कलिंग युद्ध ने महाभारत की तरह एक बार फिर इतिहास के पन्नों को रक्त से भिगो दिया!

नि:संदेह महाभारत की जीत पांडवों के नाम थी और कलिंग की सम्राट अशोक के नाम, किन्तु दोनों में ही धरती की माटी अपनी ही लाखों संतानों के लहू से लाल हो चुकी थी.

इन दोनों युद्धों ने आने वाले युगों को महान संदेश दिया.

जहां महाभारत से निकले गीता के उपदेश आज भी हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं, वहीं कलिंग के बाद हुए अशोक के हृदय परिवर्तन ने अहिंसा के मार्ग को रोशन किया और बौद्ध के शांति संदेश को विश्वभर में प्रसार हो सका.

आमतौर पर सभी जानते हैं कि कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने हथियार छोड़कर अहिंसा के मार्ग पर खुद को अग्रसित कर लिया था, किन्तु क्या आपको पता है कि अशोक के लिए यह नई राह आसान नहीं थी.

आखिर क्यों आईए जानने की कोशिश करते हैं-

जब मानसिक अंतर्द्वंद्व में फंसे अशोक

विदिशा की साधारण सी कन्या देवी से प्रेम और विवाह के बंधन में बंधने के बाद भी अशोक ने अपने क्षत्रिय धर्म को बखूबी निभाया. वहीं, दूसरी ओर देवी अहिंसा के मार्ग पर चल रही थीं. साथ ही अपने दोनों बच्चों महेन्द्र-संघमित्रा को भी अहिंसा के मार्ग पर चलने की शिक्षा देती रहीं.

जब भी अशोक जिम्मेदारियों के दवाब में अपनेपन की कमी महसूस करते, तो लौटकर देवी के पास ही आते. उन्हें देवी के धर्म-कर्म, दान-शिक्षा आदि से कोई समस्या नहीं थी, लेकिन वे खुद कभी पूरी तरह इस कार्य में शामिल न हुए. इस बात की कमी देवी को हमेशा खली.

एक बार जब अशोक देवी और बच्चों से मिलनेे विदिशा आए हुए थे, तब उन्हें पिता के अस्वस्थ्य होने का समाचार मिला. लिहाजा उनका जाना जरूरी था.

दूसरी तरफ राज्य का विस्तार करने की जिम्मेदारी अशोक पर ही थी, जिसके लिए रक्त तो बहना ही था. इन्हीं विचारों में उलझे अशोक से देवी ने कहा, ‘राज्य में विद्रोह है, जिसे आप दबाने की कोशिश कर रहे हैं. क्या विद्रोह से शांति भंग नहीं होती?’

अशोक ने कहा, ‘हिंसा के बिना शासन सुचारू रूप से नहीं चल पाता. मैं अकारण ही लोगों को नुक्सान नहीं पहुंचाता. इसमें नया कुछ नहीं है.’ इसके जवाब में देवी ने कहा सदियों से हिंसा की गाथाएं चली आ रही हैं. हमारा इतिहास महाभारत जैसे भीषण युद्ध के रक्त से लाल है.

इन महागाथाओं के पन्नों से निर्दोष प्राणियों के रक्त की बू आती है.

ये सुनकर अशोक अवाक रह गए…आखिर उनके क्षत्रिय संस्कार कैसे अहिंसा के प्रवचनों को सहज स्वीकार कर लेते? बावजूद इसके यह द्वंद्व एक खामोश सवाल के साथ खत्म हो गया.

Emperor Ashoka: The Buddhist Ruler. (Pic: Wisdom Pills)

कलिंग युद्ध और अशोक की वापसी

विदिशा में अपनी पत्नी देवी और बच्चों को छोड़कर अशोक उज्जयनी लौट आए. जब कुछ समय बाद उन्हें, उनकी माता की मृत्यु का समाचार मिला और उसमें सौतेले भाई सुसीम की मिलीभगत सामने आई तो उन्होंने उसका वध कर दिया.

इसके बाद उपजी परिस्थितियों में राज्य की जनता ने राजकुमार अशोक को अपना सम्राट चुन लिया. इसके बाद तो जैसे जिम्मेदारियां बढ़ती गईं. सम्राट बनने के बाद अशोक का लक्ष्य था कलिंग को मौर्य साम्राज्य में मिला देना.

यह इसलिए भी जरूरी था कि अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य ने कलिंग को हासिल करने के लिए युद्ध लड़ा था, जिसमें वे असफल रहे. इसके बाद पिता बिंदुसार ने भी उसे जीतने का असफल प्रयास किया. अब बारी अशोक की थी!

