जितनी बड़ी ये दुनिया है, उतना ही बड़ा और गहरा इसका इतिहास है भी है!

धरती की विभिन्न सभ्यताओं और उनकी संस्कृति के बारे में उस दौर के खंडहरों से बहुत कुछ पता चलता है. आज के समय में ऐसी कई ऐतिहासिक चीजें हमारे सामने आई हैं. इनमें से बहुत सी ऐसी हैं जिन्हें हम जान चुके हैं लेकिन कई चीजें ऐसी भी हैं जिनके इतिहास की जानकारी हमारे पास नहीं है.

इन्हीं में से एक है बांगलादेश की सबसे पुरानी मस्जिद हारानो!

ये मस्जिद बांग्लादेश के इतिहास में एक खास महत्व रखती है. जी हां… ऐसा कहा जाता है कि ये एशिया की सबसे प्राचीन मस्जिद है. माना जाता है कि इस मस्जिद का इतिहास हजारों साल पुराना है.

आखिर क्या खास है इस मस्जिद में और इसे कब बनाया गया… आज हम कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे.

आईये इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए मस्जिद के ऐतिहासिक सफर पर चलते हैं–

हजारों साल पहले हुआ था निर्माण!

बांग्लादेश स्थित इस मस्जिद के बारे में कहा जाता है कि इसे हजरत पैगंबर के अनुयायियों ने बनवाया था और शायद यही कारण है कि इसे ‘साहेब-ए-करम’ नाम से भी पुकारा जाता है.

वहीं इतिहासकारों और शोधकर्ताओं की मानें तो यह संभवतः अरबी कैलेंडर के वर्ष 69 हिजरी में बनकर तैयार हुई. कुछ लोगों का कहना है कि इस मस्जिद के बारे में पता आज से 27 साल पहले  चला. लोग बताते हैं कि ये मस्जिद  बांग्लादेश के लालमोरनीहाट जिले में जमीन के नीचे दबी हुई थी. ये मुख्य शहर से 15 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व में स्थित है. मस्जिद की लंबाई और चौड़ाई क्रमश: 10 फीट और 21 फीट है, वहीं मस्जिद के कुल 4 स्तभ हैं, जिनमें से 2 अभी क्षतिग्रस्त हालत में हैं.

Prophet Mohammed Rides Buraq. (Pic: welt)

…और नीचे धंस गई थी मस्जिद!

एक हैरान करने वाला तथ्य भी इस मस्जिद से जुड़ा हुआ है. इतिहास की मानें तो जब एक दफा यहां भूकंप आया तो ये मस्जिद जमीन के नीच दब गई. किसी को कानों कान इसकी खबर नहीं लगी और इसके बाद यहां एक चबूतरे के जैसा कुछ खुद ब खुद बन गया. हालांकि बहुत सारे लोग इस बात को नकारते भी हैं.

वहीं मस्जिद के इमाम मानते हैं कि यहां पहले पैकोर नाम का एक वृक्ष मस्जिद को चारों ओर से घेरे हुए था.  वहीं ब्रिटिश काल के दौरान यहां आस-पास रहने वाले लोगों को बेदखल कर दिया गया. ऐसा इसलिए क्योंकि अंग्रजों को इस जगह पर एयरपोर्ट का निर्माण करवाना था. ये उस वक्त हुआ जब दुनिया में दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था. इससे पहले लालमोरनीहाट का इलाका ज्यादा जगंलों से घिरा रहता था. पर जैसे-जैसे यहां घरों का बनना शुरू हुआ जंगल खत्म होते चले गए और पेड़ो की पकड़ कम हो गई. इस कारण ही इस मस्जिद का ये हाल हुआ.

The Lost Mosque Of Bangladesh. (Pic: blogspot)

था ‘डर का साया’

कहा जाता है कि सन 1985 में ब्रिटिश काल के बाद यहां की जमीन कुछ लोगों ने खरीद लिया और जहां पर मस्जिद धंस गई थी वो हिस्सा ओमार अली नाम के एक  शख्स के पास आया और फिर ओमार ने ये हिस्सा किसी दूसरे आदमी को बेच दिया, जब उसने इस जगह पर कृषि के लिए खुदाई शुरू की तब हरनो मस्जिद का पता चला.

