इतिहास में देखें तो भारत में कई अहम लड़ाइयां लड़ी गईं!

प्रत्येक लड़ाई ने नए हथियारों को जन्म दिया, वहीं समय के साथ कुछ पुराने हथियारों के स्वरूप में भी परिवर्तन आया. पहले जहां लड़ाई लाठी और डंडो के सहारे लड़ी जाती थीं, उसके बाद लकड़ी में लोहे का एक छोटा नुकीला टुकड़ा लगाकर इसे ‘भाले’ का नाम दिया गया.

वहीं मुगलों ने अपने समय के दौरान बेहतरीन और घातक हथियारों का निर्माण किया जिनके दम पर शाही सेना और राजा महाराजा मैदान में उतरते थे.

आज इसी कड़ी में हम आपको मुगल काल के समय प्रचलित ऐसे ही हथियारों के बारे में बताने जा रहे हैं–

समय के साथ बढ़ी तलवार की धार

एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं… यह कहावत काफी पुरानी है!

लेकिन जब बार-बार युद्ध लड़ने के कारण तलवार की धार कम हो जाए तो दो धारी तलवार की जरूरत होती ही है. ऐसे में मुगल काल के दौरान कई अहम तलवारें ईजाद की गईं.

मुगल काल में मर्दों का श्रृंगार तलवार हुआ करती थी, राजा से लेकर एक सिपाही तक उस एक तलवार के बिना अधूरे थे. हालांकि लड़ाई में तलवार का प्रचलन मुगल काल से भी पुराना है लेकिन इनके स्वरूप में परिवर्तन अवश्य ही इस काल में हुअा है.

मुगलकाल में तलवार को शमशीर कहा जाता था! आज भी कई पुराने लोग तलवार की जगह यही नाम लेते हैं. मुगलकाल में तलवारों को उसकी उपयोगिता के हिसाब से कई नाम दिये गये जिसमें से खांडा, पाता और गुप्ती अहम नाम हैं.

इस समय कई तलवार आकार में बेहद छोटी होती थीं तो कई घुमावदार न होकर समुराई तलवारों के जैसे एक दम सीधी होती थीं. मुगलकाल में मुगलों ने कई अहम तलवारें बनाकर इन्हें सैनिकों का सबसे सफल हथियार बना दिया था.

The sword of history has two edges. (Pic: wordpress)

हमला रोकने के लिए बनी ढाल

चमचमाती तलवारें एक ही झटके में किसी का भी सर चंद मिनटों में धड़ से अलग कर देती थीं. तलवार चलाने के दौरान सामने वाले के आक्रमण से खुद को बचाना भी जरूरी था जिहाजा शील्ड या ढाल का प्रयोग बढ़ा. शील्ड जो आपका बचाव करती है या ऐसी ढाल जिसकी मदद से खुद को बचाया जा सके.

ढाल भी कई प्रकार की थीं एक हाथ से उठाने योग्य, जिससे किसी एक सैनिक का बचाव तलवार से किया जा सके, वहीं दूसरी थोड़ी बड़ी, पूरी बटालियन को तीर का निशाना बनने से रोक सकने में सक्षम.

अगर आपको टीवी पर महाभारत और पुरानी फिल्में देखने का शौक है तो आपने अवश्य ही ऐसी ढाल देखी होगी.

जब कोई राजा हाथी या घोड़े पर चलता था तो उसके चारों तरफ काफी संख्या में सैनिक तलवारें और ढाल लेकर चलते थे ताकि अचानक आक्रमण होने पर राजा को बीच में लेकर उसे घायल होने से बचाया जा सके. वहीं तीरों की बौछार और नुकीले भालों से खुद को बचाने के लिए भी यह शील्ड काम में आती थीं.

वैसे आजकल इन ढाल का दूसरा स्वरूप भी मौजूद है, जो दंगा रोकने के काम में पत्थरों से बचाव के दौरान इस्तेमाल किया जाता है.

Human Shield protection. (Pic: alphacoders)

छोटा सा ‘खंजर’ भी था घातक

रामपुरी चाकू का नाम तो आपने सुना ही होगा असल में ये रामपुरी अपने छोटे आकार और तेज़ धार के लिए काफी मशहूर है.

जैसा कि तलवार बिना कोई योद्धा अधूरा है, ठीक उसी प्रकार कटार या चाकू भी युद्ध में काम आने वाला महत्वपूर्ण शस्त्र था. चूंकि इसका आकार बहुत बड़ा नहीं था और इसे कहीं भी आसानी से रखा या छुपाया जा सकता था, इसलिए ये महिलाओं के लिए भी महत्वपूर्ण हथियार बन गया.

आकार में बड़ा और भारी होने के कारण कई बार तलवारों को अपने साथ रखना आसान नहीं था. ऐसे में उनके काम आती थी छोटी सी कटार.

मुगलकाल में कटारा और कटारी चाकूओं का काफी इस्तेमाल किया जाता था. वहीं इस दौर में एक विशेष प्रकार के चाकू को खंजर के नाम से भी जाना जाता था. पेशकाज और बिचुवा चाकू भी काफी मशहूर थे. इन चाकूओं की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि यह दिखने में बहुत सुंदर होते थे और बहुत तेजधार के होते थे. उस दौर में राजा महाराजा भी तोहफे के रुप में एक दूसरे को सुंदर चाकू भेंट किया करते थे.

