सन 2016 में अमेरिका के ऑर्लैंडो शहर में एक समलैंगिक बार में एक व्यक्ति ने अधाधुंध गोलियां चला कर पचास लोगों को मौत के घाट उतार दिया था..

गोलियां चलाने वाले व्यक्ति का नाम “उमर मतीन” था.. वैसे तो उसने फ़ोन पर कहा था कि उसका ये हमला इराक़ पर अमेरिका के हमले के विरोध में है, मगर हमले के लिए समलैंगिक बार का चुनाव उसकी अपनी “व्यक्तिगत” कुंठा थी जो उसने अपने धार्मिक प्रवर्तकों और पुस्तकों से तोहफ़े में पायी थी.

घटना के बाद उमर मतीन के पिता ने बताया कि महीनो पहले उसके बेटे ने एक बाज़ार में, दो समलैंगिक युवकों को एक दुसरे को चूमते हुवे देखा था… उस समय मतीन का परिवार भी उसके साथ था जिस वजह से मतीन बहुत ज्यादा आक्रोशित हो गया था. मतीन के पिता ने कहा कि शायद इसी वजह से उसने अमेरिका से बदला लेने के लिए एक “गे बार” का चुनाव किया.

मतीन को तो हम आतंकवादी कह कर पल्ला झाड़ सकते हैं, मगर इस बात पर हम शायद ही कभी विचार करें कि वो क्या है जिसकी वजह से दो पुरुषों का एक दुसरे को चूमना “धार्मिकों” के भीतर नफ़रत का गुबार पैदा कर देता है. धर्म की वो कौन सी शिक्षा होती है जहाँ दो पुरुषों का आपस में प्रेम करना उन दोनों को जान से मार दिए जाने को सही ठहरा देता है?

इस्लाम की अगर बात करे तो क़ुरान (7:80 से 7:84) तक पैगम्बर “लूत” का उदाहरण देता है जिसमें वो बताता है कि कैसे लूत ने “अपने लोगों” को इस “अनैतिकता” (समलैंगिकता) के बारे में समझाया, मगर उन लोगों ने लूत की बात समझने के बजाय उन्हें शहर से बाहर खदेड़ दिया. फिर लूत ने अपना शहर छोड़ कर, अपनी दो बेटियों के साथ दूसरी जगह एक पहाड़ की गुफ़ा में पनाह ली.. लूत की पत्नी उनके साथ नहीं आयीं क्यूंकि वो भी समलैंगिक थीं. आगे कुरान कहता है फिर अल्लाह ने लूत के लोगों पर पत्थर की बारिश कर के उस पूरे शहर को तबाह कर दिया…

कुरान और ज्यादा कुछ नहीं कहता है समलैंगिकों के बारे में. सिवाए पैगम्बर लूत की इस घटना को उदाहरण बताते हुवे.. इस आयत में जो सज़ा अल्लाह ने लूत के लोगों को दी थी, यानी पत्थर बरसा के मार दिया था, उसी बात को तमाम इस्लामिक विद्वानों ने इस समझ के साथ स्वीकार कर लिया कि अल्लाह उन्हें भी अपने कानून में समलैंगिकों को मारने का आदेश दे रहा है.. ये बात गौर करने वाली है कि क़ुरान में अल्लाह सज़ा देता है और विद्वान यहाँ ख़ुद सज़ा देते हैं.

Homosexuality in Islam (Representative Pic: catchnews)

इस्लामिक शरीया कानून की ज़्यादातर सज़ाएँ हदीसों से ली जाती हैं.. हदीसें इस्लाम की वो किताबें हैं, जिन्हें पैगम्बर के जाने के लगभग दो सौ सालों के बाद लिखा गया.. हदीसें सुनी सुनाई बातों पर आधारित किताबें हैं, जिनमें लोगों द्वारा कही गयी बातों को लिखा गया है. एक अनुमान के आधार पर कि पैगम्बर के वक़्त में ऐसा होता था या पैगम्बर मुहम्मद ने ऐसा कहा था.. कई हदीसों में समलैंगिकता के प्रति बहुत सख्त रुख़ अपनाते हुवे समलैंगिकों को जान से मारने का हुक्म दिया गया है.

इस्लाम में हदीसें समलैंगिकता की सज़ा, सज़ा-ए-मौत देती हैं, मगर क़ुरान किसी भी सज़ा की और इशारा नहीं करता है. वहीं बाइबिल समलैंगिकों को “जान से मार देने” की पैरवी करता है
बाइबिल (Leviticus 20) कहता है: अगर एक आदमी दूसरे आदमी के साथ ऐसे सोता है जैसे औरत के साथ सोया जाता है तो उन दोनों को जान से मार देना चाहिए.

यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि जहाँ क़ुरान किसी भी समलैंगिक के लिए खुल्लमखुल्ला किसी सज़ा की पैरवी नहीं करता है, लेकिन उसको मानने वाले समलैंगिकों को सजा-ए-मौत देते हैं. जबकि बाइबिल खुल्लमखुल्ला समलैंगिकों को मारने का हुक्म देता है, मगर बाइबिल को मानने वाले आज समलैंगिकों के सपोर्ट में खड़े हैं और उन्हें शादी तक करने का अधिकार देने की वकालत कर रहे हैं.

मतलब साफ़ है कि इस मामले में इस्लाम वाले जहाँ चौदह सौ साल पहले थे वहीं आज भी हैं.

