सआदत हसन मंटो!

यह महज हाड़ मांस से बना कोई शख्स नहीं, बल्कि हमारा जमीर है! जिसे यदि वक्त पर टटोला जाता, तो समाज की सूरत कुछ और हो सकती थी.

मंटो हमें इतिहास बताते हैं, वो इतिहास जो हमें शायद पसंद न आए, पर आख़िर वह है तो हमारा ही हिस्सा है.

दुनियावी दिखावे का लबादा उतार कर मंटो ने जो लिखा, वो समाज का नंगा सच था. सीधा, सपाट, तीखा सच. वो जैसा था वह सबके सामने रहा.

मशहूर साहित्यकार फ्रेंज काफ्का का कथन था, "किसी किताब को हम अगर पढ़ें और वह खोपड़ी पर पड़े हथौड़े की तरह हमें जगा न दे तो हमें उसे क्यों पढ़ना चाहिए? किताब तो बर्फ तोड़ने के हथौड़े की तरह होनी चाहिए, जो हमारे भीतर जम गए दरिया को तोड़ सके."

यह कथन दो शब्द वाले 'मंटो' की हजारों-लाखों शब्दों की दुनिया की सबसे सटीक व्याख्या हो सकती है.

मंटो की कहानियों में घाटन की 'बू' में खोया हुआ रणधीर भी था और एक लाश से दुराचार करने वाला ईश्वर सिंह भी.

बंटवारे के बाद उनकी कहानियों में तक़लीफ के थक्के साफ़ दिखाई दिए.

कुछ लोगों का मानना है कि मंटो अपने समय से आगे के लेखक थे, पर दरअसल वे अपने समय के वो कहानीकार थे, जिसे अपने ही दौर में किसी ने समझने की कोशिश नहीं की.

Sadat Hassan Manto. (Pic: Jocuri-fotbal)

मंटो की कहानी के पात्र केवल रूमानी और जिस्मानी नहीं थे. उनकी लेखनी में क्रांति के सुर साफ सुनाई देते थे.

मंटो ने लिखा है, "हज़ार हिंदुओं को मारकर मुसलमान समझते हैं कि हिंदू धर्म ख़त्म हो गया, लेकिन ये अभी भी ज़िंदा है और आगे भी रहेगा. उसी तरह हज़ार मुसलमानों को मारकर हिंदू इस बात का जश्न मनाते हैं कि इस्लाम ख़त्म हो चुका. लेकिन सच्चाई आपके सामने है. सिर्फ मूर्ख ही ये सोच सकते हैं कि मजहब को बंदूक से मार गिराया जा सकता है."

मंटो ने 'नंगी आवाज़ें', 'काली सलवार', 'शिकारी औरतें', 'सरकंडों के पीछे', 'दो क़ौमें', 'लायसेंस' जैसी कहानियां लिखकर औरत-मर्द के रिश्तों को अलग पृष्ठभूमि में लाकर रख दिया था.

इन मुट्ठी भर शब्दों में मंटो को समेट पाना मुमकिन नहीं है. पर उन्हें समझने की शुरूआत करने के लिए पहले पायदान पर जो 5 कहानियां मिलती हैं, उन्हें आप तक पहुंचा रहे हैं.

'टोबा टेक सिंह'

जिन विवादित कहानियों की हम बात कर रहे हैं, उनमें सबसे पहले प्रसिद्ध लघु कथा 'टोबा टेक सिंह' का जिक्र करना जरूरी है. यह कहानी एक पागलखाने में रहने वाले क थानक की है.

यह 'उस बंटवारे' पर लिखा गया सबसे बेहतरीन तंज है.

बंटवारे के दौरान जिस तरह आम इंसानों की अदला बदली हुई थी, ठीक उसी तरह पागलखाने में बंद हिन्दू-सिख और मुस्लिम पागलों की अदला-बदली का समझौता हुआ.

यह कहानी लाहौर के पागलखाने में बंद बिशन सिंह की है, जो टोबा टेक सिंह का निवासी है.

चूंकि वह एक हिन्दू है, इसलिए उसे भारत भेज दिया जाता है. पर वहां आकर पता चलता है कि उसका गांव पाकिस्तान में चला गया है. वह लाहौर से जाने से इंकार कर देता है.

मार्मिक उतार चढ़ाव और बिशन सिंह के गांवों की यादों से सजी इस कहानी का अंत बेहद दुखद है.   

