वैश्विक पटल पर चीन एक उभरती हुई बड़ी ताकत है. इस बात में दो राय नहीं है कि चीन अपनी इस क्षमता को पहचान कर और तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश में लगा हुआ है. बात चाहे अर्थव्यवस्था की हो, सैन्य ताकत की हो अथवा अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में दखल की हो, चीन कहीं कोर कसर नहीं रखना चाहता है.

उसके शांतिपूर्ण उभार से संभवतः किसी को दिक्कत भी नहीं है, पर मुश्किल यह है कि उसके तमाम क्रिया-कलाप वैश्विक राजनीति के विशेषज्ञों को यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि ‘क्या वाकई चीन का उभार शांतिपूर्ण ही है?’

अगर हाँ, तो फिर भारत, जापान, भूटान, फिलीपींस और उसके दूसरे पड़ोसियों से उसके विवाद गहरा क्यों जाते हैं? ध्यान रहे कि विवाद होना एक बात है, किन्तु उस विवाद का गहराते हुए ‘सैन्य दबाव’ की स्थिति तक पहुंचना बिल्कुल अलग बात!

‘डोकलाम सीमाई क्षेत्र’ में चीन द्वारा यथास्थिति में बदलाव की मंशा से की गयी हरकत के कारण ही एशिया की दो महाशक्तियां पिछले कई हफ़्तों से आमने सामने थीं. इस मामले में चीनी पक्ष की ज़िद्द कुछ ऐसी थी कि रोज़ युद्ध की धमकियां देना जारी था. हालाँकि, अब यह मामला सुलझ गया है, पर सवाल तो वही है कि विवाद की स्थिति में ‘यथास्थिति’ का सम्मान आखिर चीन क्यों नहीं करता है?

यूं भी चीन को विस्तारवादी देश माना जाता है, जिसे दक्षिणी चीन सागर जैसे विवादित मसलों पर न तो अंतर्राष्ट्रीय अदालत की परवाह होती है और न ही अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की. द्विपक्षीय संबंधों की तो बात ही कौन करे भला!

ऐसा भी नहीं है कि सभी 100% पड़ोसी देशों से चीन के सम्बन्ध खराब ही हैं, बल्कि पाकिस्तान और नार्थ कोरिया जैसे देशों से उसके सम्बन्ध ठीक ठाक भी हैं, किन्तु इन संबंधों की हकीकत भी पूरी दुनिया को पता है. इस बात में दो राय नहीं है कि नार्थ कोरिया और पाकिस्तान जैसे देशों से चीन का सम्बन्ध दूसरे देशों पर दबाव बनाने या फिर थोड़ा और खुलकर कहें तो ‘ब्लैकमेल’ करने का ही है.
ऐसे में चीन के तमाम पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंधों पर एक विश्लेषणात्मक नज़र डालना दिलचस्प होगा.

इस कड़ी में आज हम पहला आंकलन चीन के पुराने प्रतिद्वंदी जापान के साथ करते हैं. इतिहास से लेकर वर्तमान तक…

चीन जापान सम्बन्ध की पृष्ठभूमि

दोनों देश टेक्नोलॉजी में एक दूसरे को मात देते हैं तो उनके बीच आपसी प्रतिद्वंदिता भी पुरानी ही है. जिस तरह भारत के साथ चीन कई बार युद्ध के मुहाने तक पहुँच जाता है, कुछ कुछ वैसी ही हालत जापान के साथ भी है.

दोनों देशों के नागरिकों के बीच भी काफी कटुता है. यहाँ तक कि कुछ साल पहले जब पान विरोधी प्रदर्शनों, जिसमें चीनी लोग हाथ में बैनर उठाए चल रहे थे और उस पर लिखा था कि ‘जापानियों को मार दो’. फिर जापान की इलेक्ट्रॉनिक कंपनी पैनासोनिक (Link in English) में आगजनी हुई, जिसके कारण इस कंपनी को अपनी यूनिट तक बंद करनी पड़ी. यह हालत तब है, जब 1978 में चीन के नेता डेंग जियाओपिंग ने खुद इस कंपनी के संस्थापक कोनोसुके मात्सुशिता से मुलाकात की थी और उन्हें चीन की अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने में मदद के लिए अनुरोध किया था. फिर कई अरब डॉलर सरकारी सहायता टोक्यो से बीजिंग गई. एक समय पर चीन जापान का सबसे अहम व्यापारिक साझीदार बन गया. हर साल कई जापानी उद्योगपति चीन जाते और वहां के अधिकारियों और नेताओं से बात करते. समझना दिलचस्प होगा कि दोनों देशों में भले ही व्यापारिक संबंध शानदार रहे हों लेकिन राजनीतिक संबंधों में खाई जस की तस बनी रही. हालाँकि, इतना ज़रूर हुआ कि 1978 में शांति और दोस्ती समझौते (Link in English) के बाद दोनों देशों के बीच द्वीपों पर विवाद किनारे हो गया था. बाद में जैसे जैसे चीन मजबूत होता गया, उसके तेवर बदलते चले गए.

