यूं तो मैसूर के सुल्तान टीपू सुल्तान की जांबाजी की कहानियां ज्यादातर लोगों को पता हैं. सभी उनकी वीरता के बारे में जानते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि देश के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले इस जांबाज योद्धा की मौत कैसे हुई?

आखिर ऐसा क्या हुआ था कि जीतते-जीतते, टीपू को अंतिम मौके पर पहले हार और बाद में मौत का सामना करना पड़ा था?

अगर नहीं, तो आईये टीपू सुल्तान के जीवन से जुड़े ऐसे कुछ सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं:

बचपन से ही थी ‘बगावत की आग’

मैसूर के सुल्तान हैदर अली के घर 20 नवम्बर, 1750 (Link in English) को एक बच्चे ने जन्म लिया. नाम रखा गया फतेह अली टीपू. प्यार से उन्हें सब टीपू कहकर बुलाते थे. पिता हैदर अली मैसूर के सुल्तान थे. वह अपने राज्य को तेजी से आगे बढ़ाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने अपनी ताकत को बढ़ाना शुरु कर दिया था. यह वही दौर था, जब अंग्रेज भारत में तेजी से अपने पांव पसार रहे थे. उनकी ताकत के सामने कई राज्यों के शासकों ने घुटने टेक दिए थे. उन्होंने अपने निज स्वार्थों के चलते उनसे संधि कर ली थी.

इसी कड़ी में अंग्रेज मैसूर पर भी अपना कब्जा चाहते थे, लेकिन टीपू के पिता हैदर अली को यह किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था. इस कारण वह अंग्रेजों को खटकने लगे थे. वह उनके बड़े दुश्मन बन चुके थे. टीपू अंग्रेजों के इस रवैये को देखते आ रहे थे. उनकी नन्हीं आंखों में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत पलने लगी थी. जैसे-जैसे वह बड़े हुए, उन्होंने युद्ध कौशल का अभ्यास शुरु कर दिया. उनकी तेजी के सब कायल थे. छोटी उम्र के बावजूद वह एक कुशल योद्धा की तरह अपना दांव मारते थे.

Death Story of Tipu Sultan (Pic: medium.com)

15 की उम्र में अंग्रेज़ों को हराया

वह 15 वर्ष के थे, जब उन्होंने अपने पिता के साथ 1766 (Link in English) के आसपास मैसूर के पहले युद्ध में अंग्रेजों से दो-दो हाथ किए थे. वह पूरी ताकत के साथ अंग्रेजों पर टूटे थे. शुरुआत में लग रहा था कि टीपू अंग्रेजों के सामने कहीं नहीं टिक पायेंगे, लेकिन देखते ही देखते उन्होंने अंग्रेजों को चारों खाने चित्त कर दिया था. टीपू सिर्फ बहादुर नहीं थे. वह एक तेजतर्रार रणनीतिकार भी थे. यही वजह थी कि उनके जीते-जी ईस्ट इंडिया कंपनी उनको झुका नहीं पाई. वह हर मौके पर अंग्रेजों से जमकर लोहा लेते रहे.

1780 में हुए मैसूर के दूसरे युद्ध ‘बैटल ऑफ़ पल्लिलुर‘ में अंग्रेजों को शिकस्त देने में उन्होंने अपने पिता हैदर अली की काफी मदद की थी. उनके ही सहयोग के कारण अंग्रेजी फ़ौज को मुंह की खानी पड़ी थी. इस युद्ध में हैदर अली की पराक्रमी सेना की जीत हुई थी. यही नहीं उन्होंने उन शासकों को भी मुंहतोड़ जवाब दिया, जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों की वजह से अंग्रेजों से संधि कर रखी थी.

मेंगलूर की संधि भी न आई काम…

माना जाता है कि जिन भारतीय शासकों को टीपू सुल्तान ने धूल चटाई थी. वह अपनी हार से पागल हो गये थे. बाद में यही शासक अंग्रेजों के साथ जा मिले थे. उनकी ही गद्दारी का फायदा उठाकर अंग्रेजों ने टीपू को हराने का फुल प्रूफ प्लान बना डाला था. हालांकि, टीपू को सीधी लड़ाई में हराना इतना आसान नहीं था. तीसरी लड़ाई में उन्होंने अंग्रेजों को एक बार फिर से हराकर इस बात को प्रमाणित कर दिया था. ऐसे स्थिति में अंग्रेजों को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें?

