ईस्ट इंडिया कंपनी को कौन नहीं जानता!

यह कंपनी अपने व्यापार करने के तरीके के लिए विख्यात रही, किन्तु इससे भी ज्यादा इसको तब जाना जाने लगा, जब इसने भारत पर अपना कदम रखा और एक लंबे समय तक यहां व्यापार किया. मुगलों पर जिस तरह से अपनी पकड़ को मजबूत करते हुए इसने भारत में अपना विस्तार किया, उसे भुलाया नहीं जा सकता.

अपने सफर में इसने वह समय भी देखा, जब चारों तरफ उसका डंका ही बजा. इसे कंपनी का भाग्य कह लीजिए या कुछ और, पर अपने बलबूते कई राज्यों पर इसने अपना कब्जा जमाया. ऐसे में सवाल उठता ही है कि आखिर ईस्ट इंडिया कंपनी भारत कैसे आई.

वह कौन शख्स था, जिसकी कोशिशों के बाद ईस्ट इंडिया की नींव भारत में पड़ी.

आईये जानते हैं–

सूरत के बंदरगाह से शुरु हुई कहानी

1600 के आसपास का समय रहा होगा, जब कुछ अंग्रेज व्यापारियों ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ से भारत में व्यापार करने की अनुमति ली. व्यापार के लिए एक कंपनी की जरूरत थी, इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी नामक कंपनी का निर्माण किया गया.

अगली कड़ी में पूरी तैयारी के साथ इंग्लैण्ड से 1608 में ‘हेक्टर’ नाम का एक ज़हाज़ भारत के लिए रवाना किया गया. इस ज़हाज़ के कैप्टन का नाम था हॉकिंस. सबसे पहले सूरत के बन्दरगाह पर जाकर यह जहाज रुका. उस समय सूरत भारत का एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था. हॉकिन्स व्यापार की नियत से ही भारत यहां था, इसलिए उसने राजदूत के रुप में उस समय के सत्ताधारी मुगल बादशाह जंहागीर के पास जाकर हाजिरी लगाई.

चूंकि, वह इंग्लैण्ड के सम्राट का राजदूत बनकर आया था, इसलिए जहाँगीर ने भारतीय परंपरा के अनुसार अतिथि का विशेष स्वागत किया. साथ ही उसे पुरस्कार करके सम्मानित किया. शायद, उस वक्त जहांगीर इस बात से अंजान रहा होगा कि जिस अंग्रेज कौम के नुमाइन्दे को वह सम्मानित कर रहा है, एक दिन उसी कौम के वंशज भारत पर शासन करेंगे और हमारे शासकों और जनता को अपने सामने घुटने टिकवाकर सलाम कराएँगे.

Sir Thomas Roe (Pic: commons)

पुर्तगाली थे अंग्रेजों के लिए चुनौती!

चूंकि, अंग्रेजों के आने से पहले पुर्तगाली भारत आ चुके थे… साथ ही वह जहॉंगीर को प्रभावित भी कर चुके थे, इसलिए हॉकिंग्स के समाने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह उन्हें अपने रास्ते से कैसे हटाए.

इसके लिए उसने जहाँगीर को पुर्तगालियों के खिलाफ भड़काना शुरु कर दिया.

शुरुआत में उसे समस्या हुई, लेकिन धीरे-धीरे वह अपनी योजना में कामयाब रहा. यही नहीं वह जहाँगीर से कुछ विशेष सुविधाएँ और अधिकार लेने में भी सफल रहा. बाद में जल्द ही हॉकिंग्स ने पुर्तगालियों के जहाजों को लूट लिया. असल में वह जल्द से जल्द सूरत में पुर्तगालियों का व्यापार ठप्प कर देना चाहता था, ताकि उसका रास्ता साफ हो सके.

इसी कड़ी में 6 फरवरी 1663 को उसने बादशाह ज़हाँगीर से एक शाही फरमान जारी करवा लिया. इसके तहत अंग्रेजों को सूरत में कारखाना बनाकर व्यापार करने की इजाजत मिल गई. इसी के साथ ज़हाँगीर ने यह इजाजत भी दे दी कि उसके राज-दरबार में इंग्लैण्ड का एक राजदूत रह सकता है, जिसके तहत ‘सर थामस रो’ 1615 में राजदूत बनकर भारत आया.

