वियतनाम युद्ध दुनिया के इतिहास में दर्ज एक ऐसा युद्ध था, जिसकी दर्दनाक यादों के किस्से आज भी लोग अक्सर करते मिल जाते हैं. तकरीबन 20 साल तक चले इस युद्ध में लाखों सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. यह युद्ध उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम के बीच लड़ा गया था.

उत्तरी वियतनाम को रूस और चीन की मदद थी. तो दक्षिणी वियतनाम को अमेरिका और दक्षिणी कोरिया जैसे देशों का साथ मिला हुआ था. सब एक दूसरे को हराने में जुटे हुए थे. दोनों तरफ से सैनिक मरते जा रहे थे. पूरे वियतनाम में खून की नदियां बह रही थीं. यह युद्ध वियतनाम के लिए एक बुरे सपने जैसा था. तो आईये जानते हैं इस युद्ध से जुड़े पहलुओं को:

जब जापानी सैन्य कब्ज़े के ख़िलाफ़ विद्रोह हुआ…

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जापान ने वियतनाम के कई हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया था. तब ‘वियत मिन्ह’ ने अमेरिका और चीन की मदद से पहले जापानी सैन्य कब्ज़े के ख़िलाफ़ विद्रोह किया. उन्होंने जापान को कड़ी टक्कर दी और वियतनाम को आजाद कराने में सफल रहे. 1945 में जापान को हराने के बाद गुट के प्रमुख ‘चि मिन्ह’ ने वियतनाम के स्वतंत्रता की घोषणा की. उन्होंने पीपल्स कांग्रेस के साथ मिलकर वियतनाम में एक अस्थायी सरकार भी बनाई.

इस सरकार के गठन के बाद वियतनाम में उत्साह का माहौल था. इसी बीच चीन की सेना ने वियतनाम में एंट्री की और निगरानी में लग गई. इसका संदेश स्पष्ट था कि वियतनामी लोकतांत्रिक गणराज्य सिर्फ़ एक रस्म अदायगी भर थी. दूसरी ओर चीन की यह दखल रुस के गले नहीं उतर रही थी.

History of Vietnam (Pic: military)

और कब्जे के इरादे से फ्रांस ने कर दिया हमला!

फ्रांस ने 1946  में वियतनाम पर कब्जा करने के इरादे से धावा बोला दिया. फ्रांस को लगा था कि उनके लिए इस युद्ध को जीतना बहुत आसान था. असल में वह उनकी गलतफहमी थी. वियतनाम के ‘वियेत मिन्ह’ ने उन्हें कड़ी टक्कर दी और उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया. महीनों चले इस संघर्ष का नतीजा यह रहा कि फ्रांस को वियतनाम के साथ शांति वार्ता का रास्ता चुनना पड़ा. इस वार्ता को जिनेवा सम्मेलन का नाम दिया गया.

इसके तहत वियतनाम को दो भागों उत्तर और दक्षिण में विभाजित कर दिया गया. इस विभाजन के तहत फ़्रांसीसियों ने चीन में कुछ अधिकार छोड़ दिए. ‘वियत मिन्ह’ फ़्रांसीसी सरकार के वापसी के लिए राज़ी हो गया. बस उन्हें स्वतंत्रता का अधिकार चाहिए था. इस कड़ी में चीन को भी वियतनाम छोड़कर जाना पड़ा.

मगर कुछ दिनों में ही टूट गया समझौता

माना जा रहा था कि अब वियतनाम के लोगों की जिंदगी पटरी पर लौटेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कुछ दिनों बाद ही फ्रांसीसियों और वियतनामियों के बीच समझौता टूट गया. असल में इस बंटवारे में एक बड़ी संख्या में लोगों को उत्तर से दक्षिण में और दक्षिण से उत्तर में जबरन भेजा जाने लगा. चारों तरफ अफरा-तफरी मचने लगी. इसके कारण विरोध शुरु हो गया था.