यूं चीन और जापान के सम्बन्ध बहुत पहले से खराब नहीं रहे हैं, बल्कि 1852 से 1912 के बीच मेइजी राजा के साम्राज्य में जापान ने 1895 में कोरिया पर युद्ध में चीन को हरा दिया था. फिर जापान ने मंचूरिया सहित आधे एशिया पर जीत हासिल की. हालाँकि, दूसरे विश्व युद्ध में हारने के बाद जापान अचानक साम्राज्यवाद से शांतिवाद की ओर बढ़ा. सेना का रूप बदल कर उसे आत्मरक्षा बल में परिवर्तित किया गया. संविधान ने हर तरह के सैन्य आक्रमण पर प्रतिबंध लगा दिया.

इस क्रम में जापान ने अपनी भूलें सुधारने की कोशिश के तहत नस्लवाद को रोका, तो जापान की स्कूली किताबों में नानकिंग संहार को दुर्घटना बताया गया. जाहिर है इसे छोड़ कर आगे बढ़ने के प्रति जापान कृत संकल्प दिखा, किन्तु चीन ने इस बात से सबक नहीं लिया और उसने तमाम वह नीतियां अपनायीं, जिससे उसके ऊपर साम्राज्यवाद का गहरा आरोप लगा.

दोनों देश दो बड़े युद्ध लड़ चुके हैं, जिसे समझे बिना इनके संबंधों को शायद हम न समझ सकें.

पहला चीन-जापान युद्ध

सन 1894 – 95 (Link in English) के दौरान मध्य कोरिया पर प्रशासनिक व सैन्य नियंत्रण को लेकर लड़े गए इस युद्ध में जापान की मेइजी सेना विजयी हुई थी. इससे पहले चीन के मंचू सम्राटों ने 17वीं शताब्दी में कोरिया पर अधिकार कर लिया था और तभी से कोरिया चीन का अधीन प्रदेश माना जाता था. दिलचस्प बात यह है कि तत्कालीन समय में कोरिया का अपना पृथक राजा होता था, किन्तु कोरिया का स्वतंत्र राजा चीन के सम्राट को अपना महाराजा अवश्य स्वीकार करता था.

इस युद्ध की शुरुआत कुछ यूं हुई जब 1875 ई. में जापान का एक जहाज कोरिया के समुद्र तट पर पहुँचा. पहले तकरार फिर 1876 ई. में हुई संधि ने कोरिया में जापान के लिए व्यापार के द्वार खोल दिए और जापान को कई व्यापारिक विशेषाधिकार प्राप्त हुए. जाहिर तौर पर यह चीनी सम्प्रभुता को चुनौती थी और यहीं से चीन-जापान का मनमुटाव शुरू हुआ.

First War between China and Japan (Representative Pic: pinterest)

बीच में और भी कई मनमुटाव सामने आये, किन्तु असल युद्ध उस घटना से भड़का, जब अगस्त 1894 ई. में एक चीनी जहाज जो चीनी सैनिकों सहित कोरिया की ओर जा रहा था, उसे जापान ने आत्मसमर्पण न करने पर समुद्र में डुबो दिया. तत्पश्चात चीन ने 1 अगस्त, 1894 को जापान के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और इस प्रकार प्रथम चीन-जापान युद्ध आरंभ हो गया.

चूंकि, जापान की सैनिक तैयारियाँ बेहतर थीं, तो स्वाभाविक रूप से वह विजयी हुई. तत्कालीन समय में चीन की सेना बेकार थी. युद्ध शुरू होने के दो महीने के भीतर ही, यानी सितम्बर के अंत तक ही चीनी सेना को कोरिया से भागना पड़ा और यालू नदी की मुठभेड़ में चीनी बेड़े की भीषण पराजय हुई.
युद्ध के परिणामस्वरूप चीन ने जापान को फारमोसा, पेस्काडोर्स और लियाओतुंग प्रायद्वीप दे दिए, तो चीन द्वारा जापान को 200,000,000 तैल (चीनी सिक्का) भी हर्जाना देना स्वीकार किया गया.

यह दो देशों के बीच पहली बड़ी दरार थी, जो आगे चलकर और चौड़ी हुई.

चीन जापान के बीच दूसरा युद्ध

यह लड़ाई दूसरे विश्व युद्ध के समय की है, जिसमें अंततः जापान को हार का सामना करना पड़ा. लगभग 1937 से 1941 (Link in English) तक चीन इसमें अकेला ही था और तब तक जापान हावी भी रहा. किन्तु ज्योंही 1941 में जापान द्वारा पर्ल हार्बर पर आक्रमण किया गया, स्थितियां तेजी से बदलीं.

