यूँ तो जामा मस्जिद कई मायनो में दूसरी मस्जिदों से जुदा है! उसकी पहचान किसी की मोहताज नहीं है.

सदियों बाद भी यह अपनी आन-बान और शान से मुगल सल्तनत के सुनहरे काल का गुणगान कर रही है. इसकी दीवारों में मुगलिया सल्तनत की स्थापत्य कला रची बसी है. यह इतनी बड़ी है कि इसमें एक साथ करीब 25 हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं. 

पर इसकी खासियत इतनी भर नहीं है. इसका इतिहास इससे कहीं ज्यादा धनी है.

कहते हैं कि एक बादशाह ने सपना देखा अल्लाह का सबसे ऊँचा दरबार बनाने का और उस सपने की ताबीर बनी दिल्ली की जामा मस्जिद!

तो आईए इतिहास के पन्नों को पलटकर एक बार फिर से इसके बनने की कहानी को पढ़ने की कोशिश करते हैं-

बादशाह शाहजहां से उंचा तख़्त

जामा मस्जिद का सपना मुगल बादशाह शाहजहां ने देखा था.

सपना एक ऐसी मस्जिद का, जिसमें इबादतगाह ऐसी हो कि देखकर अपने आप मन में खुदा की बंदगी करने भाव जागे. यही नहीं शाहजहाँ चाहते थे कि खुदा का दरबार उसके दरबार से ऊंचा हो. इतना ऊंचा कि खुदा के घर का फर्श उसके तख्त-ताज से ऊपर हो.

इसके लिए उनको लाल किले के सामने किसी स्थान की तलाश थी. उनकी तलाश पूरी हुई लाल किले के ठीक सामने स्थित भोजला नाम की पहाड़ी पर. इस छोटी सी पहाड़ी को मस्जिद की बनाने के लिए चुना गया. यह शाहजहाँ के दरबार के ठीक सामने थी.

आगे शाहजहां के सपने के तहत इसका काम शुरु कर दिया गया.

Shah Jahan (Pic: biographyhindi)

5000 मजदूरों ने दिन रात तराशा

6 अक्टूबर 1650 को मस्जिद को बनाने का काम शुरू हुआ. मस्जिद का फ्लोर प्लान आगरा में स्थित जामा मस्जिद की तर्ज पर बनाया गया. बस यह उससे काफी बड़ा था. 80 मीटर लंबी और 27 मीटर चौड़ी इस मस्जिद को छह सालों तक 5000 मजदूरों ने दिन रात तराशा.

इसके एक-एक पत्थर में जान डाली. इसके हर गुबंद को चमकाया. दोनों तरफ 41 फीट उंची मीनारे तामीर की गईं. इस मस्जिद में तीन गुंबद बनाए गए. इसके फर्श को काले और सफ़ेद अलंकृत संगमरमर द्वारा बनाया गया, ताकि यह देखने में मुस्लिमों की इबादत चटाई की तरह लगे!

इसके अलावा मस्जिद के फर्श पर इबादत करने वालो के लिए चौड़े ब्लैक बॉर्डर भी बनाए गए. यहाँ इस तरह के कुल 899 बॉक्स बनाए गए. हजारों टन पत्थर की मदद से बनी थी यह आलीशान इमारत. 

इसको बनाने में उस दौर में करीब दस लाख खर्च किये गए थे. 

...और बन गई 'मस्जिद ए जहांनुमा'

पहले इसका नाम 'मस्जिद ए जहांनुमा' था, जिसका अर्थ है पूरी दुनिया को देखने वाली मस्जिद. इसके बृहद आकार के कारण, यहाँ काफी लोग जमा होने लगे. इससे लोगों ने इसे जामी मस्जिद कहना शुरू कर दिया.

यहीं नाम आगे चलकर जुमा मस्जिद हुआ यानी, जहाँ जुमे की नमाज होती है. आगे समय के साथ 'मस्जिद ए जहांनुमा', जामा मस्जिद कहलाने लगी.

बताते चलें कि, जिस दौर में इस मस्जिद का निर्माण हुआ उस दौर में मुगल वास्तुकला अपने चरम पर थी. यह वही समय था, जब इस्लामी वास्तुकला के कई बेहतरीन इमारतों में देखने को मिली. चूंकि, शाहजहां ने एक सपना देखा था कि वह अपने शासनकाल में भारत में दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर बनाएगा. इसके लिए शाहजहाँ ने शाहजहाँबाद बसाया, जो फिलहाल पुरानी दिल्ली के रूप में जाना जाता है.

इसी शहर में जामा मस्जिद तैयार हो की गई थी, जो मुगलिया कला की समृद्धता का बड़ा उदाहरण बनी. मस्जिद की नक्काशी में हिन्दू एवं जैन वास्तुकला की भी छाप छोड़ी गई. माना जाता है कि जामा मस्जिद शाहजहाँ की आखिरी अतिरिक्त खर्चीली वास्तुशिल्प थी.

इतना ही नहीं मुगल शासक शाहजहाँ का यह अंतिम आर्किटेक्चरल काम था, इसके बाद उन्होंने किसी कलात्मक इमारत का निर्माण नही करवाया.

