किसी भी देश के लिए उसकी सेना सबसे बड़ी ताकत होती है.

भारत के एक तरफ पाकिस्तान का बार्डर है, तो दूसरी तरफ चीन की सरहदें! पड़ोसी देश की सरहदों से कोई घुसपैठ न हो या फिर युद्ध के दौरान दुश्मन का मुंह तोड़ जवाब दिया जा सके, इसलिए भारतीय सेना में ऐसे सैनिक तैयार किए जाते हैं जो युद्ध के हर मोर्चे पर सफल साबित हो सकें.

इन सैनिकों में गोरखा सैनिकों का स्थान ऊपर है, इस बात में दो राय नहीं!

भारत के पूर्व थल सेनाध्यक्ष ‘सेम मॉनेक्शा’ ने कहा था कि अगर कोई आदमी यह कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता या तो वह झूठ बोल रहा होता है या फिर वह “गोरखा” है. यह वही स्वर्गीय सेम मॉनेक्शा है जो 1971 में भारत- पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय थल सेना को लीड कर रहे थे.

वह खुद भी गोरखा रेजिमेंट से ही थे. भारतीय थल सेना की रेजिमेंट में बेहद आक्रामक माने जाने वाली गोरखा रेजिमेंट दुश्मनों के लिए काल है. आइये जानते हैं भारत की इस खतरनाक रेजिमेंट के बारे में विस्तार से.

‘कायर हुनु भन्दा, मर्नु राम्रो’

(Better to Die than Live Like a Coward) गोरखा में लिखी गई इस पंक्ति का सीधा अर्थ यह है कि ‘कायरता की ज़िन्दगी जीने से बेहतर है मरना’

गोरखा रेजिमेंट की शुरुआत 1815 में हुई थी. उस दौरान यह रेजिमेंट ब्रिटिश इंडियन आर्मी का हिस्सा थी. बाद में जब भारतीय थल सेना वजूद में आई तो इसका नाम ‘गोरखा रेजिमेंट’ रखा गया.

युद्ध में अपनी बहादुरी और अक्रामकता के लिए पहचाने जाने वाले ‘गोरखा’ भारतीय सेना के सबसे बेहतरीन सैनिकों में से एक माने जाते हैं. अपनी निडरता के चलते इस रेजिमेंट को भारतीय सेना द्वारा कई महत्वपूर्ण पदक और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है.

हर देश की सेना के लिए यह ज़रुरी होता है कि उसके सैनिक बेखौफ होकर लड़ें, ताकि दुश्मन के हर नापाक मंसूबों पर पानी फेरा जा सकें. गोरखा रेजिमेंट के सिपाहियों को इसमें अव्वल माना जाता है.

Gorkha Regiment (Pic: viralplots)

‘खुकरी’ गोरखा सिपाही की पहचान

भारतीय सेना में हर रेजिमेंट की एक खास पहचान होती है. जैसे कुमांऊ रेजिमेंट की पहचान ‘शेर’ के सिंबल से होती है. डोगरा रजिमेंट की पहचान ‘चीते’ से होती है.

ठीक वैसे ही गोरखा रेजिमेंट की पहचान 12 इंच लंबी और मुड़ी हुई ‘खुकरी‘ से होती है. यह खुकरी का सिंबल अधिकारी से लेकर सिपाही तक की वर्दी के कंधों और सेना की टोपी पर बना होता है.

इस खुकरी का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए करता है गोरखा सैनिक, फिर चाहे वह खुद की हो या फिर देश की. ऐसे मौके आए हैं, जब गोरखा के सैनिकों ने सिर्फ अपनी खुकरी के बल पर आम लोगों की जान बचाई.

खुकरी एक तरह का धारधार खंजर होता है. युद्ध के दौरान गोरखा दुश्मन का सिर काटने के लिए इस खुकरी का इस्तेमाल करते हैं. ‘आइएमए’ में ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब आर्मी ऑफिसर को गोरखा रेजिमेंट में भेजा जाता है, तब उन्हें वहां ‘खुकरी’ जरुर दी जाती है.

Gorkha With Khukuri (Pic: washingtonpost)

‘परंपरा’ जो गोरखा को बनाती है मज़बूत

भारतीय सेना की हर रेजिमेंट का अपना अलग कल्चर होता है. गोरखा का कल्चर भी सबसे जुदा है. यह उन्हें अंदर से मज़बूत बनाता है.

