यूं तो पंजाब की प्रचलित लोककथाओं में आपने महाराजा रणजीत सिंह से संबंधित ढेर सारी कहानियां सुनी होगी. इनमें से ज्यादातर कहानियों में आपने उनकी उदार और सभी धर्मों के प्रति सम्मान वाली छवि देखी होगी.

किन्तु, क्या आप जानते हैं कि महज 10 की उम्र में वह अपने पिता के साथ एक लड़ाई में शामिल हुए थे और अंतिम मौके पर जब उनके पिता गंभीर रुप में बीमार पड़ गए, तो उन्होंने आगे बढ़कर पिता के साथियों का साथ दिया और दुश्मन को मार गिराया.

वहीं जब वह 17 के हुए तो उन्होंने भारत पर हमला करने वाले आक्रमणकारी जमन शाह दुर्रानी को धूल चटाई.

इसी कड़ी में आगे वह पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट करने में सफल रहे, तो अपने जीते जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं फटकने दिया. यही वजह रही कि वह उन्हें शेर-ए-पंजाब के नाम से प्रसिद्ध हुए.

तो आईये आज महाराज रणजीत सिंह के जीवन के उन पहलुओं को छूने की कोशिश करते हैं, जो साहस के प्रेरणास्रोत हैं–

10 की उम्र में युद्ध का ‘पहला स्वाद’

रणजीत सिंह का जन्म सन 1780 में गुजरांवाला में हुआ था. उनके पिता का नाम महा सिंह और माता का नाम राज कौर था. चूंकि, उनके पिता सुकर चाकिया मिसल के मुखिया थे, जोकि उस समय का जाना माना संगठन था. इस कारण उनकी नन्हीं आंखों ने हमेशा वीरता की तस्वीरें देखी और उनके कानों ने साहस के किस्से सुने.

रणजीत सिंह को युद्ध का पहला स्वाद था, जब वह शायद दस साल के थे. असल में उस दौर में साहिब सिंह भांगी नामक एक शासक हुआ करता था, जिसका वास्ता गुजरात से था. उसने रणजीत सिंह के पिता को कमजोर जानकर उन पर हमला कर दिया. बाद में जब उसे कड़ी टक्कर मिली, तो उसने खुद को एक सोधरन के किले में कैद कर लिया.

साथ ही वहां से महा सिंह की सेना पर वार करना शुरु कर दिया.

चूंकि, उसके इरादे नेक नहीं थे, इसलिए महा सिंह ने तय किया कि वह किसी भी कीमत पर उसे किले से निकाल कर रहेंगे और सबक सिखायेंगे, ताकि कोई और उसकी तरह दुस्साहस न कर सके. इसके लिए उन्होंने पूरे किले की घेराबंदी कर ली. महीनों तक वह अपने सैनिकों के साथ पड़ रहे, लेकिन साहिब सिंह भांगी को परास्त नहीं कर सके.

Maharaja Ranjit Singh (Pic: Inmemory)

पिता महा सिंह का स्वास्थ्य बिगड़ा तो…

दूसरी तरफ उनका स्वास्थ्य भी तेजी से बिगड़ने लगा. इसकी खबर जब भांगी के दूसरे साथियों को मिली तो वह उसे बचाने के लिए वहां पहुंच गए. उन्हें लगा था कि महा सिंह बीमार है, इसलिए उन्हें हराना बहुत आसान होगा.

एक हद तक वह सही भी थे, किन्तु उन्हें नहीं पता था कि महा सिंह के साथ उनका 10 साल का बेटा भी इस युद्ध का हिस्सा था, जोकि पिता की जगह खुद मोर्चा संभाल चुका था. जैसे ही वह किले के पास पहुंचे, रणजीत सिंह ने अपने नेतृत्व में अपनी सेना को उन पर हमला करने का आदेश दिया.

