हूणों का जब भी जिक्र आता है, क्रूर शासक अत्तिला हूण का नाम जुबान पर सबसे पहले आता है. वहीं अत्तिला हूण, जिसने सम्राट बनने के बाद एशिया से यूरोप तक अपनी विजय पताका का ध्वज फहराया. उसकी ही देन थी कि हूणों का विस्तार यूरोप तक हो गया था.

सिर्फ यही नहीं, माना तो यहां तक जाता है कि अत्तिला के बाद हूण समुदाय पूरे एशिया में फ़ैला.

हालांकि, अत्तिला भारत तक नहीं पहुंच पाया था, लेकिन उसके बाद हूणों के एक राजा ने गुप्त वंश के राजाओं की नींव हिला कर रख दी थी. उसने अपने समय में एकछत्र राज्य स्थापित किया. शायद इसीलिए लोग इसे भारत का ‘अत्तिला’ कहते हैं.

इस कुख्यात शासक का नाम था ‘मिहिरकुल हूण‘.

इसने कैसे अपना विस्तार किया और इसका कद कैसे बड़ा आईये जानने की कोशिश करते हैं…

भारत में हूणों का आगमन!

अत्तिला हूण की क्रूरता के कारण हूण साम्राज्य तेजी से बढ़ा. यूरोप के बाद एशिया तक उसने अपने पैर जमाने शुरु कर दिये थे. इसी कड़ी में वह एक राज्य से दूसरे राज्य की ओर बढ़ते गये. इसके चलते उन्होंने कई धर्मों को अपनाया.

असल में उनका अपना कोई धर्म नहीं था, इसलिए वह जिसके संपर्क में आये, उसके ही धर्म को अपना लिया.

पांचवी शताब्दी के मध्यकाल तक हूणों ने भारत में घुसने की पुरजोर कोशिश की, मगर हर बार विफल हुए.

राजा स्कन्दगुप्त ने कई हूण राजाओं के आक्रमण को विफल किया. किन्तु 500 ई. के आसपास में श्वेत हूणों के राजा तोरमाण ने मालवा पर जीत दर्ज कर ली. कहते हैं कि बस यहीं से उनका भारत में आधार बन गया था.

धीरे-धीरे वह और मजबूत होते गये!

उनके शासक तोरमाण ने अपनी सेना मजबूत करते हुए मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान पर हमाला बोल दिया. एक-एक करके वह इन दोनोंं राज्यों को जीतने में सफल रहा. वह यहीं नहीं रुका… अपने विजय रथ को आगे बढ़ाते हुए गुप्तों से कई अन्य राज्य भी छीन लिये.

निःसंदेह तोरमाण एक कुशल शासक था, परन्तु उसका भारत में विजय अभियान शायद उसके साथ ही समाप्त हो जाता. पर उसका बेटा मिहिरकुल उससे भी ज्यादा क्रूर शासक बनकर उभरा.

Tormann  (Pic: Representative Pic: brazilnatal)

बौद्ध समुदाय का ‘नरसंहार’ किया…

515 ई. में तोरमाण के बाद मिहिरकुल हूण सम्राट की गद्दी पर विराजमान हुआ. उसने अपनी राजधानी पंजाब के सियालकोट में स्थापित की. कहते हैं कि यहीं से उसने अपना विजय अभियान शुरू किया, जो श्रीलंका से अफगानिस्तान तक अनवरत चला.

इस क्रम में उसने अपनी क्रूरता के कई उदाहरण पेश किये!

इन्हीं के चलते उसकी तुलना हूणों के सबसे क्रूर शासक अत्तिला से की गई. यहां तक कि उसे ‘भारत का अत्तिला’ तक कहा गया. एक किबदंति के अनुसार एक बार मिहिरकुल ने बौद्ध धर्म के बारे में जानने के लिए बौद्ध भिक्षुओं को निमंत्रण भेजा.

चूंकि, मिहिरकुल बहुत क्रूर था, इसलिए  बौद्ध भिक्षुओं ने अपने गुरु की जगह अपने सेवक को बौद्ध ज्ञानी बता कर उसके पास भेज दिया. मिहिरकुल को जब इसकी खबर चली तो वह आग बबूला हो गया.

उसने बौद्ध धर्म तथा उसके अनुयायियों को पूरी तरह से समाप्त करने का प्रण ले लिया. आगे उसने बौद्ध धर्मियों का कत्ले-आम शुरु कर दिया और कई बौद्ध मंदिरों को तहस-नहस कर दिया.

