1994 में रवांडा (Link in English) में हुआ नरसंहार अतीत के पन्नों में दर्ज एक ऐसी घटना थी, जिसकी यादें आज भी लोगों की आंखों को नम कर देती हैं. लगभग 100 दिनों तक चले इस नरसंहार में मारे गये लोगों की संख्या का अंदाजा लगाना मुश्किल था. एक तरफ जहां ढ़ेरों परिवार इस खूनी आंधी में उजड़ गए थे, वहींं दूसरी तरफ एक बड़ी संख्या में लोग अपना देश छोड़ पड़ोसी मुल्क में शरण लेने के लिए मजबूर हो गये थे. तो आईये इस कांड से जुड़ी कड़ियों को जानने की कोशिश करते हैं:

राष्ट्रपतियों की हत्या से भड़की थी चिंगारी

यूं तो रवांडा के तुत्सी और हुतु समुदाय के बीच झड़पों की खबरें आती रहती थीं. दोनों ही समुदाय अपने-अपने वर्चस्व के लिए लड़ते रहते थे. इसी बीच 6 अप्रैल 1994 (Link in English) को एक यात्रा के दौरान रवांडा के राष्ट्रपति हेबिअरिमाना और बुरुन्डियान के राष्ट्रपति सिप्रेन की हत्या की खबर आई. इस हत्या के पीछे किसका हाथ था, इसका खुलासा तो नहीं हो सका, लेकिन इसका फायदा हुतु उग्रवादियों ने जमकर उठाया. चूंकि उस समय हुतु समुदाय की सरकार थी तो उन्हें भी लग रहा था कि यह हत्या तुत्सी समुदाय के लोगों ने ही की थी.

इस बात का फायदा उठाते हुए दुर्घटना के 24 घंटों के भीतर, हुतू उग्रवादियों ने सरकार पर कब्ज़ा कर लिया. वह हत्या के लिए तुत्सी को दोषी ठहराने में कामयाब हो गये. देखते ही देखते यह खबर आग की तरह रवांडा में फैली तो स्थिति नाजुक होने लगी. जगह-जगह संघर्ष की स्थित पनपने लगी. फिर जिसका डर था वही हुआ. इस घटना का राजनीतिकरण हो गया.

उस समय की मौजूदा सरकार ने अपने विरोधी तुत्सी समुदाय के लोगों का जड़ से खत्म करने का मन बना लिया. इस योजना को सफल बनाने के लिए सरकार ने रवांडा सेना के अधिकारियों, पुलिस महकमें एवं कई उग्रवादी संगठन को एक कर दिया. उन्होंने विरोध में उठने वाले सभी स्वरों को हमेशा के लिए शांत करने का आदेश दे दिया गया.

History of Rwanda Genocide (Pic: amyepatton.com)

…और शुरु हो गया मौत का खूनी खेल!

सरकार की शह पर तुत्सी समुदाय के लोगों का कत्लेआम शुरु कर दिया गया. जो जैसे मिला, जहां मिला उसे मौत दे दी गई. इनसे सहानुभूति रखने वाले लोगों को भी जिंदा नहीं छोड़ा गया. चारों तरफ त्राहिमाम मच गया. देखते ही देखते यह तुत्सी और हुतु समुदाय के लोगों के बीच एक जातीय संघर्ष बन गया. हुतू समुदाय के लोग चुन-चुनकर तुत्सी समुदाय के लोगों को मारते चले गये.

कट्टरता इस कदर बढ़ गई थी कि औरतों और बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया. कुछ ही दिनों में इस संघर्ष ने नरसंहार का रुप ले लिया. लाखों लोग इसमें मारे गये. हजारों बेघर हो गये. हिंसा के दौरान, तुत्सी महिलाओं के साथ दुष्कर्म तक किया गया. युवतियों को कुकर्म के लिए बंदी बनाकर रखा गया… क्रूर यातनाएं दी गई थीं.

रवांडा में दशहत का माहौल किस तरह का रहा होगा, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोगों ने पड़ोसी देशों में पलायन करना शुरु कर दिया था. लोगों की पहचान कर-कर के मौत दी जा रही थी. बताया जाता है कि रवांडा की जमीन पर चारों तरफ तुत्सी समुदाय के लोगों की लाशों के ढ़ेर नजर आ आने लगे थे.