Manto and His Children. (Pic: thefridaytimes)

'बू'

मंटो की इस कहानी ने उन्हें अदालत की चौखट तक पहुंचा दिया था.

'बू' लिखने के बाद मंटो को लोगों के तानों का सामना करना पडा. उन पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा. हालांकि आज के दौर में इस कहानी को पढ़ने वाले युवाओं के लिए यह एक असाधारण वाक्ये से ज्यादा और कुछ नहीं है.

बहरहाल 'बू' एक आदिवासी लड़की और युवक रणधीर के बीच हुए मौन संवाद और यौन संबंध पर लिखा गया साहित्य है. इस कहानी में मंटो ने रणधीर के विचारों को बड़े करीने से सजाया था.

उसके मन में उमड़ने वाली भावनाओं को कुछ इस अंदाज में लिखा, जो औरों की नजर में अश्लीलता कहलाए.

अपनी कहानियों पर लगने वाले अश्लीलता के इल्ज़ाम पर जवाब में मंटो ने कहा कि अगर आपको मेरी कहानियां अश्लील या गंदी लगती हैं, तो जिस समाज में आप रह रहे हैं, वह अश्लील और गंदा है. मेरी कहानियां तो सच दर्शाती हैं.

'खोल दो'

हम बंटवारे के बाद की पैदाइश हैं, इसलिए उस दर्द को समझने की ताकत नहीं है, लेकिन यदि मंटो की कहानी 'खोल दो' को पढ़ा जाए, तो तय मानिए की रौंगटे खड़े हो जाएंगे.

मंटो ने यह कहानी महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखी थी.

उस दौर में महिलाओं के साथ जितने अत्याचार हुए, शायद उतने सदी में कभी नहीं हुए होंगे.

मंटो ने बंटवारे के कैंप में कई दिन गुजारे थे और इन्ही दिनों के बीच उन्होंने कहानी 'खोल दो' को जन्म दिया. इस कहानी का मुख्य किरदार था, बूढा सिराजुद्दीन.

जो बंटवारे के कैंप में बेहाल पड़ा है और उसे अपनी बेटी सकीना से मिलने की आस है. सकीना वो है जो दरिंदगी का शिकार होकर बेजान पड़ी है. यह कहानी एक बूढ़े बाप की अपनी बेटी से मिलने तक के सफर की है. वो बेटी जो उसे स्ट्रेचर पर लाश बनी मिली.

कहानी का आखिरी पैरा कुछ इस तरह से है,

कुछ देर वह ऐसे ही अस्पताल के बाहर गड़े हुए लकड़ी के खंबे के साथ लगकर खड़ा रहा. फिर आहिस्ता-आहिस्ता अंदर चला गया. कमरे में कोई नहीं था. एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी. सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता हुआ उसकी तरफ बढ़ा. कमरे में अचानक रोशनी हुई. सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना.

डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है? सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं…जी मैं…इसका बाप हूं.

डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो.

सकीना के मुर्दा जिस्म में जुंबिश हुई. बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी. बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है. डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में नहा गया.

Sadat Hassan Manto with Family. (Pic: LavishStarsInsight)

'ठंडा गोश्त'

मंटो को अदालत की चौखट से जेल तक पहुंचाने वाली कहानियों में सबसे बड़ा दोष 'ठंडा गोश्त' का है. इस कहानी को लिखने की सजा मंटो को तीन माह जेल में काटकर और 100 रुपए जुर्माना भर कर चुकानी पड़ी थी.

कहानी को कुछ यूं गुथा गया है कि यदि कोई दुराचारी पढ़ें तो उसे खुद के किए कृत्य पर शर्म आए जाए.

यह कहानी है डाकू ईश्वर सिंह की. जो एक वेश्या से संबंध रखता है, पर जब वह डकैती के लिए जाता है तो वहां से एक नाबालिग लड़की को उठा लाता है और खेत में उसके साथ दुराचार करता है.

दुराचार करने के बाद भी ईश्वर सिंह को संतुष्टि नहीं मिलती. उसके जहन में एक ही बात आती है कि एक वेश्या, जिस पर वह पैसे खर्च करता है वह उसकी हर पूर्ति करती है और एक उससे भी खूबसूरत लड़की उसे 'ठंडा गोश्त' महसूस हुई.

