जो शख़्स बंदो पर रहम नहीं करता, खुदा उस पर रहम नहीं करता!

जुर्म की दुनिया का किला कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, लेकिन एक दिन ऐसा आता है, जब इसको धाराशायी होना पड़ता है.

एक कहावत है कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता है.

यह पुराने लोगों की कहावत हिटलर और उसके साथियों पर बिल्कुल सटीक बैठती है. हिटलर के आतंक में साथ देने वाले उसके साथियों का भी हिटलर के मरने के बाद बहुत बुरा हशर हुआ.

मरता क्या नहीं करता. जब हिटलर की मौत के बाद हिटलर के साथियों को मुश्किलों ने घेरा तो वह अपनी जान बचाते हुये दूसरे देशों में पनाह लेने लगे. कहते हैं न कि जब मौत आती है तो दुनिया के किसी भी कोने में इंसान पहुंच जाये मौत उस तक पहुंच जाती है. आज हम यहां आपको हिटलर के उन साथियों के बारे में बतायेंगे जो जुर्म की इबारत लिखने में उसके साथ थे, लेकिन आखिर में उनका हाल भी हिटलर जैसा ही हुआ.

जी हां, हिटलर के वह साथी जो चतुराई से जर्मन से भागते हुये अमेरिका और अन्य देश पहुंच गये मगर उनको राहत कहीं न मिली और अंत में मौत की आगोश में जाना पड़ा.

तो चलिए जानते हैं कौन थे वह नाज़ी जिन्हें पूरी दुनिया मानती है बुरा–

एडॉल्फ ऐशमान

यह वह शख़्स है जो हिटलर की ओर से किये गये सभी जुर्मों में बराबरी का शरीक़ था. इसे महज़ इत्तेफाक़ ही कहेंगे कि इसका शुरुआती नाम भी हिटलर के नाम से मिलता है. एडॉल्फ ऐशमान ने हिटलर के सभी जुर्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शायद आपको यक़ीन न हो कि ऐशमान को दुनिया के सबसे मोस्ट वांटेड नाज़ी के रुप में भी जाना जाता था.

एडॉल्फ ऐशमान ने हिटलर की ओर से मारे गये यहूदियों को पूरी तरह से ख़त्म करने का नेतृत्व किया था. दूसरे विश्व युद्ध में जर्मन की बुरी हार के बाद ऐशमान के सामने ख़ुद को बचाने की काफी बड़ी चुनौती थी क्योंकि वह ताक़तवर तब तक ही था जब तक हिटलर जिंदा था.

कुछ लोगों की मदद से ऐशमान जैसे तैसे ख़ुद को अन्य देशों की सेना से बचाते हुये ऑस्ट्रिया पहुंचा. वहां कुछ दिन रहने के बाद वह इटली चला गया. इटली में भी उसको अपनी जान का ख़तरा महसूस हुआ तो वह जाली पासपोर्ट बना कर अर्जेंटीना पहुंच गया.

इजरायली सेना एवं पुलिस को इस खूंखार नाज़ी की काफी ज़ोरों से तलाश थी. इसलिए इजरायल की सबसे घातक फोर्स मोसाद को ऐशमान को ज़िंदा पकड़ने का ख़तरनाक मिशन दिया गया. मोसाद ने इस बेहद ख़तरनाक मिशन पर काम करते हुये ऐशमान को 11 मई 1960 को गिरफ्तार कर लिया.

जो काम अभी तक कोई नहीं कर पाया था वह कुछ दिनों में मोसाद सुरक्षा एजेंसी ने करते हुये ऐशमान को इजरायली सरकार के सामने खड़ा कर दिया था.

31 मई 1962 को इजरायली कोर्ट ने ऐशमान को फांसी के फंदे पर लटका दिया. यह फांसी इजरायल के इतिहास की पहली फांसी थी… जो एक नाज़ी को दी गई थी.

Adolf Eichmann (Pic: wikipedia)

जोसेफ मेंगले

डॉक्टरों का पेशा होता है मरीजों की जान बचाना, लेकिन जोसेफ मेंगले एक ऐसा नाज़ी डॉक्टर था जिसने इंसानियत को तोड़ नाज़ी सेना में रहते हुये लोगों पर काफी सितम ढाये थे. नाज़ी सेना के नियमों के तहत जोसेफ को लड़ाई में लड़ने के लिए भेजा गया था. युद्ध में हुई गोलीबारी में जोसेफ मेंगले बुरी तरह से घायल हो गया.

