स्वयं को इतिहासकार बताने वाले पार्थ चटर्जी ने सेनाध्यक्ष मेजर जनरल बिपिन रावत की तुलना जनरल डायर से करते हुए कहा है, ‘1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के पीछे ब्रिटिश सेना के तर्क और कश्मीर में भारतीय सेना की कार्रवाई (मानव ढाल) का बचाव, दोनों में समानताएं हैं.’

भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है इसलिए वे कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जो कहा जा रहा है, वही अंतिम सत्य है. आश्चर्य है कि स्वयं को इतिहासकार घोषित करने वाले चटर्जी साहिब इतिहास का सम्यक ज्ञान तक नहीं रखते. जलियांवाला बाग और कश्मीर में पत्थरबाजी की तुलना वास्तव में चटर्जी साहिब के बुद्धिजीवी होने का नहीं बल्कि उनके बुद्धिहीन होने का प्रमाण है. जलियांवाला बाग में बैशाखी के दिन शांतिपूर्वक सभा कर रहे लोगों को अकारण चारों तरफ से घेरा गया, एकमात्र छोटा सा प्रवेशद्वार भी बंद कर गोलियां चलाई गई. वहां मासूम बच्चे भी थे. वे पत्थरबाजी नहीं कर रहे थे. किसी की जान नहीं लेना चाहते थे. लेकिन जनरल डायर ने उन्हें सबक सिखाने और अपनी हनक दिखाने के लिए निहत्थो पर गोलियां चलाई.

चटर्जी साहिब अगर पत्थरबाजों को निहत्था मानते हैं तो एक बार उनके पत्थरों की बौछार के सामने जाने का साहस क्यों नहीं करते? अनेक ऐसे वीडियो मौजूद हैं जो साबित करते हैं कि हमारे सैनिक अत्यंत धैर्य से काम ले रहे हैं. बकौल चटर्जी “फारूख डार बाईक से गुजर रहा था, इसलिए उसे निर्दोष घोषित करते हैं मानों वे इस घटना के चश्मदीद गवाह हों”. क्या उनकी नजर में कश्मीर का उस युवा सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट उमर फैयाज का क्या दोष था जिसे अपहरण करने के बाद आतंकवादियों ने गोलियों से भून दिया?

शायद इन तथाकथित बुद्धिजीवी को मालूम होगा कि दुनिया के हर देश मेें, हर सरकार प्रशासन, पुलिस को अपने ढ़ंग से इस्तेमाल करती है. (चटर्जी के पूर्वज वामपंथी इस मामले में किसी से कमतर नहीं हैं) बेशक सीधे सीधे सेना को इस्तेमाल करने को स्वीकार नहीं किया जाता लेकिन हर जगह सेना सरकार के निर्देश इशारे पर ही कार्यवाही करती है. सेना की किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होती. चटर्जी के देशद्रोही वक्तव्य को केवल दुर्भावनापूर्ण कहना सेना की भूमिका का अपमान है. दुखद है कि ऐसे प्रयासों के विरोध मे जैसी लहर उठनी चाहिए थी नहीं उठी क्योंकि हम दूसरों के कर्तव्य और अपने अधिकार पर तो खूब बहस करते हैं पर तो राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का अध्याय पढ़ना भी नहीं चाहते.