मामला इतना ज्यादा बढ़ गया कि इसने युद्ध का स्वरुप ले लिया. दस साल तक फ्रांस के साथ चले इस युद्ध को प्रथम हिंदचीन युद्ध का नाम दिया गया. वियतनाम की तरफ से एक बार फिर से ‘वियत मिन्ह’ ने मोर्चा संभाला. फ्रांसीसी सेना मजबूत थी इसके बावजूद ‘वियत मिन्ह’ ने उनको नाको चने चबवा दिये. फ़्रांसीसी सेना ने वियत मिन्ह के मेन अड्डे ‘वियत बाक’ को घेर लिया था. बावजूद इसके वह उन्हें हरा नहीं पाए थे. उन्हें अंतत: पीछे हटना पड़ा था. यह फ़्रांसीसी फ़ौज के ख़िलाफ़ ‘वियत मिन्ह’ की बड़ी जीत थी.

इसी के साथ 1948 में ‘हो चि मिन्ह‘ को उत्तर वियतनाम का और वियतनामी राजा बाओ दाई ने ‘न्गो दिन्ह दिएम’ को दक्षिण वियतनाम का प्रधानमंत्री नियुक्त किया. अमेरिकी समर्थन के साथ, 1955 में ‘न्गो दिन्ह दिएम’ ने जनमत बुलाकर राजा को शासन से हटा दिया और अपने आप को दक्षिण वियतनाम का राष्ट्रपति घोषित किया. जब चुनाव नहीं हुए, ‘वियत मिन्ह’ के सिपाही जो दक्षिण वियतनाम में थे, सक्रिय हो गए और सरकार से लड़ने लगे.

सरकार ने स्थिति का अंदाजा लगाते हुए इन पर काबू पाने के लिए दमन शुरु कर दिया. तेजी से इस संगठन के लोगों को मारा जाने लगा. अंतत: जब ‘विएत मिन्ह’ को लगा कि उनको खत्म कर दिया जायेगा, तो वह शहर से हटकर जंगल के अंदर तक चले गए. इस कारण इन तक पहुंचना वियतनाम सरकार के गले की हड्डी बन गया.

A U.S. soldier clears a jungle area with his flame thrower (Pic: dailysignal.com)

अमेरिकी सेना की वियतनाम में इंट्री

1955 में पहली बार अमेरिका ने अपने सलाहकार दक्षिणी वियतनाम भेजे थे. वह वियतनाम में चीन के तेजी से हो रहे विस्तार से चिंतित था. उसको डर था कि अगर चीन वियतनाम पर कब्जा बनाने में कामयाब हो गया तो, अन्य कम्युनिस्ट देश भी उसके पीछे-पीछे चलकर मजबूत हो सकते हैं. इसी के तहत उसने अपने पैर पसारने शुरु कर दिए. 1964 के आसपास उन्होंने उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम में लुकी छिपी जंग भी शुरू कर दी. उन्होंने उन इलाकों को टारगेट किया, जहां रूस और चीन के समर्थक रहते थे. बाद में स्थिति गंभीर हो गई वह उन्हें खुलकर बड़ी सेना के सामने मैदान में दिखे.

1965 में पहला मौका था जब अमेरिका ने खुलेआम अपनी सेना वियतनाम में भेजी. सेना लड़ाकू विमानों से लैस थी. वह वियतनाम को साम्यवाद से बचाना चाहता था. जबकि, उत्तरी वियतनाम का मकसद देश को कम्युनिस्ट राष्ट्र बनाना था.

दूसरी तरफ ‘विएत कांग’ ने सरकार की नाक में दम कर रखा था. ‘विएत कांग’ एक क्रांतिकारी संगठन था, जो सरकार के फैसलों से खुश नहीं था. सरकार ने इसको दबाने की बहुत कोशिशें की, लेकिन सभी बेकार रही. ऐसे में अमेरिका ने इन्हें रोकने का जिम्मा अपने कंधों पर ले लिया. अमेरिकी सेना अच्छे हथियारों से लैस रहती थी, पर जंगल में लड़ने में वह ‘विएत कांग’ से कोसों दूर थी. इसका फायदा उठाते हुए ‘विएत कांग’ ने अमेरिकी सैनिकों पर धावा बोल दिया और उनके कई सैनिकों को मार गिराया.