जोसेफ ने डॉक्टरी की पढ़ाई कर रखी थी. इसलिए उसको नाज़ी सेना की ओर से कैद कर रखे लोगों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. जोसेफ ने तब सारी हदें पार कर दीं जब उसने अपनी डॉक्टरी के उल्टे सीधे परीक्षण मासूम बच्चों एवं प्रेगनेंट महिलाओं पर करना शुरु कर दिये. वह खून से भरे इंजेक्शन बच्चों को बड़ी बेदर्दी से लगा देता तो कभी महिलाओं के नाज़ुक अंगो पर इंजेक्शन ठोक देता.

जोसेफ का आतंक इतना बढ़ गया था कि उसको लोग मौत का फरिश्ता कहने लगे थे.

कई साल गुज़रने के बाद भी उसे आज भी मौत के फरिश्ते के नाम से याद किया जाता है. जब नाज़ी सेना का पतन हुआ तो जोसेफ मेंगले भी अन्य नाज़ी साथियों की तर्ज पर जर्मनी से भाग गया. वेस्ट जर्मन के प्रयासों के बाद जोसेफ को 1979 में ब्राज़ील से गिरफ्तार कर लिया गया था.

Josef Mengele (Pic: holocaust…)

वॉल्टर रॉफ

वॉल्टर रॉफ वह शख़्स था जिसके सीने में शायद इंसानी दिल नहीं किसी दानव का दिल धड़कता था. वॉल्टर रॉफ ने कई हज़ार लोगों को गैस चेम्बर में तड़पा कर मार दिया था. वॉल्टर रॉफ नाज़ी सेना में कर्नल के पद पर तैनात था. कहा जाता है कि उसने अपनी ज़िंदगी में करीब एक लाख लोगों की हत्या की.

बाहरी देशों की सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार वॉल्टर रॉफ ने गैस चेम्बर में बने बड़े सिलेंडरों में ट्रकों की मदद से गैस भरने का काम अंजाम दिया था.

वॉल्टर रॉफ ने सिर्फ जर्मन में रहकर नाज़ी सेना का नेतृत्व करते हुये लोगों को मौत के घाट नहीं उतारा था. बल्कि साल 1942 से लेकर 1943 के दौरान फ्रांस में नाज़ी सेना को लीड भी किया था.

इतना ही नहीं उसने अपने जुर्म की दास्तान इटली और ब्रिटेन में भी लिखी. नाज़ी सेना के पतन के बाद वॉल्टर को भी खुद को बचाने की चिंता सताने लगी थी, इसलिए उसने जर्मनी छोड़ना बेहतर समझा.

हिटलर की मौत के बाद उसे मित्र देशों की सेना ने बंधक बना लिया. हालांकि वह बाद में बंदी कैंप से भागने में सफल रहा और इटली जा पहुंचा. वहां कुछ समय रहने के बाद वह सीरिया चला गया.

साल 1948 में वह सीरिया के राष्ट्रपति का मिलिट्री एडवाइज़र भी रहा. बहुत से देशों ने इसे पकड़ के सजा देनी चाही मगर इसके लिए तो भगवान ने कुछ अलग सोच रखा था. चिली में 1984 में इस नाज़ी की दर्दनाक मौत हो गई.

Walter Rauff (Pic: history)

फ्रांज स्टैंगल

यह वह नाज़ी था जिसको इसके सहयोगी गुरुर में वाइट डेथ के नाम से पुकारते थे.

फ्रांज स्टैंगल नाज़ी सेना में सफ़ेद रंग के कपड़े पहनता था और साथ में एक लंबा कोड़ा अपने साथ रखता था. इसने अपनी ज़िंदगी में बेगुनाह लोगों पर इतने ज़ुल्म ढाये थे कि इसका नाम सुनते ही लोग थर – थर कांपने लगते थे.

जानकर हैरानी होगी कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी सेना ने एक कार्यक्रम चलाया था. कार्यक्रम का नाम था ‘इच्छामृत्यु कार्यक्रम’. इस कार्यक्रम का नेतृत्व फ्रांज स्टैंगल ने ही किया था.

यह पढ़ते हुये शायद आपको इसकी बर्बरता का अहसास हो जाये कि इसने इच्छामृत्यु के कार्यक्रम में दिव्यांगों को जान से मारने की भूमिका निभाई थी. उस समय नाज़ी सेना को यह कतई पसंद नहीं था कि जर्मन में हाथ पांव से मजबूर कोई व्यक्ति जीवन गुजार सके. ऐसा इसलिए था क्योंकि वह व्यक्ति नाज़ी सेना के कुछ काम का नहीं था. इसलिए उसे मौत की सजा सुना दी जाती थी.

फ्रांज स्टैंगल ने दिव्यांग लोगों पर कोड़े बरसा कर उन्हें मौत की नींद सुला दिया था. युद्ध ख़त्म होने के बाद स्टैंजल अन्य देशों में पनाह लेने के लिए भाग गया. वह इटली और ब्राज़ील रहा. काफी लंबे समय तक वह अपनी किस्मत से दूर भागता रहा मगर आखिर में मौत ने उसे अपने शिकंजे में जकड़ ही लिया.