दशहरा पर्व के दौरान गोरखा रेजिमेंट में खुकरी से भैंस का सिर कलम करने का रिवाज है. गोरखा रेजिमेंट के सिपाही के लिए यह बहुत ज़रुरी होता है. माना जाता है कि ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि वह दुश्मन के लिए अंदर से मजबूत बन सकें.

जंग के दौरान अगर ऐसी परिस्थति आती है, तो उनके हाथ रहम के कारण बिल्कुल भी न कांपे. दिलचस्प बात तो यह कि इस परंपरा के अनुसार रेजिमेंट में पद के अनुसार सबसे बड़े अधिकारी को यह काम करने का अवसर प्राप्त होता है.

हालांकि कई बार जूनियर भी बकरी या भेड़ का सिर खुकरी से कलम कर देते हैं.

“जय महाकाली, आयो गोरखाली”

गोरखा रेजिमेंट अपने सिपाहियों के अंदर ऊर्जा और जोश बनाए रखने के लिए हमेशा आगे रहती है. मुसीबत के समय में आम लोगों को बचाने के लिए जाना हो या युद्ध में हल्ला बोलना. ‘गोरखा’ सिपाही जब भी दुश्मन पर हमले के लिए आगे बढ़ते हैं तो उनकी जुबान पर यही नारा होता है.

यहां तक कि आइएमए देहरादून में हर साल होने वाली पासिंग आउट परेड के दौरान भी गोरखा रेजिमेंट का यह नारा गूंज उठता है.

Gorkha Regiment: Most Aggressive Regiment of Indian Army (Pic: scroll)

हर मिशन में एकदम ‘फिट व हिट’

मौजूदा समय में भारतीय सेना में सात गोरखा रेजिमेंट हैं. जिनमें से छ: गोरखा रेजिमेंट ब्रिटिश आर्मी से ट्रांस्फार्म हुई है, तो वहीं एक रेजिमेंट आजादी के बाद गठित की गई थी.

गोरखा की बहादुरी के चलते भारतीय सेना द्वारा जितने भी ऑपरेशन किए जाते हैं, उन तमाम में गोरखा का योगदान जरुर होता है. दुश्मन सेना से गोरखा रेजिमेंट का युद्ध में अहम योगदान रहता है. 1947-48 में उरी सेक्टर इंडो-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना की जीत में गोरखा के सिपाहियों ने अहम योगदान दिया था.

वहीं 1965 से लेकर 1971 में कश्मीर में हालात खराब हुए थे, तो गोरखा ने अपना रोल अदा किया था.

फिल्मों में भी दिखी दमदार धमक

गोरखा रेजिमेंट की बहादुरी की झलक बॉलीवुड फिल्म ‘एलओसी’ में देखने को मिली. यह फिल्म गोरखा की बहादुरी और उनके देश प्रेम को दर्शाती है.

कारगिल युद्ध में देश के लिए शहीद होने वाले गोरखा रेजिमेंट कैप्टन मनोज कुमार पांडे की बहादुरी को फिल्म में दर्शाया गया है. कारगिल ऑपरेशन के दौरान गोरखा रेजिमेंट को लीड करने वाले उत्तरप्रदेश के मनोज कुमार पांडे शहीद हो गए थे. देश के लिए लड़ते हुए शहीद होने वाले कैप्टन मनोज कुमार पांडे को सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया.

एलओसी फिल्म में अभिनेता अजय देवगन ने उनका किरदार निभाया था. फिल्म के एक सीन में सरहद पर जंग के दौरान अजय देवगन ‘खुकरी’ से पाकिस्तानी सैनिकों की गर्दन काटते हुए नज़र आ रहे हैं. फिल्म के इस सीन में शहीद मनोज कुमार की युद्धकला और ‘खुकरी’ के महत्व को जगजाहिर किया गया है.

फिल्म के अलावा शहीद मनोज कुमार पांडे पर डाक्यूमेंट्री भी बन चुकी है, जिसमें उनकी बहादुरी को दिखाया गया है.

Gorkha Regiment: Most Aggressive Regiment of Indian Army (Pic: thequint)

गोरखा रेजिमेंट के उस जज्बे को सलाम, जिसके तरह वह देश की रक्षा के लिए खुद को हंसत-हंसते कुर्बान कर देते हैं. भारतीय सेना ऐसे ही सिपाहियों और एक से बढ़कर एक रेजिमेंट के बल पर अपने देश की आतंरिक और वाह्य सुरक्षा करने में पूरी तरह सफल है.

आज ही नहीं, आगे भी वीर सिपाहियों की धमक जारी रहेगी, इस बात में दो राय नहीं!

Web Title: Gorkha Regiment: Most Aggressive Regiment of Indian Army, Hindi Article

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