Omani Khanjar Dagger. (Pic: rockwellantiquesdallas)

युद्ध में बढ़ा तीर-धनुष का इस्तेमाल

तलवारों का इस्तेमाल करते हुए आक्रमण करना आसान था.

वहीं चाकू भी कई मौकों पर युद्ध में अहम भूमिका निभाते थे, लेकिन बाद में समय के साथ युद्ध लड़ने के तरीकों में परिवर्तन आने लगा.

अब युद्ध में तीर की बौछार ज़्यादा होने लगी थी. हालांकि तीर-धनुष का युद्ध में इस्तेमाल सालों से होता आ रहा था लेकिन दूर छिपे बैठे दुश्मन को मार गिराने के मामले में इनकी उपयोगिता कभी कम नहीं हुई. इनसे काफी दूर से ही दुश्मनों पर निशाना साधा जा सकता था जबकि तलवार के इस्तेमाल से ऐसा करना मुश्किल था.

Ancient Wooden Arrows. (Pic: webnode)

फिर जंग में इस्तेमाल हुए तोप और रॉकेट!

समय बदला और युद्ध में तोपों का इस्तेमाल शुरू हुआ.

सन 1526 ई. में पहली बार भारत में मुगल शासक बाबर द्वारा इब्राहीम लोदी के खिलाफ लड़ाई में तोप का इस्तेमाल किया गया. वहीं 1528 ई. में बाबर द्वारा इस्तेमाल तोप ने खांडवा के युद्ध में राणा सांगा के खिलाफ मुगल सल्तनत की नींव रखने में अहम भूमिका अदा की.

वहीं कुछ इतिहासकारों के अनुसार तोप का आविष्कार तुर्कों द्वारा किया गया था लेकिन भारत में इसका पहली बार इस्तेमाल दिल्ली सल्तनत के दौरान किया गया.

फिर 18वीं सदी में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने युद्ध में दुश्मनों से लड़ने के लिए भारत को रॉकेट का तोहफा दिया. मैसूर की लड़ाई के दौरान टीपू सुल्तान ने बांस की जगह लोहे का प्रयोग कर पहला रॉकेट डिजाइन बनाया था.

तोप के रूप में इस्तेमाल होने वाला यह रॉकेट युद्ध के मैदान में 2 किलोमीटर तक मार कर सकता था. इसका इस्तेमाल उन्होंने मैसूर की लड़ाई में बखूबी किया जब 1799 में अंग्रेज़ों ने मैसूर के किले पर रातोंरात चढ़ाई शुरू कर दी.

टीपू सुल्तान की फौज को इसकी भनक लगी तो उन्होंने रॉकेट दागने शुरू कर दिए जिससे अंग्रेज़ों की फौज खौफ में आ गई. ब्रिटिश इस बात से बेखबर थे कि टीपू सुल्तान के पास इतने विकसित हथियार होंगे.

आखिरकार तोप से निकले गोलों की आवाज़ सुनकर अंग्रेज़ वहां से भाग खड़े हुए.

Malik-e-Maidan Tope (Canon), Bijapur. (Pic: wikimedia)

और तमंचों ने मचाई तबाही!

पत्थर, फिर लकड़ी और उसके बाद धातुओं के हथियारों का इतिहास बहुत पुराना है लेकिन इन सभी के बाद कारतूस और बारुद के इस्तेमाल का दौर शुरू हुआ.

चीन पर हमला करने के बाद मंगोलों ने सन 1221 में भारत पर आक्रमण किया, कहा जाता है कि इस समय तक ये लोग बारूद का इस्तेमाल किया करते थे. माना जाता है कि इसी के बाद से भारत में बारूद का इस्तेमाल बढ़ा.

वहीं भारत में सबसे पहले बारूद के इस्तेमाल के सबूत 15वीं शताब्दी के मध्य दक्षिण मध्य भारत के दक्कन साम्राज्य में मिलते हैं. माना जाता है कि सन 1472 के आसपास विजयानगर और बहमनी साम्राज्य द्वारा इसका इस्तेमाल किया गया.

अब जब बारूद का इस्तेमाल शुरू हो चुका था तब छोटे हथियार भी इजाद किए गए. इस कड़ी में तमंचे का नाम भी जुड़ गया. कहा जाता है कि तमंचे का प्रयोग 18वीं सदी में किया गया. समय गुज़रने के साथ ही इसका नाम तमंचे से पिस्तौल हुआ और अब लोग इसे पिस्टल के नाम से जानते हैं.

पुराने तमंचे आकार में काफी लंबे होते थे और कई बार इन्हें तांबा धातू से भी बनाया जाता था. पुराने समय में तमंचे में ऐसे ही खुला बारूद भरा जाता था लेकिन बाद में गोलियों का आविष्कार किया गया.

Double Barreled Flintlock Pistol. (Pic: militaryheritage)

तो यह थे मध्य काल के मशहूर हथियार जो युद्ध के मैदान में प्रयोग किए जाते थे. इतना समय गुज़रने के बाद आज भी इन हथियारों की धमक है. हालांकि इनका रंग रूप और कुछ स्वरूप बदल गया है.

अगर आप भी ऐसे ही किसी विशेष ऐतिहासिक हथियार के बारे में जानते हैं तो कृपया हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.

Web Title: Famous and Deadly Arms & Armour of Mughal Period, Hindi Article

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