भारत में बहुत से ऐसे महान व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने दुनिया भर में अपना नाम मशहूर किया है. ऐसे ही एक व्यक्ति थे बोधिधर्म.

कहने को तो बोधिधर्म सिर्फ एक बौद्ध साधू थे मगर उनके ज्ञान ने उन्हें बिलकुल ही अलग उपलब्धि पर ला खड़ा किया था. आज के समय में अधिकतर लोग सोचते हैं कि कुंग-फू और मार्शल आर्ट्स चीन और जापान जैसे देशों ने इजाद किया है, जब कि ऐसा नहीं है. चीन में मार्शल आर्ट्स को लाने के श्रेय बोधिधर्म को जाता है. उन्होंने ही अपने ज्ञान से चीन के लोगों को लड़ने की यह कारगर तकनीक सिखाई. इतना ही नहीं इसके अलावा भी बहुत सी चीजों से बोधिधर्म ने ही चीन को रूबरू किया.

तो आइए इतिहास के पन्नों से बोधिधर्म के अदभुत जीवन को जानने की कोशिश करें–

साधू बनने के लिए छोड़ी ‘राजकुमार की जिंदगी’

बोधिधर्म की जिंदगी शुरुआत से ही साधुओं वाली नहीं थी. वह किसी बौद्ध साधू के वंशज भी नहीं थे. असल जिंदगी में तो बोधिधर्म एक रईस राजकुमार थे. माना जाता है कि बोधिधर्म दक्षिण भारत के पल्लव राजवंश में जन्मे थे. उनके पिता कांचीपुरम के राजा थे. बचपन से ही बोधिधर्म के पास असीमित दौलत थी. किसी भी चीज की कमी उनके लिए नहीं थी. ऐशो-आराम के साथ वह अपना पूरा जीवन बिता सकते थे मगर ऐसा हुआ नहीं. बोधिधर्म आसान जिंदगी चुन सकते थे, लेकिन उन्होंने एक आम जिंदगी को चुनना बेहतर समझा.

कहते हैं कि बोधिधर्म बचपन में ही बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो गए थे. बौद्ध साधुओं का सरल जीवन और आंतरिक शांति ढूँढने का प्रयास उन्हें बहुत अच्छा लगता था. बोधिधर्म अपने तीन भाईयों में सबसे छोटे थे. ऐसी धारणाएं हैं कि उन्हें बचपन से ही सांस लेने की परेशानी थी. अपनी इस परेशानी से बचने के लिए उन्हें सांस लेने के कुछ खास अभ्यास करने पड़ते थे. इसके जरिए ही वह योग के भी करीब होते गए.

शुरूआती दिनों में बोधिधर्म ने लड़ने की कला भी सीखी. उन्होंने कई तरह की युद्ध कला में महारत हासिल की मगर वक़्त के साथ उनका ध्यान युद्ध से हट के बौद्ध धर्म की ओर जाने लगा. इसके साथ ही उन्होंने कम उम्र में ही एक बौद्ध साधू बनने की ठान ली. उन्होंने ‘ध्यान’ सीखने से अपनी शुरुआत की. बौद्ध धर्म में ध्यान सीखने के दौरान अपने दिमाग को कैसे शांत किया जाता है यह सिखाते हैं. बोधिधर्म ने भी इसे सीखा और ऐसा सीखा कि आखिर में इसने उन्हें बौद्ध धर्म का 28वां आचार्य बना दिया.

जब बोधिधर्म पूरी तरह से ध्यान करने में माहिर हो गए तो उन्हें इस शिक्षा को बढ़ाने के लिए चीन एक दूत के तौर पर भेज दिया गया. वहां से शुरू हुआ बोधिधर्म का असली सफर.

Bodhidharma Left His Home For Being A Buddhist Monk (Representative Pic: deviantart)

मार्शल आर्ट्स को दिया ‘जन्म’

माना जाता है कि 495 ईस्वी में बोधिधर्म के चीन जाने से करीब तीस साल पहले ही एक बौद्ध साधू चीन में जाके शाओलिन मंदिर की शुरुआत कर चुका था. जब बोधिधर्म वहां गए तो उनका काम था बौद्ध शिक्षा को और भी आगे बढ़ाना मगर यह काम इतना आसान नहीं था. चीन के माउंट सोंग वह शाओलिन मंदिर स्थित था. चीन पहुंचने के बाद बोधिधर्म सीधा उस मंदिर पर ही गए. उन्होंने वहां के लोगों को बताया कि वह भारत से आए हैं और उन्हें योगा के जरिए ध्यान लगाना सिखाना चाहते हैं, मगर मंदिर के अधिकारियों ने उन्हें मंदिर में प्रवेश करने से मना कर दिया.

