दुनिया के ख़त्म होने की आशंका कई बार व्यक्त की गई है.

ऐसे में मानव इतिहास का सबसे बड़ा सवाल यही है कि आख़िर पृथ्वी पर जीवन की संभावनाएं कब तक बची रहेंगी?

साल 2012 हो या फिर ‘गॉड पार्टिकल’ की खोज, दोनों मौकों पर जोर-शोर से दुनिया के ख़त्म हो जाने की घोषणा की गई, पर विश्व का अस्तित्व आज भी कायम है.

गौरतलब हो कि लोगों ने कई ऐसी बीमारियां, प्राकृतिक आपदाएं और मिसाइल संकट झेले हैं, जिन्हें देखकर शुरुआत में लगा कि दुनिया शायद अब खत्म हो जएगी.

ऐसा ही एक संकट 1962 में आया, जिसे ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ के रूप में जाना जाता है.

तो आईये जानते हैं कि आख़िर क्या था ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ और कैसे इसके भयावह परिणामों को रोका गया–

जब साथ आए क्यूबा और रूस

बात 1960 के दशक की है.

शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका की परमाणु ताकत सोवियत संघ के मुकाबले कई गुना अधिक थी. अमेरिका के पास रूस को निशाना बनाने में सक्षम लंबी दूरी की 170 से ज्यादा अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, जबकि सोवियत रूस के पास ऐसी गिनी-चुनी मिसाइलें ही थीं.

अमेरिका ने सोवियत संघ को नियंत्रण में रखने के लिए अपने सहयोगी इटली और तुर्की के यहां मिसाइलों के अड्डे बना रखे थे.

इसके कारण सोवियत यूनियन पर अमेरिकी आक्रमण का डर मंडराता रहता था. ऐसे में सोवियत ने समझदारी दिखाते हुए, अपने नए दोस्त फिदेल कास्त्रो के सहारे अमेरिका की शक्ति पर नियंत्रण करने की सोची.

वहीं दूसरी ओर, क्यूबा भी अमेरिका की दख़लअंदाज़ी से परेशान था.

क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में बनी कम्युनिस्ट सरकार को गिराने के लिए अमेरिका लगातार प्रयास कर रहा था. इसके चलते क्यूबा ने अमेरिका के विरोधी सोवियत यूनियन से अपनी सुरक्षा के लिए हाथ मिला लिया.

इसी क्रम में सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा में गुपचुप तरीके से रूसी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं.

चूंकि क्यूबा व सोवियत यूनियन दोनों में ही कम्युनिस्ट सरकारें थीं, इसलिए इनके संबध इस कदम से मधुर होते चले गए. क्यूबा से अमेरिका की सीमा मात्र 90 मील की दूरी पर थी और यहां से अमेरिका के हर शहर को आसानी से निशाना बनाया जा सकता था.

ऐसे में क्यूबा की परमाणु मिसाइलें पूरे अमेरिका पर कब्जा करने में सक्षम थीं.

क्यूबा का सोवियत यूनियन के साथ मिलकर शक्ति नियंत्रण बिठाने के लिए इस तरह से मिसाइलों को स्थापित करना और इस घटना के चलते दुनिया पर खात्मे की तलवार के लटकने के इस संकट को ही 13 दिन के ‘क्यूबाई मिसाइल संकट’ के रूप में जाना जाता है.

Leader of Cuba Fidel Castro and Nikita Khrushchev from the Soviet Union. (Pic: businessinsider)

ख़ुफ़िया जांच में पता चली ‘सच्चाई’

अमेरिका को इनकी गतिविधियों पर पहले से ही शक था, किन्तु अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए का ध्यान क्यूबा पर कब्जे और फिदेल कास्त्रो को मारने पर लगे होने के चलते उसने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया.

इसी बीच कुछ खुफिया जासूसों के ज़रिए अमेरिका को पक्की जानकारी मिली, तो वह हरकत में आया और इसकी जांच करनी शुरु की.

अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने अपने विमानों के जरिए क्यूबा पर नज़र रखी. उन्हें सफलता 14 अक्टूबर, 1962 को मिली जब एक यू-2 नाम का अमेरिकी प्लेन क्यूबा में कुछ जगहों की तस्वीरें निकाल कर लाया.

अमेरिकी खोजी विमान ने क्यूबा में इन मिसाइलों की तैनाती का पता लगा लिया, जिसके साथ 16 अक्टूबर 1962 को ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ की शुरुआत हो गई.