Jama Masjid (Pic: LBB)

खास मस्जिद के लिए खास इमाम

मस्जिद जब तैयार हुई, तो इसके इमाम को लेकर भी काफी जदोजहद हुई. बादशाह चाहते थे कि इस खास मस्जिद के इमाम भी खास हों. काफी समय तक इमाम की तलाश की गई, जो उज्बेकिस्तान के एक छोटे से शहर बुखारा में जाकर ख़त्म हुई.

इमाम के लिए यहाँ से एक नाम सामने आया और वो था सैय्यद अब्दुल गफूर शाह का!

सैय्यद अब्दुल गफूर शाह की इमामी में 24 जुलाई 1656 को जामा मस्जिद में पहली बार नमाज अदा की गई. इस दिन दिल्ली की अवाम के साथ शाहजहां और उनके सभी दरबारियों ने पहली बार जामा मस्जिद में नमाज़ अदा की.

मुगल बादशाह ने इमाम अब्दुल गफूर को इमाम-ए-सल्तनत की पदवी दी. इसके बाद उनका खानदान ही इस मस्जिद की इमामत करता चला आ रहा है. चूँकि सैय्यद अब्दुल गफूर शाह बुखारा से थे, इसलिए उनके नाम के साथ बुखारी लगाने लगे. आज भी यह बदस्तूर जारी है.

उस दिन के बाद से आज तक दिल्ली की जामा मस्जिद में इमामत का सिलसिला बुखारी खानदान के नाम हो गया. सैय्यद अब्दुल गफूर के बाद सय्यद अब्दुल शकूर इमाम बन. इसके बाद सैय्यद अब्दुल रहीम, सैय्यद अब्दुल गफूर, सैय्यद अब्दुल रहमान, सैय्यद अब्दुल करीम, सैय्यद मीर जीवान शाह, सैय्यद मीर अहमद अली, सैय्यद मोहम्मद शाह, सैय्यद अहमद बुखारी इमाम बने.

सच हुआ शाहजहां का सपना

यहाँ आने वाले स्लाम धर्मावलम्बी अपने आप इबादद में लग जाते हैं. क्योंकि मस्जिद को कुरान की पवित्र पुस्तक की जटिल आकृतियों और काव्य रचनाओं को अति बारीकी के साथ सजाया गया है. इस मस्जिद में कई अवशेष हैं, जिनमें से एक कुरआन की एक प्राचीन प्रति है.

यह मस्जिद के उत्तरी दरवाज़े पर रखी गई है. साथ ही नबी के दाढ़ी वाले बाल, सैंडल और उनके पैरों के निशान संगमरमर के खंडों में प्रत्यारोपित हैं. यहाँ चारों तरफ इबादद का माहौल है, जिसका सपना शाहजहां ने देखा था.

आज भी यहाँ जुमा, अलविदा, ईद, ईद-उल-अजहा में यहां पर करीब 25 हजार से अधिक लोग नमाज अदा करते हैं. रमजान के महीने में यहां बहुत भीड़ होती है. मस्जिद के मेम्बरो, मेहराब, सेहन गुम्बद सब आलीशान है.

यह मस्जिद भव्यता की जीती जागती निशानी है. इसकी मीनार व दरों दीवार पर मुगलिया नक्काशी इतनी खुबसूरत है कि इस पर से नज़र नहीं हटती. मस्जिद के चार का दरवाज़े हैं, जो इसकी शान को और भी दुगना करते हैं.

Children's Enjoying in Jama Masjid (Pic: Hindustan Times)

दिल्ली का 'आन-बान और शान'

मस्जिद चूँकि ऊँची पहाड़ी पर है, इसलिए दूर से ही दिखाई देती है. यह पूरी संरचना लगभग पाँच फुट ऊंचे स्थान पर है. ताकि, इसका भव्य प्रवेश द्वार आस पास के सभी इलाकों से दिखाई दे सके. सीढ़ियों की चौड़ाई उत्तर और दक्षिण में काफी अधिक है.

चौड़ी-सीढ़ियां और मेहराबदार प्रवेश द्वार इस लोकप्रिय मस्जिद की विशेषताएं हैं. जामा मस्जिद का प्रार्थना गृह बहुत ही सुंदर है. इसमें ग्यारह मेहराब हैं, जिसमें बीच वाला मेहराब अन्य से कुछ बड़ा है. मस्जिद का मुख्य प्रवेश लाल किले के सामने से पूर्वी तरफ से है, क्योंकि यह पहले भी सम्राटों द्वारा उपयोग में लाया जाता था. यही कारण है कि जामा मस्जिद का पूर्वी द्वार केवल शुक्रवार को ही खुलता है.

अगर आप दिल्ली जाते हैं, तो इस एेतिहासिक जामा मस्जिद की सैर करना आपको आनंद का अनुभव दे सकता है. यह प्रातः 7 बजे से दोपहर 12 बजे और 1:30 बजे से सायः 6.30 बजे तक खुलती है. मस्जिद में आप किसी भी दिन जा सकते है, लेकिन इबादत के दौरान पर्यटकों का प्रवेश निषेध है.

मस्जिद में जाने के लिए आपको किसी भी प्रकार के शुल्क का भुगतान नहीं करना होगा, परन्तु फोटोग्राफी करने के लिए भुगतान करना पड़ता है.

Web Title: History of Jama Masjid, Hindi Article

Feature Image Credit: Welovebuzz