लगभग 100 दिनोंं बाद जब जुलाई 1994 (Link in English) को रवांडा पैट्रियटिक फ्रंट ने रवांडा में कदम रखा, तब जाकर यह नरसंहार रुका. यह एक प्रशिक्षित सैन्य समूह था, जिसमें तुत्सी लोग शामिल थे. इन लोगों को पहले किसी कारणवश रवांडा छोड़कर जाना पड़ा था. यह लोग युगांडा में रहते थे. इन्होंने पहले इस नरसंहार के बीच रवांडा में प्रवेश किया. फिर धीरे-धीरे वहां कब्जा करने में सफल रहे. बाद में सक्रिय उग्रवादी इनके सामने हथियार डालने पर मजबूर हो गये थे.

आंकड़ों की बात की जाये तो, इस जनसंहार में मारे गये लोगों का कोई सटीक आंकड़ा नहीं मिलता. फिर भी इस नरसंहार में लगभग 80,000 लोगों की मौत का अंदाजा लगाया गया था. इस नरसंहार में तुत्सी समुदाय लगभग खत्म सा हो गया था.

History of Rwanda Genocide (Pic: history.com)

बिल्कुल बदल चुकी है सूरत क्योंकि…

इस नरसंहार के बाद माना जा रहा था रवांडा सदियों तक नहीं उभर पायेगा, लेकिन पीड़ित लोगों की दरियादिली ने रवांडा की सरकार का तख्तापलट कर दिया. यकीन नहीं होता कि आज रवांडा में उन्हीं तुत्सी (Link in English) लोगों की सरकार है, जिन्हें 1994 के नरसंहार में लगभग खत्म सा कर दिया गया था. एक बड़ी संख्या में महिलाएं यहां की संसद में बैठती हैं. यह काम नामुमकिन सा था, पर पीड़ित लोगों के सद्भाव और प्रेम ने इसको संभव बना दिया.

वह बात और है कि इसके लिए उन्हें कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ी थी. साथ दी दूसरे समुदाय के लोगों का योगदान भी सराहनीय रहा कि उन्होंने इस नरसंहार से सीखते हुए विकास (Link in English) के रास्ते पर चलना पसंद किया.

समूची दुनिया में नफ़रत और मोहब्बत की ऐसी मिसाल ढूंढना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य है!

संयुक्त राष्ट्र संघ फेल हो गया, लेकिन…

2014 में जब इस जनसंहार की 20वीं बरसी आई तो रवांडा के लोगों ने कसम खाई थी कि वह उस दुख को भूल जाएंगे, ताकि उनका देश आगे बढ़ सके. पीड़ित परिवार के जो लोग पहले इस जनसंहार के जिम्मेदारों को कोसते थे, वह ही उनके लिए अब सहारा बनकर उभरे. मौजूदा हालात यह है कि जब कभी तुत्सी समुदाय के लोगों को मदद की जरूरत होती है तो हुतू आगे आकर उत्साह से सहयोग करते हैं.

रवांडा के यह लोग (Link in English) पूरे विश्व के लिए उदाहरण हैं. यह इस बात को प्रमाणित करता है कि अगर संवेदनाओं को जीवित रखा जाये तो कोई भी पत्थर पिघल सकता है.

A Look Back At How Women Rebuilt Their Country (Pic: huffingtonpost.com)

बताते चलें कि इस नरसंहार को रोकने में संयुक्त राष्ट्र संघ तक नाकाम रहा था. इसके लिए उसको आलोचना का शिकार भी होना पड़ा था. वह यहां शांति स्थापना करने में नाकाम रहा था. बावजूद इसके रवांडा के लोगों ने शांति की जो मिसाल कायम की है, वह सराहनीय है. वह यह साबित करने में कामयाब रहे हैं कि मोहब्बत के साथ रिश्तों में आई दूरी को पाटा जा सकता है. अगर लोग आपस में मिलकर प्रयास करें, तो बेहतर से बेहतर  समाज की परिकल्पना असंभव नहीं है.

Web Title: History of Rwanda Genocide, Hindi Article

Keywords: Rwandan Genocide, Tutsi population and moderate Hutus, Genocide, Mass Murder, Hutu-led government, Interahamwe and Impuzamugambi Militias, Colonial era, Hutu Power movement, Rwandan Civil War, Planning and Organization, Rwandan Patriotic Front Military campaign and victory

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