एक समय था गुलामी प्रथा का, जहां इंसान कौड़ियों से लेकर अशर्फियों के दाम में खरीदे और बेचे जाते थे! बोलियां लगती थीं और गरीब अमीरों के तलबे चाटते थे.

योग्यता और रंग-रूप पैमाना था कि कौन किस दाम पर तोला जाएगा.

भीड़ बढ़ रही है, गुलामों का बाजार सजा हुआ है और उनके मालिक बोली लगाने को तैयार हैं. इन्हीं लोगों के बीच नाटे कद का, चेहरे पर चेचक के दाग लिए कुरूप सा दिखने वाला एक पुरुष भी गुलामों की इस मंडी में खड़ा हुआ है.

उसके साथ खड़े गुलाम बिकते जा रहे हैं, लेकिन उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया.

आख़िर में वह अकेला बच गया तो उसने खरीददार ख्वाजा जमालुद्दीन बसरी से सवाल किया कि आप गुलामों को क्यों खरीदते हो?

जवाब मिला सुल्तान के लिए.

गुलाम ने फिर कहा कि तुम मुझे खुदा के लिए खरीद लो!

यह कहने वाला कोई और नहीं इतिहास में दर्ज गयासुद्दीन बलबन था, जिसने आगे चलकर दिल्ली सल्तनत पर राज किया!

आईए जानते हैं कैसे–

मध्य एशिया से खरीदकर दिल्ली लाया गया

गयासुद्दीन बलबन को जमालुद्दीन बसरी नाम का व्यक्ति 1232-33 ईसवी में मध्य एशिया के किसी गुलाम बाजार से खरीद कर लाया था. दिल्ली लाकर इसने गयासुद्दीन को गुलाम वंश के शासक इल्तुतमिश को बेच दिया और तभी से ये उसके दरबार में एक गुलाम के तौर पर सुल्तान की सेवा में नियुक्त हो गया.

गयासुद्दीन शारीरिक रूप से भले ही नाटे कद का था, लेकिन वह चतुर और वाक्पटु था. वहीं उसकी तीक्ष्ण बुद्धि उसको औरों से अलग करती थी. इसके साथ ही वह साहसी और कूटनीति के गुण से युक्त भी था.

यही कारण थे कि वह जल्द ही अपने सुल्तान का प्रिय बन गया.

Ghiyas ud din Balban. (Pic: HistoriaFactory)

प्रभावशाली व्यक्तित्व से मिली अहम जिम्मेदारियां

अपनी कूटनीतिक योग्यता और प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण वह जल्द ही दरबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा.

सुल्तान इल्तुतमिश की मौत के बाद जब उसकी बेटी रजिया सुल्तान ने शासन संभाला, तब उसने गयासुद्दीन को अमीर-ए-शिकार के पद पर नियुक्त किया.

इसके बाद गयासुद्दीन सुल्तान मुईजुद्दीन के समय में अमीर-ए-आखुर और अलाउद्दीन मसूद के समय में अमीर-ए-हाजिब बनाया गया. इल्तुतमिश के वंश के अंतिम शासक नासिरुद्दीन महमूद के समय गयासुद्दीन अमीर-ए-हाजिब पद पर तैनात था.

इसी नासिरुद्दीन महमूद की मौत के बाद गयासुद्दीन गुलाम वंश का 9वां सुल्तान बना.

फिर शुरू हुआ क्रूरता का सिलसिला

गयासुद्दीन 1266 ई. में गयासुद्दीन बलबन के नाम से राज सिंहासन पर बैठा.

सुल्तान बनते ही उसने सबसे पहले अपने उन सभी विरोधियों को रास्ते से हटाया, जिनसे उसको खतरे की आशंका थी. इनमें सबसे प्रमुख था सुल्तान इल्तुतमिश द्वारा गठित 40 अमीर सरदारों का दल, जिसको तिर्कान-ए-चहलगानी कहा जाता था.

बलबन ने देखा था कि सुल्तान के चयन तक में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए सुल्तान ने सबसे पहले दल के सभी अमीरों को मरवा दिया, इसके बाद पूर्व सुल्तान मुहम्मद के सभी पुत्र और सगे-संबंधियों की हत्या करवा दी.

इस प्रकार वह विरोध में उठने वाली हर एक आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर देता था. वह इतना क्रूर था कि छोटी-छोटी गलतियों पर भी कड़ी से कड़ी सजा सुनाता था.

एक बार बंगाल सूबे में तुगरिल खां नाम के व्यक्ति ने विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह को दबाने के लिए बलबन ने जिस सेनापति को भेजा था, जो तुगरिल से पराजित हो गया और भाग खड़ा हुआ. इससे परेशान बलबन ने सजा के तौर पर उसका सिर कलम करवा दिया.

साथ ही उसे किले के मुख्य दरवाजे पर लटका दिया, ताकि बाकी लोगों को सबक मिल सके.

