ने भोपाल में अपनी फैक्ट्री लगाई. इस फैक्ट्री में कीटनाशक दवाइयां बनाई जाती थीं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस फैक्टरी के बनने से भोपाल के कई लोगों को रोजगार मिला, लेकिन शायद लोग यह नहीं जानते थे कि रोजगार देने वाली यह फैक्टरी पांच साल बाद पूरे के पूरे भोपाल शहर पर ही कहर बन कर टूटेगी!

आईये इस पूरे कांड के घटनाक्रम को जानने की कोशिश करते हैं–

तीन दिसंबर की वो मनहूस रात

1969 के बाद फैक्ट्री सुचारु रूप से चलने लगी थी. सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा था.

रोज की तरह 3 दिसम्बर को भी फैक्ट्री अपने समय से खुली. यहां काम करने वाले लोग अपने-अपने कामों में लगे हुए थे. शाम तक सबकुछ एकदम पटरी पर था. इसी बीच रात के करीब 11 बजे फैक्टरी में जहरीली गैस (मिथाइल आइसोसाइनाइट) के लीक होने की सुगबुगाहट होने लगी.

सबसे पहले यह खबर ऑपरेटर ‘सुमन डे’ को मिली. उन्होंने तुरंत उस जगह का पता लगा लिया, जहां से गैस लीक हो रही थी. गैस स्टोर रूम में मौजूद एक पाइप से लीक हो रही थी. इस स्टोर रूम में खतरनाक केमिकल्स के अलावा सीमेंट की मोटी परत के नीचे मिथाइल आइसोसाइनाइट के तीन टैंक भी मौजूद थे. सुमन को लगा यह मामूली रिसाव है, इसलिए उन्होंंने उसे गंभीरता से नहीं लिया और लीकेज वाले पाइप को जुगाड़ से सही कर दिया.

शायद उनको यह इल्म नहीं रहा होगा कि उनका यह जुगाड़ ज्यादा देर तक गैस के इस रिसाव को बांध कर नहीं रख पायेगा.

Bhopal Gas Tragedy, Factory (Pic: npr.org)

भारी पड़ी ‘सुमन डे’ की लापरवाही 

सुमन के जाने के कुछ देर बाद ही गैस का रिसाव बढ़ गया. फैक्टरी के कर्मचारियों ने तुरंत सुमन को इसकी जानकारी दी. सुमन मौके पर पहुंचे और स्टोरेज रूम का प्रेशर चेक किया. वह हैरान थे, क्योंकि उनका जुगाड़ फेल होता दिख रहा था. गैस का प्रेशर काफी बढ़ गया था. सुमन शायद समझ गये थे कि यह गंभीर विषय है. वह तुरंत इसको कंट्रोल करने में लग गये. उन्होंंने आपात्कालीन गैस कण्ट्रोल प्रक्रिया को शुरू कर दिया, ताकि जल्द से जल्द इस पर काबू किया जा सके.

किन्तु, कुछ होता हुआ दिख नहीं रहा था. गैस का दबाव बढ़ता जा रहा था. कुछ ही देर में गैस का रिसाव इतना बढ़ गया कि ‘मिथाइल आइसोसाइनाइट’ फैक्टरी के पाइप्स से होती हुई, चिमनी के रास्ते शहर की हवा में पहुंच गई.

फैक्टरी के कर्मचारी गैस को रोकने के लिए चिमनी और गैस कंटेनर्स पर पानी डाल कर दबाव को कम करने की कोशिश कर रहे थे. करीब आधे घंटे तक लगातार पानी की बौछार मारी गयी. बावजूद इसके गैस लगातार चिमनी से निकल कर बाहर निकलती रही. अगले कुछ ही घंटों में गैस ने लगभग आठ किलोमीटर के क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया. करीबन 2500 लोग इस रात काल के गाल मे समा गये. जबकि 4000 से अधिक लोग अपंग हो गये.

Bhopal Gas Tragedy, Effected Peoples (Pic: ibtimes)

क्या था गैस के रिसाव असल कारण?

मामला गंभीर था, इसलिए इसकी जांच होना स्वभाविक था. सीआईएसआर के डॉयरेक्टर डॉ त्यागराजन तत्काल प्रभाव से भोपाल भेजे गये. उन्होंने घटना स्थल पर पहुंच कर मौके का पूरा जायजा लिया. साथ ही हर एक एंगल को बारीक नजरों से देखा, ताकि पता लगाया जा सके कि आखिर यह रिसाव कैसे हुआ और इसका जिम्मेदार कौन है?

जांच में पाया कि एमआईसी गैस के ई-6-10 टैंक में लोहे की अशुद्धियों वाले पानी के मिलने से यह दुर्घटना हुई थी. यहां तक तो ठीक था, लेकिन अब सवाल यह था कि आखिर गैस का टैंक पानी तक पहुंचा कैसे?