अंत में परिणाम यह रहा कि इस लड़ाई में उनके चलते ही महा सिंह की जीत हुई. हालांकि, महा सिंह इसके बाद ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह सके और अगले दो वर्ष बाद 1792 में मृत्यु को प्यारे हो गए थे.

पिता की मृत्यु के बाद उनकी सत्ता के राजपाट का सारा बोझ रणजीत सिंह के कंधों पर आ गया. हालांकि, वह उम्र में बहुत छोटे थे, इसलिए उनकी मां ने उनकी मदद की और उन्हें इसके लिए तैयार किया.

बाद में 12 अप्रैल 1801 को वह आधिकारिक रुप में महाराजा की उपाधि से नवाजे गए.

Sikh Darbar (Pic: Sikh24.com)

अफगानों के लिए काल का पर्याय बने

महाराज बनते ही उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और अपने साम्राज्य का विस्तार शुरु कर दिया. उनके दौर में भारत में अफगानों ने अपना आतंक मचा रखा था. वह तेजी से लूट-पाट करने में लगे थे. रणजीत सिंह ने उनका इलाज करते हुए  उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने उनके खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं.

इसके परिणाम स्वरुप वह उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ने में सफल रहे. आगे बढ़ते हुए उन्होंने पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाया, जोकि उनकी बड़ी सफलता साबित हुआ.

यह एक ऐसा क्षेत्र था, जहां पर उनसे पहले किसी गैर मुस्लिम ने राज नहीं किया था.

वह यही नहीं रुके आगे बढ़ते हुए उन्होंने पेशावर, जम्मू कश्मीर और आनंदपुर तक अपनी विजय पताका लहराई.

खुद को और ज्यादा मजबूत करते हुए उन्होंने एक विशेष सेना के गठन में अपनी अहम भूमिका अदा की, जिसे ‘सिख खालसा’ के नाम से जाना गया. कहा जाता है कि अपने शासन काल में उन्होंने पंजाब को एक समृद्ध और मजबूत राज्य बना दिया था. इतना मजबूत कि उनके जीते-जी अंग्रेज तक वहां कदम रखने से डरते रहे.

आखिरकार उन्होंने मध्य पंजाब के क्षेत्र सतलुज से झेलम तक पर कब्जा कर, अपने क्षेत्र का विस्तार किया और सिख साम्राज्य की स्थापना की. उनकी बहादुरी और साहस के कारण उन्होंने “शेर-ए-पंजाब” कहा गया.

Bravery Story of Maharaja Ranjit Singh, War (Pic: Flickr)

कोई कितना भी महान हो लेकिन, मृत्यु से नहीं भाग सकता, इसिलए महराज रणजीत सिंह को भी मृत्यु को गले लगाना पड़ा. 27 जून 1839 को लाहौर में उन्होंने हमेशा के लिए अपनी आंखे मूंद लीं. भले ही उनकी मृत्यु को सैकड़ों साल हो गए हैं, लेकिन आज भी उन्हें एक सक्षम और साहसी शासक के रूप में लिए याद किया जाता है.

इसके अलावा उन्हें उनकी उदारता और दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान के लिए भी जाना जाता है. कहते हैं कि वह सभी धर्मों को एक समान मानते थे. सभी के हितों की रक्षा के लिए वह हमेशा प्रयासरत रहे.

यहां तक उन्होंने अलग-अलग धर्मों की महिलाओं से शादियां तक की. उनकी पत्नियों में मेहताब कौर, रानी राज कौर, रानी रतन कौर, रानी चंद कौर, और रानी राज बंसो देवी का नाम आता है. जाहिर है उनके अन्दर एक सक्षम प्रशासक के तमाम गुण हमेशा से मौजूद रहे!

इस महान योद्धा के बारे में तमाम कहानियां प्रचलित हैं. अगर आप के ध्यान में इनकी कोई कथा है तो कमेन्ट-बॉक्स में अवश्य शेयर कीजिये.

Web Title: Bravery Story of Maharaja Ranjit Singh, Hindi Article

Feature Image Credit:Pen