उन्होंने कलिंग के राजा अनंत पनाभन को संधि का आमंत्रण भेजा, जिसे उसने अस्वीकार कर दिया. परिणाम यह रहा कि 261-62 ईसा पूर्व में अशोक ने कुशल सेना तैयार कर कलिंग पर आक्रमण कर दिया.

इस युद्ध में जहां अशोक के पास एक लाख सैनिक थे, वहीं कलिंग के पास मात्र एक लाख 50 हजार सैनिक थे. खैर, युद्ध शुरू हुआ और कम सैनिक होने के बाद भी अशोक विजयी हुए.

आखिरी वार करने के बाद जब अशोक ने अपना सिर उठाकर देखा तो उसके चारों ओर केवल लाशें ही लाशें थीं. पूरा मैदान सैनिकों के रक्त से लाल हुअा पड़ा था. सम्राट अशोक कलिंग युद्ध जीत चुके थे, किन्तु किस कीमत पर… ?

यह सवाल उन्हें परेशान कर रहा था.

The Kalinga War was fought by Ashoka. (Pic: SwamiRaRa)

अपने प्रेम के पास वापस लौटे

कलिंग का युद्ध जीत लेने के बाद भी जब अशोक को शांति नहीं मिली, तो उन्होंने देवी के पास लौट जाने का निर्णय किया. साथ ही उन्होंने राज सिंहासन पर बैठने की बजाए बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और एक बार फिर विदिशा की ओर रवाना हो गए, लेकिन भाग्य का खेल ऐसा था कि देवी अब इस दुनिया से चल बसी थीं.

इस बात से अंजान जब अशोक विदिशा वापस लौटे तो उन्हें यह दुखद समाचार मिला.

यूं तो अशोक ने देवी के अलावा भी अन्य विवाह किए थे, लेकिन महेंन्द्र-संघमित्रा उनकी प्रथम संतानें और देवी उनका पहला प्रेम थीं. दूसरी तरफ अन्य रानियां महलों में रहीं, लेकिन देवी ने अपने प्यार के लिए कुर्बानी दी.

उसने अपने प्रेम की पराकाष्ठा को अपने धर्म के समान ही रखा और कभी भी महल में रहने की लालसा नहीं की. कहते हैं कि अशोक ‘देवी’ के संस्कारों में अपनी मां धर्मा की झलक पाते थे. आखिर धर्म ने भी अशोक को रक्तरंजित राजनीति से दूर जंगलों में रखकर ही पाला था.

King Ashoka and Devi. (Pic: deviantart)

…और अपनाया अहिंसा का रास्ता

यह वो पल था, जब अशोक को अपनी जीत की खुशी नहीं बल्कि खुद से घृणा हो रही थी. देवी की हर एक बात उनको कचोट रही थी. चारों ओर की हाहाकार के बीच उसे वो एक-एक बात याद आ रही थी, जो देवी से पिछली मुलाकात के दौरान हुई थी.

देवी दुनिया से जा चुकी थी और उनके बच्चे महेन्द्र और संघमित्रा बौद्ध धर्म के प्रचारक बनकर श्रीलंका में जा बसे थे. यहां ऐसा कुछ न था, जो अशोक को सुकून देता. फिर भी उसके कानों में ‘बुद्धमं शरणमं गच्छामि’ के शब्द लगातार गूंज रहे थे.

आखिर अशोक ने हथियार फेंक दिए और निर्णय किया कि अब वह हिंसा के मार्ग पर नहीं चलेगा! और अशोक अकेले ही अहिंसा के मार्ग पर बढ़ गए.

उस समय देवी के प्रचार का ही नतीजा था कि विदिशा और आसपास के क्षेत्र में कई बौद्ध संत रहा करते थे. अशोक ने निर्णय किया कि वह यहां भगवान बौद्ध के अनुयाइयों के लिए स्तूप का निर्माण करवाएंगे.

Ashoka the Great Adopted Buddhism. (Pic: pinterest)

आगे उन्होंने देशभर के सबसे बेहतर शिल्पकार और वास्तु विशेषज्ञों को जमा किया और विदिशा से ही कुछ दूरी पर एक वीरान पहाड़ी को स्तूप निर्माण के लिए चुना गया.

वहीं दूसरी शताब्दी के अंत में स्तूपों का निर्माण कार्य शुरू करा दिया गया, जिनकी अपनी एक अलग ऐतिहासिक कहानी है, जिसका जिक्र नए लेख में करेंगे.

Web Title: Ashoka and His way to Buddhism, Hindi Article

Featured Image Credit: deviantart