रूसी परमाणु हमले की आशंका में अमेरिका में खौफ का माहौल बन गया. बाद में, इन तस्वीरों का प्रिंट निकाला गया. इससे ये बात साफ हुई कि क्यूबा के एक अड्डे पर अमेरिका को नियंत्रित करने के लिए बड़ी संख्या में परमाणु हथियारों का जखीरा जुटाया गया था.

American aerial photographs of Cuba revealed missile erectors, fuel tanks. (Pic: LinkedIn)

होने वाला था परमाणु हमला, मगर…

16 अक्टूबर को राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को स्थिति का ब्यौरा दिया गया. कैनेडी ने तुरंत आपात मीटिंग बुलाई. अमेरिकी रणनीतिकारों ने क्यूबा पर हवाई हमला करके उस जगह को तहस-नहस करने का प्लान बनाया.

कैनेडी जानते थे कि ये काम इतना आसान नहीं हैं, इसलिए वह सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना चाहते थे.

उन्होंने छह दिन बाद यानी 22 अक्टूबर को देश के नाम अपने संबोधन में इस पूरी घटना का खुलासा किया. इसके बाद अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई करते हुए क्यूबा की समुद्री घेराबंदी शुरू कर दी.

हर जहाज को क्यूबा जाने से पहले जांचने का निर्णय लिया गया जिस कारण रूस ख़फ़ा हो गया.

उसने उसे युद्ध की कार्यवाही करार दे दिया. साथ ही कुछ दिन बाद क्यूबा ने रूसी मिसाइल दागकर अमेरिका के एक विमान को मार गिराया इससे पूरी दुनिया परमाणु जंग के मुहाने पर आ खड़ी हुई.

इसी बीच रूस ने क्यूबा संकट के गहराने पर संभावित जंग के हालात से निपटने के लिए परमाणु हथियारों से लैस चार पनडुब्बियां भेज दी थीं.

अमेरिकी नाविकों ने अपनी समुद्री सीमा में उन पनडुब्बियों को घेर लिया और उन्हें समुद्र तल पर आने के लिए मजबूर किया.

पनडुब्बी के नाविक अधिकारियों का रूस से संपर्क टूट चुका था. अपने आपको घिरा पाने की हालत में कमांडरों को लगा कि जंग शुरू हो चुकी है.

ऐसे में तीन कमांडरों में से दो ने परमाणु मिसाइल दागने का फ़ैसला कर लिया था. हालांकि तभी तीसरे रूसी कमांडर वसिली अर्खिपोव ने उन्हें मनाकर इस हमले को रोक दिया था.

President Kennedy addressing the nation on the Cuban Missile Crisis (Pic: jfklibrary

कुछ इस तरह टला ‘युद्ध’

1962 में क्यूबा के मिसाइल संकट को आमतौर पर एक ऐतिहासिक बिंदु माना जाता है. जानकारों के अनुसार उस वक़्त 13 दिन तक दुनिया पर तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा मंडराता रहा.

कहते हैं कि इस घड़ी में अगर सोवियत नौसेना के एक अधिकारी ने इस परमाणु सामरिक युद्ध को टाला नहीं होता तो आज दुनिया की तस्वीर कुछ और ही होती.

दोनों मुल्कों पर पूरी दुनिया की तरफ से समझौते का भारी दबाव पड़ा.

आख़िरकार एक गुप्त समझौते के तहत सोवियत संघ ने क्यूबा से मिसाइलें हटाने का फैसला किया. जिसके जवाब में अमेरिका ने जगह-जगह तैनात अपनी मिसाइलें हटाने की सहमति दे दी.

जिन शर्तों पर सहमति बनी, वो ये थी कि सोवियत संघ क्यूबा से हथियारों को वापस मंगा लेगा और अमेरिका क्यूबा पर हमला कर उसे कब्जे में लेने की कोशिश नहीं करेगा.

दिलचस्प बात तो यह थी कि इसके अलावा एक और शर्त थी, जिसके बारे में राष्ट्रपति कैनेडी और कुछ व्हाइट हाउस के लोगों को छोड़कर किसी और को मालूम नहीं था. यह गुप्त शर्त थी कि अमेरिका तुर्की में अपना परमाणु अड्डा खत्म कर देगा.

बाद में जब इसके लिए तुर्की राजी हुआ, तब इस शर्त का खुलासा हो सका.

इस तरह से 13 दिन तक चले क्यूबा संकट का अंत 28 अक्टूबर को माना जाता है, लेकिन खुलासे से साफ हो गया है कि इसी तारीख को दुनिया परमाणु युद्ध की तरफ जा सकती थी.

आपको ये लेख कैसा लगा हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर शेयर करें.

Web Title: History of Cuban Missile Crisis, Hindi Article

Featured Representative Image Credit: starwars.wikia