इस क्षेत्र को पहले ‘मोस्टर आरा’ के नाम से जाना जाता था. जिसका अर्थ है एक जंगल जिसके अंदर बसी है एक प्राचीन मस्जिद. बताया जाता है कि एक दौर में ये जगह काफी डरावनी थी. यहां पर बड़ी मात्रा में जंगली जानवरों जैसे शेर, बाघ और जहरीले सांपों का बसेरा था. लोगों को इस जगह का इतना खौफ था कि कोई गलती से भी यहां नहीं आता था. हालांकि 1986 के बाद से यहां लोगों का आना शुरू हो गया.

जब एक अंग्रेज इस इलाके में घूमने आया और उसने मस्जिद को देखा तो उसने कहा कि इसके निर्माण वर्ष के मुताबिक यह इस्लाम के इतिहास में एक प्राचीन मस्जिद है इसलिए एक मुस्लिम देश के रूप में इसे सरकार द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए. वहीं इन्होंने इस मस्जिद पर अधिक शोध करने का आग्रह भी बांग्लादेश की सरकार से  किया.

Fear in Jungle. (Pic: bloody)

नहीं हो सका पुनर्निर्माण

हालांकि एक दुखद पहलू भी इस मस्जिद के साथ जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि इस मस्जिद के रखरखाव और देखभाल पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. मस्जिद समिति के अनुसार हारानो मस्जिद के परिसर में 100 सीट क्षमता वाला एक मदरसा, एक इस्लामिक पुस्तकालय, एक शोध केंद्र, गेस्ट हाउस और एक अनाथालय स्थापित करने की योजना थी लेकिन ये योजना धरी की धरी रह गईं. इसका पुनर्निर्माण शुरू नहीं हुआ.

यहां के लोगों ने आपस में धन इकट्ठा कर इस मस्जिद का निर्माण फिर से कराने की कोशिश की लेकिन वो भी सफल नहीं हो सके. अब यहां के लोग चाहते हैं कि इस मस्जिद का पुन: निर्माण कराया जाए. उनका मानना है कि अगर इसके रख-रखाव पर ध्यान दिया गया होता तो आज ये स्थल पर्यटन का जरिया बन गया होता जिससे काफी लोगों को इससे बड़ी मात्रा में रोजगार मिल गया होता.

Gumbad-e-Khazra of a Mosque. (Pic: tokkoro)

ऐतिहासिक धरोहर का अंत

स्थानीय लोगों को इस जगह की खुदाई में कई दफा मस्जिद के अवशेष भी मिले हैं, जिसमें इस्लामिक इतिहास का जिक्र है. अवशेषों में कई इस्लाम ग्रंथ से जुड़े वाक्य लिखे हैं… तो कई पत्थरों में कलाकृतियां भी बनीं हुई हैं. यकीनन ये तथ्य इसके ऐतिहासिक होने की गवाही देते हैं. वहीं अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये मस्जिद 7वीं सदी में बनी और ये साऊथ एथिया की सबसे पुरानी मस्जिद है.

दूर-दूर से अंग्रेज आज भी यहां घूमने आते हैं तो इस मस्जिद का जिक्र उनकी जुबान पर जरूर होता है. इसे एक दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि धीरे-धीरे अज्ञानता की वजह से यहां की एक महत्वपूर्ण धरोहर अपने अंत की ओर है. अब इसके अवशेष मिटते जा रहे हैं.

Madina Munawara Roza E Rasool Masjid Nabawi. (Pic: desktopbackground)

इस तरह से आपने देखा कि कैसे एक मस्जिद जो 7वीं सदी में बनी थी, उसके बारे में लोगों को 1986 के दौर में आकर मालूम हुआ. उसके बाद कई अखबार से लेकर चैनल वाले भी वहां गए कई रिपोर्ट्स भी तैयार की गईं पर रखरखाव नहीं होने की वजह से अब ये ऐतिहासिक जगह खंडहर और खराब है.

आप इस पुरानी मस्जिद के बारे में क्या सोचते हैं, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.

Web Title: Harano Masjid: A Story of Ancient Bangladesh Mosque, Hindi Article

Featured Image Credit: flickr