मंजूरी न मिलने पर भी बोधिधर्म ने कुछ नहीं कहा और पहाड़ पर और भी ऊपर चले गए एक गुफा में ध्यान लगाने के लिए. मंदिर अधिकारियों को लगा कि बोधिधर्म कुछ वक़्त में ही वहां से चलाए जाएंगे मगर एक बार जैसे ही वह ध्यान लगाने बैठे तो उन्होंने उसे जगह को अपना घर बना लिया. ऐसी धारणाएं हैं कि बोधिधर्म करीब 9 साल तक उस गुफा में ध्यान लगाते रहे. इसी बीच उन्होंने खुद को स्वस्थ रखने के लिए कुछ नई कसरतों को भी इजाद किया. 9 साल की तपस्या के बाद मंदिर अधिकारियों ने बोधिधर्म को शाओलिन मंदिर में आने की इजाजत दी.

जैसे ही बोधिधर्म मंदिर के अंदर गए उन्होंने देखा कि वहां का कोई भी व्यक्ति तंदरुस्त नहीं है. इसके लिए उन्होंने जो कसरत गुफा में की थी उन्हें ही मंदिर के लोगों को सिखाया और यही आगे चलकर मार्शल आर्ट्स बनी. यह बहुत ही कारगर थी. इससे शरीर भी स्वस्थ रहता था और बिना हथियार के लड़ना भी इसके कारण आ जाता था. देखते ही देखते यह नई युद्ध विद्या चीन से निकल और आस-पास के बाकी देशों तक फैल गई.

बोधिधर्म की सिखाई इस विद्या को ‘जेन बुद्धिज्म’ का नाम दिया गया.

Bodhidharma Invented The Martial Arts (Representative Pic: shaolinmontreal)

चाय की खोज और बोधिधर्म की मौत!

बोधिधर्म को सिर्फ मार्शल आर्ट्स का खोजकर्ता ही नहीं माना जाता है. कहते हैं कि एक और चीज की उन्होंने खोज की थी जिसे आज के समय में चाय के रूप में लोग जानते हैं. बोधिधर्म से जुड़ी यह कहानी बहुत ही मशहूर है. माना जाता है कि जब शाओलिन मंदिर के लोगों ने बोधिधर्म को अंदर नहीं आने दिया तब वह एक गुफा में 9 साल तक ध्यान लगते रहे. ध्यान लगाने के दौरान एक समय ऐसा आया जब बोधिधर्म का ध्यान थोड़ा सा टूटा और वह गलती से सो गए.

जैसे ही बोधिधर्म की आँखें खुली उन्हें एहसास हुआ कि नींद उनके ध्यान में बाधा डाल रही है. वह इसका कोई तोड़ लाना चाहते थे ताकि ध्यान लगते समय किसी को भी नींद न आए. इस कड़ी में उन्होंने गौर किया कि नींद आते समय हमारी पलकें जुड़ जाती हैं और हमारी आँखें बंद हो जाती है. इसके बाद तो बोधिधर्म ने कुछ नहीं सोचा और अपनी पलकें काट दी. कहते हैं कि वह पलकें जब जमीन पर गिरीं तो कुछ समय बाद उनसे एक पौधा बन गया जिसे बाद में चाय का पौधा माना गया. यह कहानी कितनी सच है और कितनी नहीं यह तो आज भी एक सवाल बना हुआ है.

खैर, चीन जाने के बाद बोधिधर्म वहीं पर रहे और लोगों को सिखाते रहे. इसी काम में उन्होंने अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया. माना जाता है कि उनके चार शिष्य थे जिन्हें वह हर दम अपने साथ रखते थे. बोधिधर्म के आखिरी पलों में भी वह शिष्य उनके साथ थे. बोधिधर्म ने उनसे बस इतना कहा कि वह बौद्ध धर्म की बातों को आगे लोगों तक पहुंचाते रहे और उन्हें ध्यान लगाने का महत्व सिखाते रहे. इसके साथ ही बोधिधर्म ने अपनी आखिरी सांसें ली और दुनिया से चले गए मगर उनकी सिखाई बातें आज भी जिंदा हैं.

Many People Believe That Bodhidharma Invented The Tea (Pic: teahouse)

यह थी बोधिधर्म की एक आम बौद्ध साधू से महान बौद्ध साधू बनने की दास्तान. आज भले ही ज्यादा लोग इनके बारे में न जानते हों मगर एक समय था जब इनकी गिनती महान लोगों में होती थी.

तो कैसी लगी आपको बोधिधर्म की यह दिलचस्प कहानी हमें जरूर बताएं कमेंट बॉक्स में.

Web Title: Bodhidharma Buddhist Monk Who Invented Martial Arts, Hindi Article

Feature Image Credit: flashlarevista