गौरतलब है कि जून 1931 में दक्षिणी मंचूरिया में एक जापानी सैनिक अधिकारी की हत्या कर दी गयी थी. आशंका के अनुसार यह चीनी लोगों का काम था. बात बढ़ते बढ़ते यहाँ तक पहुंची कि 3 जनवरी, 1932 तक संपूर्ण मंचूरिया पर जापान का अधिकार हो गया. युद्ध बढ़ने की स्थिति में 1934 ई. को जापान ने घोषणा कर दी कि अगर कोई देश चीन को युद्ध का सामान, हवाई जहाज आदि देगा तो जापान इसे शत्रुतापूर्ण एक्शन मानेगा. इन्हीं के फलस्वरूप 1937 में चीन-जापान युद्ध औपचारिक रूप से आंरभ हो गया.

युद्ध आरंभ होते ही 27 जुलाई को जापानी सेनाओं ने पेकिंग पर अधिकार कर लिया. फिर चहर और सुईयुनान पर भी जापान का अधिकार हो गया. यहाँ तक कि जापानी सेनाओं ने शंघाई तथा नानकिंग पर कब्जा कर लिया. जापान का विजय क्रम जारी रहा और उसने 1938 ई. में हैंको और कैण्टन पर भी अधिकार कर लिया.

इस बीच एक महत्वपूर्ण घटना हुई कि 1937 ई. में जब चीन-जापान युद्ध आरंभ हुआ, तो चीन ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद गठित राष्ट्रसंघ से अपील की. राष्ट्रसंघ ने इस पर विचार के लिए समिति की नियुक्ति भी की, पर जापान के विरूद्ध राष्ट्रसंघ या इंग्लैण्ड, फ्रांस, अमेरिका ने कोई कार्यवाही नहीं की.

जाहिर था कि राष्ट्रसंघ की असफलता के कारण विश्व के प्रमुख देश दो गुटों में विभाजित हो गये. बाद का इतिहास हमें ज्ञात है ही कि किस तरह धुरी राष्ट्रों की सेनाएं पराजित हुईं और जापान पर परमाणु बम गिराया गया.

साफ़ है कि चीन और जापान के बीच शत्रुता पुरानी है, जिसे आधुनिक समय में भी विवादों की ओर खींचने से परहेज नहीं किया जा रहा है.

वर्तमान में संबंधों की दिशा

जापान में सेनकाकु (Link in English) और चीन में दियाआयू आइलैंड के नाम से प्रचलित पूर्वी चीन समुद्र में अधिकार के लिए चीन और जापान ने अपना- अपना दावा जताया है. पिछले सालों में जापान द्वारा संसद के निचले सदन की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में बदलाव को मंजूरी देने के बाद व्यापक बदलाव दर्ज किया गया. बताया गया कि इस बदलाव से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहला अवसर होगा, जब जापानी सैनिकों को खाड़ी देशों में लड़ाई की अनुमति होगी. इसके अलावा चीन द्वारा पूर्वी चीन समुद्र में दो साल पहले शुरू किए गए समुद्री प्लेटफार्म के निर्माण पर भी विवाद है.

यह बात ज्ञात ही है कि चीन ने समूचे दक्षिणी चीन समुद्र पर दावा किया है, जबकि फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम, ताइवान और ब्रुनेई ने भी इस इलाके पर अपना दावा किया हुआ है.
साफ़ है कि दोनों देशों के बीच विवादों का चोली-दामन जैसा साथ बरकरार है.

China Japan Relations Analysis, Hindi Article (Pic: youtube)

हालाँकि, दोनों देशों के बीच बेहतरीन आर्थिक सम्बन्ध (Link in English) हैं और इसी वजह से सैन्य टकराव की आशंका धूमिल पड़ जाती है. दिलचस्प बात यह भी है कि भारत से आर्थिक संबंधों को लेकर भी दोनों देशों के बीच खासी प्रतिद्वंदिता दिखती है. जापान से जहाँ भारत की रणनीतिक करीबी है, वहीं चीन बुलेट ट्रेन जैसे प्रोजेक्ट कम कॉस्टिंग पर लाने के कारण आश्वस्त रहता है.

ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि चीन और जापान दोनों देश तमाम प्रतिद्वंदिता के बावजूद अपने मजबूत आर्थिक संबंधों के कारण किसी युद्ध जैसी स्थिति से बचते रहे हैं.

हालाँकि, चीन की विस्तारवादी नीतियों से तमाम दूसरे देशों की तरह जापान भी परेशान है, इस बात में दो राय नहीं. खासकर दक्षिणी चीन सागर में जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को चीन धत्ता बता रहा है, उससे उसकी दूरगामी मंशा पर भारी संदेह होता ही है.

लेख की शुरुआत में ही बताया गया है कि चीन एक वैश्विक शक्ति के तौर पर उभर रहा है, इसलिए उसके साथ बाकि देशों के संबंधों का आंकलन किया जाना चाहिए.

इसी कड़ी में हमने इस लेख में चीन-जापान के संबंधों का आंकलन करने की कोशिश की, तो इसकी अगली कड़ी में हम चीन के साथ उसके किसी दूसरे पड़ोसी देश से संबंधों पर कलम चलाएंगे.
कमेंट बॉक्स में अपनी राय देना नहीं भूलियेगा.

Web Title: China Japan Relations Analysis, Hindi Article

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