अपने वाक्ये का जिक्र करते हुए ईश्वर सिंह कहता है,

कुलवन्ती जानी, मैं तुमसे क्या कहूं, कितनी सुन्दर थी. मैं उसे भी मार डालता, पर मैंने कहा, ''नहीं ईशरसियाँ, कुलवन्त कौर ते हर रोज मजे लेता है, यह मेवा भी चखकर देख!''

और मैं उसे कन्धे पर डालकर चल दिया...रास्ते में...क़्या कह रहा था मैं...हाँ, रास्ते में...नहर की पटरी के पास, थूहड़ की झाड़ियों तले मैंने उसे लिटा दिया. पहले सोचा कि फेंटूँ, फिर खयाल आया कि नहीं...''

यह कहते-कहते ईश्वर सिंह की जबान सूख गई.

Manto was a daring writer. (Pic: Visco Almohada)

'काली सलवार'

विभाजन की रेखा पर लिखी गई मंटो की एक और कहानी. जिसे लिखकर उन्होंने जेल जाना मंजूर किया, पर कभी भी उसका अपमान नहीं होने दिया.

'काली सलवार' पर साल 2002 में एक हिंदी फिल्म भी बनी थी, जिसमें इरफान खान, सादिया सिद्दीकी और सुरेखा सीकरी ने अभिनय किया था.

यह कहानी सुल्ताना नाम की वेश्या के इई-गिर्द घूमती है.

इस कहानी में मंटो बताना चाहते हैं कि समाज का यह तबका बस किसी की जिस्मानी जरूरतों को पूरा करने के लिए नहीं है, उनमें भी दिल है, जो इच्छाएं और सपने पालता है.

कहानी के एक अंश से,

सुल्ताना ने काग़ज़ खोला. साटन की काली शलवार थी, ऐसी ही जैसी कि वो अनवरी के पास देख कर आई थी. वह बहुत ख़ुश हूई. बुंदों और इस सौदे का जो अफसोस उसे हुआ था, इस शलवार ने और शंकर की वाअदा ईफ़ाई ने दूर कर दिया.

दोपहर को वो नीचे लांड्री वाले से अपनी रंगी हुई क़मीज़ और दुपट्टा लेकर आई. तीनों काले कपड़े उसने जब पहन लिए तो दरवाज़े पर दस्तक हूई.

सुलताना ने दरवाज़ा खोला तो अनवरी अंदर दाख़िल हुई. उसने सुल्ताना के तीनों कपड़ों की तरफ़ देखा और कहा. "क़मीज़ और दुपट्टा तो रंगा हुआ मालूम होता है, पर ये शलवार नई है ...... कब बनवाई?"

सुल्ताना ने जवाब दिया. "आज ही दर्ज़ी लाया है." ये कहते हुए उसकी नज़रें अनवरी के कानों पर पड़ीं. "ये बुन्दे तुम ने कहां से लिए?" अनवरी ने जवाब दिया. "आज ही मंगवाए हैं."

इसके बाद दोनों को थोड़ी देर तक ख़ामोश रहना पड़ा.

इन पांच कहानियों में मंटो को सहेजना संभव नहीं है.

मात्र 43 सालों की जिंदगी में उन्होंने 200 से अधिक कहानियां, एक उपन्यास, तीन निबंध संग्रह और अनेक नाटक, रेडियो और फिल्म पटकथा लिखीं.

अपनी 3 कहानियों के लिए मंटो को तीन-तीन माह की जेल हुई. सालों तक अदालतों में जिरह करनी पड़ी और फिर 100 रुपए के जुर्माने.

जिस मंटो पर आज दो मुल्कों में फ़िल्में बनाई जा रही हैं, उनका ख़्याल था कि वह कभी कामयाब नहीं होंगे.

दोनों मुल्कों के अपने-अपने मंटो हैं. दोनों तरफ़ से कोशिशें की जा रही हैं कि कोई मंटो को उनकी कहानियों के झरोखों से झांक कर देखे.

Nawazuddin Siddiqui as Manto in a biopic. (Pic: Scroll)

उस मंटो को जिसे अपने दौर में 'अश्लील लेखक' करार दिया गया था.

तीन बार ब्रिटिश राज के दौरान और तीन बार आज़ादी के बाद मंटो पर अश्लीलता फैलाने के आरोप लगे. उनकी कहानियों को गंदा बताया गया. पर उन्होंने कहा, मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है.

बहरहाल, गौर फरमाइए... मंटो आज भी अपनी कहानियों के रूप में जिंदा हैं.

Web Title: Five Disputed Stories of Sadat Hassan Manto, Hindi Artilce

Feature Image Credit: nspa