इसके अलावा उसने तगड़ी गुप्तचर व्यवस्था बनाई थी, लेकिन अगर कोई जासूस अपने काम में असफल रहता या धोखा देने की कोशिश करता तो बलबन उसकी खाल में भूसा भरने जैसी अमानवीय सजा तक दे देता था.

गयासुद्दीन बलबन का मानना था कि पहली गलती के लिए माफ करने का मतलब है दूसरी गलती करने का मौका देना, माफी जैसा शब्द बलबन के शब्दकोष में था ही नहीं!

Slave King Ghiyasuddin Balban. (Pic: chargedaffairs)

सजदा करना को अनिवार्य बनाया

बलबन एक गुलाम था और उसे जातीय वंचना का शिकार होना पड़ा था, इसलिए सुल्तान बनने के बाद उसने जातीय श्रेष्ठता को सिद्ध करने का कोई मौका नहीं छोड़ा.

सबसे पहले उसने अपनी पृष्ठभूमि को प्रसिद्ध अफरासियब वंश के साथ जोड़कर मजबूत बनाया. इस अफरासियब वंश का उल्लेख फिरदौसी द्वारा लिखे शाहनामा में मिलता है.

उसने ईरानी प्रथा पर आधारित सजदा (सुल्तान को झुककर सलाम करना) और पैबोस (दंडवत लेटकर सुल्तान के पैर के अंगूठे को चूमना) जैसी व्यवस्था को दिल्ली सल्तनत में अनिवार्य बना दिया था. उसने ईरानी प्रथा पर आधारित नवरोज त्योहार को भी दरबार में मनाना अनिवार्य कर दिया.

छोटी-तुच्छ जाति के या फिर आम लोग उसे फूटी आंख नहीं सुहाते थे. छोटी सी गलती करने पर भी बलबन इन्हें कठोर से कठोर सजा देता था.

बलबन ने राजसी भय को अपने शासन का आधार बनाया, जो उसके व्यवहार पोशाक और नीतियों में झलकता था. बलबन चमचमाता राजसी वस्त्र धारण करता था, जिसमें एक लंबी और ऊंची टोपी होती थी, घुटने की लंबाई तक जूते और हाथों को भी दस्तानों से ढकता था.

उसके आसपास हमेशा 8 से 10 सैनिक नंगी तलवार लिए मौजूद रहते थे.

Ghiyasuddin Balban King of Mamluk Dynasty. (Pic: Uncyclopedia)

प्रजा में डर के लिए शासन

वहीं बलबन ने दरबार में किसी भी प्रकार का उपहास, हंसी-मजाक, आपसी बातचीत पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था. उसका कहना था कि दरबार में किसी भी प्रकार की भावनाओं को व्यक्त न किया जाए और शासन क्रूर नियमों का आदी बना रहे.

यहां तक कि सुल्तान खुद भी अपनी भावनाएं जाहिर नहीं करता था. इन नियमों का उल्लंघन करने पर कठोर सजा दी जाती, कभी-कभी तो मौत तक की सजा दी जाती थी.

कहा जाता है कि 1286 ईसवी में जब उसका बड़ा बेटा मोहम्मद मुगलों से लड़ते हुए मारा गया, तब उसकी मौत का समाचार पाकर भी बलबन दरबार में चुपचाप अपना काम करता रहा. उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

हालांकि, बाद में वह जब अपने शयनकक्ष में गया तो खूब फूट-फूट कर रोया था.

असल में उसने मोहम्मद को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, लेकिन उसकी मृत्यु से बलबन को बड़ा आघात लगा. बाद में उसने अपने छोटे बेटे बुगरा खां के पुत्र कैखुसरो को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.

बलबन ने अपने बचपन से लेकर बड़े होने तक एक गुलाम बनकर जो भी कष्ट सहे, जिस किसी भी माहौल से वो गुजरा उसने उसके भीतर समाज के प्रति एक दुष्टता पैदा कर दी.

यही कारण था कि वह धीरे-धीरे क्रूरतम बनता चला गया, जैसा कि उसके शासन के दौरान देखने को मिला. उसका मानना था कि राजा का डर ही शासन का अधिकार है.

Ghiyasuddin Balban. (Pic: amazon)

वहीं बलबन कहता था कि अल्लाह ने उसे शासन का भार सौंपा है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी केवल अल्लाह के प्रति है.

निम्न नस्ल के लोगों के बारे में उसका कहना था कि जब भी मैं ऐसे लोगों को देखता हूं तो घृणा और नफरत से मेरी नशे फड़कने लगती हैं और मेरे हाथ म्यान में रखी तलवार की मुठ पर अनायास ही चले जाते हैं.

खैर, जो भी कारण रहे हो, किन्तु जिस तरह से बलवन ने अपना शासन चलाने के लिए लोगों पर अत्याचार किए, उन्हें किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता. यही कारण है कि तमाम खूबियों के बावजूद उसकी छवि नकारात्मक ही दिखाई पड़ती है.

Web Title: Ghiyasuddin Balban: How Slave Who Became King of Delhi Sultanate, Hindi Article

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