वैसे अंग्रेजों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था, इसलिए छिपे मन से वह संधि चाहते थे. आखिरकार उन्होंने कूटनीतिक तरीके से टीपू को हराने की योजना बना डाली.

पहले उन्होंने टीपू के सामने घुटने टेक दिए, फिर 1784 के आसपास एक संधि कर ली. इस संधि को मेंगलूर संधि का नाम दिया गया. इस संधि के बाद टीपू मैसूर के अच्छे भविष्य के लिए आश्वस्त हुए ही थे कि, अंग्रेजों ने अपनी नियत दिखा दी.

उन्होंने टीपू को धोखा देते हुए एक बार फिर से उन पर हमला कर दिया था. पिछले तीन युद्धों में बुरी हार के बाद यह टीपू पर अंग्रेजों द्वारा किया गया चौथा हमला था.

Siege of Seringapatam (Pic: wikipedia)

आत्मसमर्पण की जगह ‘शहादत’ को चुना

इस बार अंग्रेजों ने मैसूर की राजधानी श्रीरंगपट्टण पर चढ़ाई की थी. टीपू की सेना भी पीछे कहां रहने वाली थी. उसने दुश्मन का डटकर मुकाबला किया. अंग्रेज उनके सामने कहीं टिक नहीं रहे थे. उनको लगने लगा कि वह यह लड़ाई भी हार जायेंगे, इसलिए उन्होंने हमेशा की तरह धोखे का रास्ता चुना. योजना के तहत उन्होंने कई भारतीय शासकों (Link in English) को अपनी तरफ से लड़ने कि लए बाध्य कर दिया था. उनकी सहायता से अंग्रेजों के पास एक बड़ी सेना हो गई थी.

हालांकि, टीपू पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था. वह तेजी से आगे बढ़ रहे थे. वह झुकने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए अंग्रेजों ने रात के अंधेरे का प्रयोग करके कुछ गद्दारों की मदद से अपने कुछ सैनिक टीपू की तरफ भेज दिये. अंत में टीपू चारों तरफ से घेर लिए गये थे. उनके पास भागने का मौका था. ऐसी आपात स्थिति के लिए उन्होंने एक आपातकालीन मार्ग बना रखा था, लेकिन वह मैदान छोड़कर नहीं भागे.

वह एक वीर योद्धा थे. उन्होंने अपने सैनिकों में ऊर्जा भरते हुए कहा कि 100 गीदड़ों की तरह भागने से अच्छा कि हम एक शेर की तरह पेश आयें. वह अपनी आखिरी सांस तक लड़ते रहे. अंग्रेज बार-बार उनसे सरेंडर करने की अपील करते रहे, लेकिन वह आगे ही बढ़ते रहे.

वह अंग्रेजों को लगातार मारते रहे!

पर कुछ भारतीय लोगों की गद्दारी के कारण अंततः टीपू यह जंग हार गये. 1799 को टूरिंग खानाली युद्ध का यह युद्ध टीपू का आखिरी युद्ध साबित हुआ. वह इस युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुए.

Death Story of Tipu Sultan (Pic: thoughtco.com)

आज भले ही टीपू को लेकर अलग-अलग धारणायें हों, किन्तु अपने अंतिम समय में जिस तरह से उन्होंने अंग्रेजों का मुकाबला किया, वह उनके अदम्य साहस को दर्शाता है. आत्मसमर्पण करने की बजाय युद्धभूमि पर शहादत को चुनने वाला यह वीर किसी हीरो से कम नहीं था. वह दुनिया को बता चुका था कि क्यों उसके पिता ने उसे ‘शेर-ए-मैसूर’ की उपाधि दी थी.

Web Title: Death Story of Tipu Sultan, Hindi Article

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