यह केवल भारत में ही संभव है कि राजनैतिक विरोध के लिए आप राष्ट्र की अस्मिता तक से खिलवाड़ कर सकते हैं. लाखों कश्मीरी पंडितों को उनके पूर्वजों की धरती से खंदेड़ने पर मौन रहने वाले मानवाधिकारवादी आतंकवादियों के मानवाधिकारों के लिए बहुत चिंतित रहते हैं. अगर उनसे पूछा जाये कि क्या सैनिक का कोई मानवाधिकार नहीं होता तो ये बुद्धिहीन बुद्धिजीवी ‘भगवाकरण’ के आरोपों की पत्थरबाजी के साथ तैयार मिलते हैं. वे दुनिया के उस देश का नाम क्यों नहीं बताते जहां सुरक्षाबल स्वयं पर हमला किये जाने पर भी शांत बने रहते हैं. निष्पक्ष लोगों का भी मत है कि अगर उस दिन मेजर गोगोई विवेक से काम न लेते तो अनेक जाने जा सकती थी. आर्मी चीफ द्वारा इस कार्य का बचाव करने पर उन्हें जनरल डायर बताने वाले को थियानमेन स्क्वायर क्यों स्मरण नहीं रहता, जहां 4 जून 1989 को लोकतंत्र समर्थक छात्रों पर चीन की वामपंथी सरकार ने टैंक चढ़ा दिये थे. सैकड़ों की मौत और 10 हजार से अधिक की गिरफ्तारी क्या वामपंथ का पुनीत कार्य था? क्या यह सत्य नहीं कि ऐसे लोगों के रहते हमें किसी बाहरी शत्रु की आवश्यकता ही नहीं है. क्या ऐसे आस्तीन के सांपों के कारण ही भारत बार-बार अपमानित नहीं होता रहा है? लेकिन इन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर कब तक राष्ट्र की अस्मिता पर प्रहार करने वालों को हम बुद्धिजीवी घोषित करते रहे? क्या बुद्धिजीवी को देशद्रोही का पर्याय बनने पर इस देश के चिंतक, लेखक, साहित्यकार और हर प्रबुद्ध व्यक्ति को अपनी आवाज मुखरता से उठानी चाहिए या नहीं?

यह संतोष की बात है कि अनेक पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इस नापाक कृत्य की भर्त्सना करते हुए सरकार से कार्यवाही की मांग की है. सेना सदैव से ही इस देश का फौलादी कवच है. उसने बाहरी आक्रमण से प्राकृतिक आपदा तक, आतंकवाद से नक्सलवाद तक हर जगह अपनी योग्यता और क्षमता का परिचय दिया है. सत्य तो यह है कि सेना के पराक्रम को राजनेताओं ने कम ही किया है. सेना द्वारा जीते गए हर युद्ध को हमारे नेताओं ने बातचीत की टेबल पर हराया है. बिना पाक द्वारा नाजायज रूप से कब्जाये गये कश्मीर को छुड़ाये लाहौर लौटाना उक ऐसा ही शर्मनाक कृत्य है.

आज भी जहां चटर्जी जैसे देशद्रोही सेना की मनोबल तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं वही यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि देश के पास पूर्णकालिक रक्षामंत्री तक नहीं है. प्रधानमंत्री को तत्काल किसी सैन्य विशेषज्ञ को रक्षा मंत्रालय का दायित्व सौंप कर सेना को उपस्थित चुनौती के अनुसार स्वयं निर्णय लेने और आधुनिकतम हथियार दिये जाने में जरा भी कोताही नहीं बरती जानी चाहिए. सैन्य अधिकारियों को भी मीडिया प्रेमी होने से बचते हुए शब्दों की बजाय अपने पराक्रम और विवेक से अपनी श्रेष्ठ परम्परा को जारी रखना चाहिए. इसी क्रम में, सत्तारूढ दल को भी सेना की उपलब्धियों का श्रेय लेने से बचना चाहिए. उसे अपने बौद्धिक प्रकोष्ठ को मजबूत करना चाहिए ताकि उस पर बुद्धिजीवियों के मामले में द्ररिद्र होने के आरोपों से मुक्ति मिल सके. उसे समझना चाहिए कि जरा सी चूक बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाती है. अगर उसकी ओर से वैचारिक लापरवाही का क्रम जारी रहा तो इतिहास से अनभिज्ञ ये इतिहासकार देश के वर्तमान और भविष्य को एक बार फिर से कलुषित कर सकते हैं.

Web Title: General Dyer, Historian, Army and Politics, Hindi Article, Dr. Vinod Babbar

Keywords: Freedom of Expression, Bad Use of FOE, National Security, Kashmir Issue, Politics, Government Policy on Army, Army and Media, Fake Intellectuals, Buddhijivi, Defense Minister, Army Chief, Jaliyanwala Bagh, General Dyer Reference, Historian

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