दौलताबाद प्राचीन समय से शक्तिशाली राजाओं का मुख्य केन्द्र रहा है. आज जिस दौलताबाद को आप देखते हैं, वह प्राचीन समय में ‘देवगिरि’ नाम से जाना जाता था. कहते हैं कि यहां एक ऐसा किला मौजूद है, जो मध्यकालीन भारत में सबसे ताकतवर किला था. इतना ताकतवर कि इसे भेदना दुश्मन के लिए आसान नहीं था.

तो आईये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस किले में ऐसा क्या खास था कि इसके सामने दुश्मन की सेना बौनी साबित हो जाती थी–

तुगलक वंश ने दिया ‘दौलताबाद नाम’

दौलताबाद के किले का इतिहास हजार सालों से भी पुराना है. अंदाजा लगाना मुश्किल है, फिर भी अंदाजा लगाया जाता है कि इसका निर्माण 1187 से लेकर 1318 तक चला. 1762 तक इस किले ने कई शासक देखे.

शुरुआती समय में इस पर ‘भिलमा वी’ का राज रहा, जोकि यादव वंश के राजा माने जाते थे. इसके बाद यह किला यादव वंश के राजा रामचंद्र  के हाथों में आ गया था. वह बात और है कि वह ज्यादा समय तक उसे अपने पास नहीं रख सके.

असल में करीब 1296 में इस किले पर दिल्ली के सुल्तान ‘अलाउद्दीन खिलजी‘ की नजर पड़ गई. उसने इस पर कब्जे के इरादे से चढ़ाई करने की योजना बना डाली, किन्तु वह इसमें कामयाब नहीं हो सका. हालांकि, बाद में 1307, 1310 और 1318 में मलिक कफूर ने फिर से इस पर आक्रमण करते हुए कब्जा किया.

खिलजी के बाद 1328 में इस पर तुगलक वंश ने शासन किया. उसके राजा ‘मोहम्मद बिन तुगलक‘ ने इसे अपनी राजधानी बनाकर इसका नाम दौलताबाद कर दिया. इस तरह दौलताबाद का नाम भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया.

‘मोहम्मद बिन तुगलक’ के बाद भी कई शासक हुए. माना जाता है कि मुगल बादशाह अकबर के समय इस किले को मुगलों ने जीत लिया और इसे मुगल साम्राज्य में शामिल कर लिया गया. 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मौत तक इस किले पर मुगल शासन का ही नियंत्रण रहा, जब तक कि ये हैदराबाद के निजाम के कब्जे में नहीं आ गया.

Daulatabad Fort (Pic: indianonvoyage)

भारत का सबसे शक्तिशाली किला!

मजबूती की बात की जाए, तो यह किला भारत का सबसे मजबूत किला माना जाता है.

चूंकि यह बहुच ऊंचाई पर मौजूद है, इसलिए यहां तक पहुंचने के लिए लोगों को लंबी चढ़ाई करनी पड़ती है. शायद इस कारण ही दुश्मन की सेना के लिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं होता होगा. इसकी दूसरी बड़ी खासियत यह है कि यह जिस पहाड़ी पर मौजूद है, उसके चारों ओर खाइयां हैं, जो इसकी रक्षा में मददगार साबित होती रहीं.

इसके अलावा किले में दुश्मन को रोकने के कई दूसरे अनूठे इंतजाम भी किए गए. इनमें किले में बने सात विशाल द्वार और उसकी दीवारों पर तैनात तोपें खास हैं. इसके आखिरी दरवाजे पर एक 16 फीट लंबी तोप तो आज भी देखी जा सकती है.

तुगलक वंश के शासन के दौरान इस किले को और भी मजबूत किया गया. इसके लिए इस किले की रक्षा के लिए 5 किलोमीटर लम्बी एक दीवार का निर्माण करवाया गया, जोकि दुश्मन के हमले के दौरान इसकी सबसे बड़ी ताकत बनती रही.

यहीं नहीं कहा जाता है कि इस किले के दरवाजे इतने मजबूत होते थे कि इन्हें खोलने के लिए हाथी का इस्तेमाल करना पड़ता था.

History Of Daulatabad Fort (Pic: nroer)

तुर्की शैली की शानदार नमूना

इस किले में मौजूद चांद मीनार लोगों की खास आकर्षण का केंद्र मानी जाती है. 30 मीटर की ऊचाई रखने वाली इस मीनार को अलाउद्दीन बहमनी शाह ने बनवाया था. इसके अंदर सीढ़ियां बनाई गई हैं, जिससे ऊपर तक जाया जा सकता है.

खास बात यह है कि इस मीनार को शुद्ध तुर्की शैली में बनाया गया. इस कारण इसे इस्लामी रचनात्मक कौशल का एक शानदार उदाहरण कहा जाता है. इस मीनार के आसपास की जगह को चार हिस्सों में विभाजित किया जाता है, जिसमें कुल 24 चैम्बर्स बने हुए हैं. इसके साथ ही इसमें एक छोटी मस्जिद भी है.

माना जाता है कि इसको 1318 में ‘कुतुबुद्दीन मुबारक’ शाह ने अपने शासन काल के दौरान बनवाया था. मस्जिद की खास बात यह है कि इसकी छत पर नीले रंग की फारसी टाइल्स लगी है, जो इसे सुंदर बनाती है.

चांद मीनार के अलावा इस किले में चीनी महल, बारादरी, शाही निवास, स्नान घर, मनोरंजन के कमरे और एक मंदिर भी देखने को मिलता है.

Chand Minar (Pic: dioaurangabad)

ऐसे पहुंचे दौलताबाद किला…

दौलताबाद का किला औरंगाबाद से 15 किलोमीटर दूर है. आप यहां जाने के लिए वायु, रेल और सड़क तीनों माध्यमों को चुन सकते हैं. सड़क मार्ग की बात की जाए तो आप औरंगाबाद और एलोरा के बीच चलने वाली रोडवेज की बसों को चुन सकते हैं. इसके अलावा अपने वाहन या टैक्सी के माध्यम से भी यहां पहुंच सकते हैं.

हां, अगर आप हवाई जहाज से जाते हैं तो आपको औरंगाबाद हवाई अड्डे पर उतरना होगा. यहां से दिल्ली, मुंबई और जयपुर जैसे शहरों के लिए उड़ान भरी जा सकती है. इसी तरह अगर आप रेल को अपना माध्यम बनाते हैं तो औरंगाबाद आसानी से पहुंचा जा सकता है.

मुंबई से यहां के लिए तपोवन और देवगिरी नाम की दो गाड़ियां सीधी चलती हैं.

Cannon At Fort Daulatabad (Pic: panoramio)

इस किले की अहमियत को इस बात से भी समझा जा सकता है कि यहां पर बॉलीवुड की कई फिल्मों की शूटिंग तक हो चुकी है. इसमें 1979 में आई सुनील दत्त की फिल्म अहिंसा और 2011 में आई फिल्म तेरी मेरी प्रेम कहानी कुछ खास नाम है.

इस फिल्म का फेमस गाना अल्लाह जाने… में इस किले की एक झलक को देखा जा सकता है. इस गाने में शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा रोमांस करते दिखते हैं.

वैसे अगर किलों की बात ही की जाये तो आपको भारतवर्ष का कौन सा किला सर्वाधिक पसंद है?

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Web Title: History Of Daulatabad Fort, Hindi Article

Featured Image Credit: rentacaraurangabad