‘कू ची’ टनल के भंवर में फंसे अमेरिकी

असल में ‘विएत कांग’ ने अपनी सुरक्षा के लिए ‘कू ची’ सुरंग बना डाली थी. जिसमें घुसने का हुनर उनको ही आता था. वह अमेरिकी सैनिकों को मारकर इसी सुरंग में घुस जाते थे. जब अमेरिकी उन्हें पकड़ने की कोशिश में इस सुरंग के अंदर जाते थे, तो इसके मुहाने पर लगे नुकीले तार में फंसकर मर जाते थे.

जब अमेरिका को कोई विकल्प न सूझा तो उसने ‘विएत कांग’ को उन्हीं के खेल में मात देने की योजना बनाई. योजना के तहत अमेरिकी सैनिक ‘विएत कांग’ के सैनिकों के पीछे-पीछे गए और इस बार वह सुरंग में घुसने में कामयाब रहे. वह बात और है कि अमेरिकी सैनिक जो, इस सुरंग में गये थे वह वहां से जिंदा नहीं लौट सके.

अमेरिका गुस्से से आग बबूला हो चुका था. वह जमीनी लड़ाई में ‘विएत कांग’ से नहीं जीत पा रहा था. इसलिए जंग को ख़त्म करने के लिए उन्होंने हवा से वार करने का मन बनाया. अमेरिका के पास प्लेन थे, जो आसमान से बम फेंककर उन्हें मार सकते थे. पर वह इस बात से बेखबर थे कि ‘विएत कांग’ इसके लिए पहले से तैयार था. जैसे ही अमेरिका ने अपने जहाज़ भेजे उस जगह को ख़त्म करने के लिए ‘विएत कांग’ के सारे सिपाही सुरंग के अंदर भाग गए.

अमेरिका ने कई बम बरसाए पर उस सुरंग पर कोई असर नहीं पड़ा. साथ ही ‘विएत कांग’ के सिपाही भाग निकलने में कामयाब रहे. करीबन एक साल तक वह अमेरिकी सैनिकों को परेशान करते रहे. अंतत: अमेरिका ने थोड़ा वक्त लेते हुए उनकी सारी जानकारी इकट्ठा की और फिर ‘विएत कांग’ पर हमला कर दिया. इस बार हमला इतना जोरदार था कि ‘विएत कांग’ के सैनिक बच न सके.

History of Vietnam (Pic: ushistoryscene.com)

1975 में खात्मा हुआ इस खूनी जंग का

अमेरिका ने पांच लाख सैनिकों वाली अपनी सेना को पूरी तरह लगा दिया, ताकि वह अपने उद्देश्य में सफल हो सके. इस युद्ध में 30 लाख से ज्यादा लोग मारे गए, जिसमें 58 हजार अमेरिकी भी शामिल थे. अमेरिका के इस फैसले की खूब आलोचना हुई. वहां के लोग सड़क पर उतर आये. जगह-जगह आंदोलन देखने को मिले. अंतत: 1973 में अमेरिका को अपनी सेना को वापस बुलाना पड़ा था.

अमेरिकी सेना के जाने बाद 1975 में कम्युनिस्ट फोर्सेस वियतनाम के साइगोन पर कब्जा करने में सफल रही. इसी के साथ यह खूनी संघर्ष खत्म हो गया. माना जाता है कि 20 साल तक चले इस भीषण युद्ध में किसी की भी जीत नहीं हुई. बाद में वियतनाम कम्युनिस्ट सरकार द्वारा सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ वियतनाम बनाया गया.

वैसे तो इस युद्ध को खत्म हुए कई साल बीत गए हैं, लेकिन आज भी इसकी कहानी लोगों की चर्चा का विषय रहती है.

Web Title: History of Vietnam, Hindi Article

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