साल 1971 में हार्ट अटैक से फ्रांज की बुरी मौत हो गई.

जोसेफ श्वाब बर्गर

जोसेफ श्वाब बर्गर!

नाज़ी सेना का एक और खूंखार और इंसानियत के टुकड़े करने वाला शख़्स. नाज़ी सेना ने पोलैंड में जिन लोगों को अपना गुलाम बनाया था और उन्हें जेल में सड़ने के लिए डाल दिया था उन लोगों पर अत्याचार करने का बीड़ा जोसेफ श्वाब बर्गर ने उठाया था. यह पढ़ते हुये आपकी रुह तड़प उठे कि यह बंधक बनाये गुलामों को अन्य गुलामों के आंखों के सामने गोलियों से भून देता था.

इसका मुख्स कारण था बंधकों के दिलों में अपना ख़ौफ बैठाना!

काफी हद तक यह उसमें कामयाब भी हुआ और इसके डर से बंधक कांप उठते थे. जोसेफ श्वाब बर्गर ने अपने कार्यकाल में हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारा. हैरत की बात यह है कि यह हर कैदी को पीछे से उसकी गर्दन पर गोली मार देता था.

जब अपनी जान पर बन आई तो यह अर्जेंटीना भाग गया. वहां काफी समय नाम बदल कर रहने के बाद आख़िरकार जोसेफ पकड़ा गया. साल 2004 में जेल में सज़ा काटने के दौरान 92 साल की उम्र में जोसेफ मौत हो गई.

एरिच पायबेके

एरिच ने साल 1944 में नाज़ी सेना की ओर से रोम पर हमला करने का नेतृत्व किया था. कहा जाता है एरिच ने इस हमले में करीब 300 से अधिक रोमंस को ज़िंदा काटा था. जब एरिच को  बाद में अन्य देशों की सेना ने पकड़ा तो उसने अपने किये हुये घटिया कामों को कबूल करने की बजाये सैन्य अधिकारियों से कहा कि उसने किसी को नहीं मारा बल्कि वह तो नाज़ी सेना के सभी आदेशों का पालन कर रहा था.

पकड़े जाने के दौरान एरिच को अपने कामों पर कोई भी पछतावा नहीं था.

सेना ने एरिच को ब्रिटिश देश की जेल में डाल दिया था. वहां से यह जेल तोड़कर भागने में भी सफल रहा. बाद में एरिच ने अर्जेंटीना में पनाह ली, लेकिन वहां भी वह पकड़ा गया. एरिच को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई. साल 2003 में अपनी सौ साल की उम्र में एरिच ने जेल में ही आख़िरी सांस ली.

Erich Priebke (Pic: scmp)

गेरहार्ड बोहने

पेशे से तो वकील, लेकिन हरकतों से किसी जल्लाद से कम नहीं! नाज़ी सेना के जिन इच्छामृत्यु कार्यक्रम का ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है, उन कार्यक्रम में बंधकों को मारने में गेरहार्ड बोहने का नाम भी लिया जाता है. हालांकि नाज़ी सेना के पतन के बाद इसका भी गुरुर धाराशयी हो गया और यह अमेरिका भाग गया.

अमेरिका तो वह भाग गया मगर वहां अमेरिका उसके पीछे पड़ गया था.

अमेरिका में ख़तरा महसूस होने के कारण यह अर्जेंटीना भाग गया. थोड़े समय तक गेरहार्ड अर्जेंटीना में ही रहा. जैसे ही जर्मनी में थोड़े से हालत सुधर गए तो उसने सोचा कि क्यों न वापस अपने देश ही जाया जाए. गेरहार्ड थोड़े समय बाद अपने देश की ओर निकल गया मगर इस बार उसकी किस्मत इतनी अच्छी नहीं थी.

जर्मनी में कदम रखते थी गेरहार्ड को हिरासत में ले लिया गया. जर्मन कोर्ट ने उसे सज़ा सुनाई. काफी सालों तक वह जेल में अपने गुनाहों की सज़ा काटता रहा. साल 1981 में आखिरकार मौत ने गेरहार्ड को अपनी आगोश में ले ही लिया.

यह थे नाज़ी सेना के वह अधिकारी जिन्होंने अपने जीवन में ज़ुल्म ढाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन जब समय ने पलटी मारी तो इन लोगों को अपने कर्मों का पता चला.

किसी ने सही कहा है जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है एक दिन खुद उसमें ज़रुर गिरता है.

आप क्या सोचते हैं ?

Web Title: Hitler Friends Who Died After War, Hindi Article

Feature Image Credit: pintrest/historyguy/history