हर दिन अपने आप में एक नई कहानी का ताना-बाना बुनता है. इस कहानी में कई किरदार जन्म लेते हैं, तो कई अलविदा कह जाते हैं.

कभी कहानी में कोई सुखद मोड़ आता है, तो कभी दुखद.

तो चलिये आज 18 फरवरी की कहानी को जानने का प्रयास करते हैं–

मशहूर मूर्तिकार माइकल एंजेलो का निधन

‘यदि लोगों को पता लग जाए कि अपनी कला पर महारत हासिल करने के लिए मुझे कितनी मेहनत करनी पड़ी है, तो उन्हें यह इतनी खूबसूरत नहीं लगेगी.’

ये शब्द उस महान कलाकार के हैं, जिनकी कला से परिवर्तन की बयार चली. वह कोई और नहीं बल्कि इटली के पुनर्जागरण काल के मशहूर मूर्तिकार, चित्रकार, आर्किटेक्ट और कवि माइकल एंजेलो थे. वह आज ही के दिन यानी 18 फरवरी 1564 को दुनिया से अलविदा कह गए थे.

एंजेलो को उनके जीवनकाल के दौरान सबसे महान जीवित कलाकारों में से एक माना जाता था. उन्होंने अपने दो सबसे प्रसिद्ध कार्यों, पिएटा और डेविड को, तीस वर्ष की आयु से पहले रूप दे दिया था. माइकल एंजेलो ने पश्चिमी कला के इतिहास में दो सबसे प्रभावशाली भित्तिचित्र (ग्रफिटी) रोम के सिस्टिन चैपल की छत पर ‘जेनेसीस’ और दीवार पर ‘दा लास्ट जजमेंट’ के दृश्य को बनाया था. उन्होंने सेंट पीटर बैसिलिका चर्च का गुंबद भी तैयार किया था.

माइकल ने उस दौर के मशहूर कलाकार डोमोनिको घिरलैंडइओ से काम सीखा. बाद में, वे फ्लोरेंस शासक लोरेंजो के पास चले गए. 1490 से 1492 तक माइकल एंजेलो ने लोरेंजो के स्कूल में बहुत कुछ सीखा. वहां वे कई प्रभावी व्यक्तियों के संपर्क में आए.

इसी दौरान कला और कामुकता के विषय में उनके विचार बदल गए और उन्होंने ‘बैटल ऑफ़ द कैंटर्स’ और ‘मैडोना ऑफ़ द स्टेप्स’ पर काम किया. माइकल अपने जीवन के आख़िरी दिनों तक भी लगातार काम करते रहे. उनके काम की छाप आज भी इटली में देखी जा सकती है.

Famous artist of the Italian Renaissance Michelangelo (Pic: biography)

जब हुई प्लूटो की खोज

आज ही के दिन 1930 में प्लूटो की खोज अमेरिकी वैज्ञानिक क्लाइड डब्लू टॉमबॉग ने की थी. प्लूटो का नाम रोम के अंधेरे के देवता के नाम पर रखा गया था, क्योंकि इस ग्रह पर भी हमेशा अंधेरा रहता है. प्लूटो का आकार हमारे चंद्रमा का एक तिहाई है. यानी हमारे चंद्रमा के तीसरे हिस्से के बराबर है प्लूटो.

इसका डायमीटर लगभग 2,300 किलोमीटर है.

पृथ्वी प्लूटो से लगभग 6 गुना बड़ी है. वहीं प्लूटो सूर्य से औसतन 6 अरब किलोमीटर दूर है. इस कारण इसे सूर्य का एक चक्कर लगाने में हमारे 248 साल के बराबर समय लग जाता है.

प्लूटो 2006 तक सौरमंडल का काफी महत्वपूर्ण सदस्य था. इसे 9वें ग्रह का सम्मान प्राप्त था. किन्तु, 13 सितम्बर, 2006 को इंटरनेशनल एस्ट्रोनोमिकल एसोसिएशन ने प्लूटो से यह अधिकार छीन लिया. एसोसिएशन ने घोषणा कर दी कि अब प्लूटो ग्रह नहीं है. उन्होंने एक नई श्रेणी भी बनाई, जिसमें इसे बौने ग्रह का नाम देकर डाल दिया गया.

तब से प्लूटो को बौना ग्रह कहा जाता है. प्लूटो को बाहर करने का कारण यह था कि 2006 में वैज्ञानिकों नें सौरमंडल में ग्रहों की परिभाषा तय की थी, जिस पर प्लूटो खरा नहीं उतर पाया. इस वजह से प्लूटो को ग्रहों की श्रेणी से बाहर कर दिया गया.

Pluto Was Discovered In 1930 (Pic: mashable)

महान संत रामकृष्ण परमहंस का जन्मदिन

‘तुम रात में आकाश में बहुत सारे तारे देख सकते हो, लेकिन सूर्य उदय के बाद नहीं देख सकते. पर ऐसा तो नहीं है कि सूर्य उदय के बाद अर्थात दिन में आकाश में तारे नहीं होते. इसी प्रकार आप यदि अपनी अज्ञानता के कारण भगवान को प्राप्त नहीं कर सके, तो इसका मतलब यह तो नहीं कि भगवान हैं ही नहीं?’