एक सबसे रोचक बात जो कुरान और पैगम्बर लूत के सम्बन्ध में देखने को मिलती है वो ये है कि लूत के “लोगों” को समलैंगिक होने पर अनैतिक बताते हुवे चौदह सौ साल से उन्हीं लोगों का उदाहरण देते हुवे उनके लिए नफ़रत परोसी जा रही है, मगर पैगम्बर लूत अपना शहर छोड़ कर जब दूसरी जगह चले गए तो वहां क्या हुवा इस बारे में कभी कोई बात नहीं होती है.. चूंकि मुद्दा ये सारा अनैतिकता का है और समलैंगिकों को अनैतिक कह कर दुत्कारा जा रहा है इसलिए पैगम्बर लूत की आगे की कहानी को जानना सब धार्मिक नैतिक लोगों के लिए बहुत ज़रूरी है..

इस नैतिकता की दुहाई में कितनी नैतिकता है जानिये

कुरान (11:77 से 11:83) तक लूत की कहानी बताता है. कुरान ये सारांश बताता है कि दो फ़रिश्ते “नौजवान युवकों” का रूप धारण कर लूत के पास गए.. लूत के शहर के लोगों को जब खबर हुई कि शहर में दो खूबसूरत नौजवान आये हैं तो वो लूत के घर पहुंचे और उनसे कहा कि वो दोनों लडकें उन्हें सौंप दें, जिसके बदले में लूत ने अपनी उन शहर वालों से अपनी दोनों कुँवारी लड़कियों को ले जाने को कहा. क्यूंकि वो लड़के लूत के मेहमान थे.. मगर फिर शहर के लोग न माने और उन्होंने उन लड़कों को ही माँगा.

अब इसमें सबसे पहली बात देखने वाली ये है कि पैगम्बर लूत ने उन लड़कों के बदले में अपनी दोनों लड़कियों को ले जाने को कहा..

ये धार्मिक नैतिकों के लिए नैतिक है?

कुरान आगे की कहानी नहीं बताता है.. क्यूंकि आगे की कहानी बाइबिल में बता दी गयी है. कुरान वो बहुत सारी कहानियां आगे एक्सप्लेन नहीं करता है, जिसे बाइबिल और तौरेत में पहले से बता दिया गया है. बाइबिल और तौरेत इस्लाम के हिसाब से भी आसमानी किताब हैं और मुसलमान उन पर भी ईमान रखता है, इसलिए लूत के आगे की कहानी के लिए हम बाइबिल का रिफरेन्स लेंगे.

Genesis 19:30–38 का सारांश कहता है:

लूत ने अपने लोगों से भागकर एक पहाड़ की गुफ़ा में शरण ली.. लूत के साथ उनकी दो बेटियां थीं.. पत्नी को तो वो वहीं शहर में छोड़ आये थे, क्यूंकि वो भी शहर वालों के साथ मिली हुई थी.

Homosexuality in Islam, Hindi Article (Pic: thelinfieldreview)

पहाड़ पर आने के बाद लूत की दोनों बेटियां आपस में एक दुसरे से कहती हैं कि यहाँ इस निर्जन पहाड़ पर तो कोई आदमी कभी आ नहीं पायेगा और न हमारा किसी पुरुष से मिलन हो पायेगा. इसलिए चलो रात में अपने पिता को शराब पिला देते हैं और फिर उनके साथ सेक्स करते हैं, ताकि अपने पिता के “बीज” को हम सुरक्षित कर लें अपने गर्भाशय में. फिर वो दोनों पैग़म्बर लूत को शराब पिला देती हैं और बड़ी वाली अपने पिता के साथ सो जाती है.

दुसरे दिन छोटी वाली भी यही करती है.. इस तरह दोनों बेटियां अपने पिता पैग़म्बर लूत के साथ सम्भोग करती हैं और गर्भवती हो जाती हैं.. और आगे चलकर दोनों बेटियों को एक-एक बेटा पैदा होता है.

ये है पूरी नैतिकता की कहानी… जिन नैतिक लोगों की नैतिकता का सहारा लेकर लोगों को अनैतिक ठहरा दिया जाता है ये उनके नैतिकता की पूरी कहानी है. अब इस्लाम वाले बाइबिल की इस कहानी को स्वीकार करें या नहीं ये उनकी मर्ज़ी.. मगर पैगम्बर लूत की ये पूरी कहानी है.. और अगर इस पूरी कहानी को कुरान में नहीं बताया गया तो इसका मतलब ये नहीं कि ये सब झूठ है.. क्यूंकि ये कुरान से पहले आई किताबों का रिफरेन्स हैं जिसे मुसलमान भी आसमानी कहते हैं.

समलैंगिकों को अनैतिक ही कहा गया.. उनके प्यार को अनैतिक कहा गया और पैग़म्बर लूत का ही सहारा ले कर आज तक ये नैतिक और अनैतिक साबित करने का खेल चल रहा है.. आप सब खुद पढ़िए.. और इस नैतिकता और अनैतिकता के सारे जाल को समझिये.. इस पूरी कहानी के बाद क्या पैग़म्बर लूत को नैतिक साबित करके हम समलैंगिकों को धर्म के हिसाब से अनैतिक साबित कर के उन्हें मौत दे सकते हैं?
अगर बात यहाँ नैतिकता की ही है तो फिर अल्लाह ने फिर पैगम्बर लूत और उनकी बेटियों पर पत्थर क्यूँ नहीं बरसाए उनके उस अनैतिक सम्बन्ध के बाद?

क्रमशः…
आगे की कहानी ‘होमोसेक्सुयलिटी इन इस्लाम’ के अगले भाग में )

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