थॉमस रो की रणनीति काम आई

‘थॉमस रो’ ने भारत पहुंचते ही अंदाजा लगा लिया था कि पुर्तगाली उनके व्यापार करने में दिक्कतें पैदा करेंगे. रो ही क्यों सभी दूसरे अंग्रेज अधिकारी इस बात को जानते थे. शायद इसलिए ही ‘थॉमस रो’ को भारत बुलाया गया था.

वह अपनी कूटनीति के लिए पूरे ब्रिटेन में मशहूर था.

उसके बारे में कहा जाता था कि वो इंग्लैंड की महारानी क्वीन एलिजाबेथ के शुरु से ही काफी करीबी थे. 1597 में मिडल टेंपल (वकीलों की खास जगह) में शामिल होते ही वह महारानी एलिजाबेथ प्रथम के विश्वासपात्र बन गए थे.

अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए, जल्द ही ‘रो’ ने अपना काम शुरु कर दिया. सबसे पहला उन्होंने सारे मामले को अच्छे से समझा और फिर अवरोधों को दूर करने की योजना बनाई. अपने आंकलन में उन्होंने पाया कि अगर उन्हें भारत में व्यापार करना है, तो उन्हें दोबारा से एक शाही फरमान हासिल करना होगा. इसके लिए उन्होंने हॉकिंग्स की मदद ली और जहांगीर के दरबार में पहुंच गए. वहां अपनी वाक कुशलता से वह जहॉंगीर को रिझाने में सफल रहे.

अपने संवाद से वह जहांगीर को यह भरोसा दिलाने में सफल रहे कि अंग्रेज़ पुर्तगालियों से ज्यादा ताकतवर हैं. वह न सिर्फ भारतियों को ज्यादा मुनाफे के साथ कारोबार कराएंगे, बल्कि उन्हें सुरक्षा भी देंगे. उनकी बात जहांगीर को पसंद आई और दोनों के बीच ये बात तय हुई कि कंपनी को व्यापार के लिए विशेषाधिकार दिए जाएंगे.

इस तरह ‘रो’ 1615 से 1618 के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए विशेष अधिकार हासिल करने में सफल रहे.

Sir Thomas Roe And Jahangir (Representative Pic: artuk)

….और शुरु हो गए ब्रिटिश कारखाने!

इस्ट इंडिया कंपनी को जैसे ही विशेषाधिकार मिले, उन्होंने अपने कारखाने लगाने शुरु कर दिए. एक के बाद एक अहमदाबाद, बरहामपुर, आगरा और सूरत में फैक्ट्रियां खोल दी गईं. बंगाल का इलाका समुद्र तट से सटा था, इसलिए उसे भी व्यापार के लिए चुना गया और यहां भी फैक्ट्रियों की स्थापना की गई.

धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी का वर्चस्व पूरे भारत में बढ़ता गया. इस तरह जिस कंपनी के लिए कभी पुर्तगाली मुसीबत हुआ करते थे, वह कंपनी उनके वर्चस्व को खत्म करते हुए भारत में मजबूती से स्थापित हो चुकी थी. आगे इतिहास गवाह है कि इस कंपनी ने कितनी तेजी से अपने पांव पसारे.

कहते हैं कि जितने साल भी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में रहीं वह मुनाफे में ही रही.

एक छोटी सी पूंजी के साथ भारत आने वाली कंपनी के बारे में कभी भी किसी ने ऐसा नहीं सोचा था कि, वह यहां दो सौ सालों तक राज करेगी. असल में इससे पहले कभी ऐसा हुआ ही नहीं था.

How East India Company Arrived In India (Representative Pic: blastingnews)

आज जितनी भी पुरानी ईमारतें, ट्रेन, कारखाने वगैरह देखते हैं, उसमें से ज्यादातर अंग्रजों के जमाने की ही हैं. उन्होंने इसे अपनी सुविधा के लिए बनाया था, जोकि आज तक टिकी हुई हैं.

ट्रेन को सबसे अच्छे उदाहरण के तौर पर भी देखा जा सकता है. आज इससे इस देश का यातायात काफी हद तक निर्भर हैं. हालाँकि, आने वाले दिनों में अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बना डाला, लेकिन इस लेख में बात सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में पाँव ज़माने की हुई है… तो इस पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से हमें अवश्य अवगत करायें!

Web Title: How East India Company Arrived In India, Hindi Article

Feature Image Credit: thoughtco