चूंकि, यह हादसा जिस फैक्ट्री में हुआ था, इसलिए इस सवाल का जवाब भारत से ज्यादा अमेरिका के लिए जरूरी था. अमेरिकी अन्वेषक माइकल राइट ने इस मामले की जांच के लिए अपना कदम बढ़ाया. हालांकि, उन्हें अमेरिकी व भारत सरकार की तरफ से क़ानूनी तौर इस जांच की अनुमति नहीं दी गयी थी. माइकल टूरिस्ट वीज़ा पर भारत आये और गुप्त रूप से इस हादसे की जांच में लग गये.

Bhopal Gas Tragedy (Pic: newsmobile)

सुरक्षा उपकरण खराब होने का खुलासा

माइकल ने अपनी जांच के दौरान प्लांट के कई गोपनीय नक्शों व दस्तावेजों को खंगाला. साथ ही उन्होंने इस त्रासदी से जुड़े लोगों से भी बात की. इस पूरी प्रक्रिया के बाद जो तस्वीर निकल कर सामने आई वह चौंकाने वाली थी.

माइकल की जांच के मुताबिक ‘यूनियन कार्बन फैक्टरी’ में लगे सभी सुरक्षा उपकरण खराब थे. उन्होंने बताया कि जिस दिन यह हादसा हुआ, उस दिन करीब 9.30 बजे तक केमिकल प्रोसेसिंग का काम हुआ था. इसके अंतर्गत प्लांट की सभी प्रोसेसिंग पाइप्स में पानी का प्रेशर मार कर उन्हें साफ किया जाता है. इस प्रक्रिया में दूसरी तरफ से पानी का निकलना जरुरी होता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पानी पाइप्स में रह गया और हादसे का बड़ा कारण बना.

फैक्टरी कर्मचारियों से पूछताछ के दौरान यह बात भी सामने आई कि हादसे से कुछ दिन ही पहले प्लांट में नई ज्वाइंट पाइप लगाई गई थी, जिसे ‘जम्पर लाइन’ कहा जाता है. इसके लगने से ‘एमआईसी टैंक’ प्रोसेसिंग यूनिट से जुड़ गया. मतलब पानी को ‘एमआईसी टैंक’ तक पहुंचने का रास्ता मिल गया था.

हालांकि, इसको रोकने के लिए पाइप्स के जोड़ पर लोहे की एक प्लेट लगाई गई थी. इसे ‘स्लिप लाइन’ नाम दिया गया था. यह पानी को ‘एमआईसी’ टैंक तक जाने से रोकने में कारगार मानी जाती थी. मगर हैरान करने वाली बात यह थी कि यह भी अपनी जगह पर मौजूद नहीं थी.

आपदा से बचने के लिए स्टोरेज रूम के पास ‘विंटेज स्क्रबर’ नामक सिलेंडर नुमा टैंक की व्यवस्था की गई थी. यह गैस के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए स्थापित किया गया था. मगर ऐन मौके पर यह भी फेल हो गया.

कुल मिलाकर फैक्ट्री के अंदर आपदा से जुडे़ हुए सारे संसाधन बेकार साबित हुए.

बताया गया कि कम्पनी भारी नुकसान में चल रही थी, इसलिए कंपनी के मालिक एंडरसन ने सुरक्षा इंतजामों को अनदेखा किया था. वह सुरक्षा उपकरणों पर होने वाले खर्च से बचना चाहते थे.

Bhopal Gas Tragedy, Anderson (Pic: indiatoday)

हजारों लोग काल के गाल में चले गये, तो…  

इस त्रासदी के बाद सामने आये आंकड़ों के मुताबिक इस जहरीली गैस ने करीब 15,274  लोगों को मौत की नींद सुला दिया, जबकि लाखों लोग अलग-अलग अपंगता से ग्रस्त हुए. हालांकि, मरने वालों की गिनती को लेकर हमेशा बहस रहती है. कुछ लोगों को कहना है कि मरने वालों की गिनती 8000 के करीब थी.

इस मामले की सीबीआई जांच कराई गई. उन्होंंने अपनी जांच में कंपनी के कई अधिकारियों को दोषी पाया. इनमें से 7 पर मुकदमा चलाया गया और बाद में सजा भी सुनाई गयी, लेकिन त्रासदी के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन सजा से बच गए.

बाद में भारतीय न्यायपालिका के आदेशों पर यूनियन कार्बाइड कंपनी को 470 मिलियन डॉलर का हर्जाना देना पड़ा.

Bhopal Gas Tragedy (Pic: ramlathkavil)

भले ही इस कांड से संबंधित कई अधिकारियों को सजा दे दी गई हो और कंपनी ने हर्जाना भी दिया हो, लेकिन इस हादसे में जिन लोगों की मौत हुई. उनके परिजन आज तक 3 दिसम्बर की उस रात को नहीं भूले हैं. 30 साल बाद भी इसको याद करके उनकी आंखें नम हो जाती हैं.

कंपनी के मालिक का भी सजा मिलने से बच जाना कई पीड़ित परिवारों को रह रहकर दुःख पहुंचाता रहता है.

Web Title: Bhopal Gas Tragedy, Hindi Article

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