भारत में ‘विजय अभियान’

वैसे तो भारत में हूणों का विजय अभियान तोरमाण के शासन में ही आरम्भ हो चुका था. किन्तु उसे असल तेजी  मिहिरकुल ने दी. अपनी हिंसक प्रवृति को अपना हथियार बनाते हुए कश्मीर समेत भारत के कई राज्यों को वह जीतने में सफल रहा. माना जाता है कि सम्राट अशोक और राजा विक्रमादित्य के बाद वह अखंड भारत पर एकछत्र राज करने वाला शासक बना.

मिहिरकुल अपने विजय अभियान के मद में इस तरह चूर हो गया था कि देश की सबसे पुरातन और बेशकीमती धरोहर नालंदा विश्वविद्यालय पर भी उसने हमला कर दिया.

मिहिरकुल ने यह हमला स्कंदगुप्त के समय में किया था. हालांकि मिहिरकुल का शासन समाप्त होने के बाद स्कंदगुप्त के वंशजों ने नालंदा विश्वविद्यालय का पुनः निर्माण करवा लिया था.

Destroyed Nalanda University (Pic: nativeplanet)

राजा बालादित्य से हारा मिहिरकुल!

मिहिरकुल ने चारों तरफ अपना आतंक मचा रखा था. उसे लग रहा था कि उसके सामने अब कोई नहीं टिक सकता. जबकि, यह उसकी सबसे बड़ी गलतफहमी थी. वह तेजी से अपने अंत की ओर बढ़ रहा था. 533 ई. में अपने भाई द्वारा किए गए छल के कारण उसे पश्चिम में राजा यशोधर्मन के सामने हार का सामना करना पड़ा.

यही नहीं, उसे अपना राज्य छोड़कर जाना पड़ा. यह पराजय मिहिरकुल पचा नहीं पाया. उसने अपनी सैन्य शक्तियों को एकत्रित कर पटना के इर्दगिर्द पूर्व में अपना नया राज्य स्थापित करना चाहा. उसे यह बहुत आसाना काम लग रहा था… जोकि था नहीं!

राजा बालादित्य ने उसे वहां से खदेड़ दिया. मजबूरन मिहिरकुल को अपनी बची जिन्दगी छिपकर बितानी पड़ी. माना जाता है कि वह अपने अंत के समय में कश्मीर की ओर चला गया था. इसके बाद किसी ने उसका नाम सुना नहीं. कहते हैं कि पूर्व में मिली हार के कारण वह बुरी तरह से टूट चुका था. बाद में हार ही उसकी मौत का कारण बनी.

शिवभक्त था मिहिरकुल?

मिहिरकुल किसी धर्म या जाति का नहीं था, उसके वंशज भी मध्य एशिया से आये थे. हूण समुदाय ने जिस भी धर्म का संपर्क पाया वह उसी के अनुयायी बन गये. बावजूद ऐसा माना जाता है कि मिहिरकुल एक कट्टर शिव भक्त था, जिसके प्रमाण भी मिले हैं.

मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से होने वाले युद्ध से पूर्व उसका सिर भगवान शिव के अलावा किसी और के सामने नहीं झुका था. उसके समय में चलने वाले सिक्कों पर ‘जयतु वृष’ यानि ‘जय नंदी’ लिखा मिलता है. वहीं, कश्मीर में महिरेश्वर मंदिर समेत पूरे भारत में कई शिव मंदिरों के निर्माण का श्रेय उसी को दिया जाता है.

मगर अफ़सोस कि उसने लोगों के साथ कभी मानवीय व्यवहार नहीं किया. उसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, जीत!

इसके लिए उसे कितनी भी लाशें बिछानी पड़ी, वह बिछाने से चूका नहीं! उसकी हिंसक प्रवृति ने ही उसे क्रूर शासक की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया.

History of Mihirkula The Hun, Coins (Pic: coinindia)

वह भले ही पूरे जीवन अपनी विजय का डंका बजाता रहा,  परन्तु अंत में उसे पराजय का मुख ही देखना पड़ा और मौत को गले लगाना पड़ा.

आपकी मिहिरकुल के बारे में क्या राय है और ऐसे क्रूर शासकों के अंत पर क्या कुछ कहना चाहेंगे?

Web Title: History of Mihirkula The Hun, Hindi Article

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