ये पंक्तियां भारत के उस महान विचारक की है, जिन्होंने दुनिया को ईश्वर तक पंहुचने का सही मार्ग दिखाया. वह महान व्यक्तित्व कोई नहीं रामकृष्ण परमहंस थे. 18 फरवरी 1836 को उन्होंने बंगाल के हुगली जिले में स्थित कामारपुकुर नामक गांव में अपनी आंखें खोली थी.

परमहंस को सभी धर्मों की एकता पर जोर देने के लिए जाना जाता है. कहते हैं उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं. अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया. रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे.

साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है. वे ईश्वर तक पहुंचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं. रामकृष्ण परमहंस की एक पहचान यह भी है कि वह विवेकानंद के गुरु थे.

रामकृष्ण परमहंस के व्यक्तित्व की एक और खास बात यह थी कि वह मां काली के परम भक्त थे. बावजूद इसके उन्होंने कभी लोगों को मूर्ति पूजा के लिए प्रेरित नहीं किया. उन्होंने जाति प्रथा, पूजा-पाठ की जगह लोगों को स्वतंत्र चिंतन की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा दी.

Ramakrishna Paramahamsa (Pic: hindidesh)

अंग्रेजों के ख़िलाफ जलसेना विद्रोह

यूं तो भारत की आजादी के लिए कई तरह के आंदोलन चलते रहे, लेकिन सही मायनों में एक आंदोलन ऐसा भी था, जो 1947 में आजादी मिलने से ठीक एक साल पहले यानी की 1946 में हुआ था. यह आंदोलन इतना प्रबल था कि इससे अंग्रेजी हुकूमत के पसीने छूट गए थे.

इस आंदोलन को जलसेना विद्रोह कहा जाता है, जो मुंबई से शुरू हुआ था. मुम्बई में रॉयल इंडियन नेवी के सैनिकों की हड़ताल के साथ इस विद्रोह की शुरुआत की.

यह विद्रोह 18 फ़रवरी 1946 को जहाजों और समुद्र से बाहर स्थित जलसेना के कई ठिकानों पर हुआ. कमाल था कि इसकी शुरुआत मुंबई में हुई, लेकिन यह कराची से लेकर कोलकाता तक फैल गया और धीरे-धीरे पूरे भारत में समर्थन मिलने लगा.

इस आंदोलन की आंच इतनी तेज थी कि महज़ चार दिन के अंदर यह देश में 78 जलयानों, 20 स्थलीय ठिकानों पर फैला और इसमें 20000 नाविकों ने भाग लिया. अचंभा यह रहा कि इतने बड़े विद्रोह को भारत की आजादी के इतिहास में ज़रा भी जगह नहीं मिली.

दरअसल यह विद्रोह सैनिकों ने खराब खाने को लेकर हुआ, जिसे अंग्रेजों ने दबाया और इसे सैनिकों पर नस्‍लीय टिप्‍पणियों के साथ अपमानजनक तौर पर निपटाने की कोशिश की.

बहरहाल, इस आंदोलन की आग से पूरी कांग्रेस और उसका शीर्ष नेतृत्‍व भयभीत हो गया था, नौबत ये आ गई कि इस आंदोलन को रोकने के लिए सरदार वल्‍लभ भाई पटेल को आगे आना पड़ा और उन्‍होंने 23 फरवरी 1946 को नौसैनिकों समर्पण के लिए तैयार किया.

इस तरह यह आंदोलन कई नाटकीय घटनाक्रमों के बाद आखिर दबा दिया गया था.

Royal Indian Navy mutiny (Pic: timesofindia)

समझौता एक्सप्रेस धमाका

18 फरवरी 2007 की रात दिल्ली से लाहौर जा रही समझौता एक्सप्रेस में बम धमाके से 68 लोग मारे गए थे. धमाके की वजह से ट्रेन की दो बोगियां बुरी तरह से जल गईं थी. मरने वालों में ज़्यादातर पाकिस्तानी नागरिक थे जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे थे.

ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से रवाना हुई थी और क़रीब एक घंटे के बाद ही हरियाणा के पानीपत से कोई दस किलोमीटर पहले सिवाह गांव में ये हादसा हुआ. यह विस्फोट पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी के भारत यात्रा के एक दिन पहले हुआ.

जांच के दौरान ट्रेन में विस्फोटक सामग्रियां भी पाई गई. बाद में बचे हुए आठ डब्बों के साथ ट्रेन को पाकिस्तान के लाहौर शहर की ओर रवाना कर दिया गया. इन विस्फोटों की भारत और पाकिस्तान में व्यापक निंदा हुई थी.

बताते चलें कि, भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के तहत जून, 1976 से समझौता एक्सप्रेस चलनी शुरू हुई थी. शुरुआत में समझौता एक्सप्रेस अमृतसर और लाहौर के बीच चला करती थी. बाद में सुरक्षा कारणों की वजह से व्यवस्था बदली गई और मई, 1994 से ये दिल्ली से अटारी और अटारी से लाहौर के बीच दो हफ्ते में एक बार चलने लगी.

Samjhauta Express Bomb Blast (Pic: thefearlessindian)

तो ये थी आज के दिन से ज़ुड़ी कुछ ख़ास बातें. हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं कि आपको ये लेख कैसा लगा और कौन-सी जानकारी सबसे ज्यादा दिलचस्प लगी.

Web Title: Important Historical Events of 18th February, Hindi Article

Featured Image Credit: Morning Feeds