22 जून 1887 को बकिंघम पैलेस में खूब गहमागहमी थी. पारंपरिक परिधान में चुनिंदा भारतीय राजा और ब्रिटिश कॉलोनियों के प्रमुख पैलेस में पहुंच चुके थे. मौका था महारानी विक्टोरिया के ब्रिटेन व आयरलैंड पर शासन के 50 साल पूरे होने पर आयोजित स्वर्ण जयंती उत्सव का.

महल में मौजूद सभी मेहमानों की नजरें दरवाजे की तरफ थीं कि तभी काले लिबास में लिपटी ठिगनी कदकाठी वाली महारानी विक्टोरिया अंदर प्रवेश करती हैं. सभी आगे बढ़ कर उन्हें सलाम करते हैं. भारत से गया एक सहमा हुआ युवक भी उनका अभिवादन पुरबिया स्टाइल में करता है. दोनों की यह पहली मुलाकात थी.

युवक का नाम था हाफिज मोहम्मद अब्दुल करीम. अब्दुल को महज चंद महीने के लिए बकिंघम पैलेस भेजा गया था, लेकिन देखते ही देखते वह महारानी विक्टोरिया का हमराज, उर्दू सिखाने वाला उस्ताद और सलाहकार बन गया, लेकिन कैसे..?

आइए, इस लेख के माध्यम से महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम के इस खूबसूरत रिश्ते की महक को महसूस करते हैं –

ललितपुर की पैदाइश, आगरा में नौकरी

अब्दुल का जन्म झांसी के निकट ललितपुर में सन् 1863 को हुआ था. उस वक्त भारत की बागडोर ईस्ट इंडिया कंपनी ही संभाल रही थी. अब्दुल बड़ा हुआ, तो मध्य प्रदेश में एक राजा के यहां नौकरी करने लगा. हालांकि, 1880 में उसने राजा की नौकरी छोड़ दी और आगरा चला आया. यहां पहुंचकर करीम ने सेंट्रल जेल में नौकरी शुरू कर दी.

गौरतलब हो कि अब्दुल के आगरा आने से लगभग 4 साल पहले ही यानी 1876 में भारत की बागडोर ईस्ट इंडिया कंपनी से निकलकर महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ चुकी थी. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि भारत के शासन का जिम्मा मिलने के 10 साल बाद यानी 28 जून 1886 को महारानी ने जॉन विलियम टेलर को आगरा सेंट्रल जेल का सुपरिंटेंडेंट बनाने का आदेश जारी कर दिया.

इसी संयोग ने असल में अब्दुल करीम और महारानी विक्टोरिया के बीच मुलाकात की वह मजबूत बुनियाद तैयार कर दी थी, जिस पर अगले डेढ़ दशकों तक एक मजबूत रिश्ते की तामीर होनी थी.

Hafiz Munshi Mohammed Abdul Karim. (Pic: pinterest)

18 साल की उम्र में विक्टोरिया बनीं महारानी

महारानी विक्टोरिया के जन्म को जानने के लिए हम अब्दुल करीम की पैदाइश से 44 साल पीछे चलते हैं.

साल था 1819, तारीख 24 मई, इसी दिन लंदन के केनसिंगटन पैलेस में एलेक्जेंडरीना विक्टोरिया का जन्म हुआ था. वह अपने माता-पिता की 5वीं संतान थीं. जब उनकी उम्र एक साल भी नहीं हुई थी, तभी उनके पिता का देहांत हो गया. अब विक्टोरिया के लालन-पालन की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई.

उन्होंने विक्टोरिया को कठोर अनुशासन के बीच पाला-पोसा. उसे दूसरे बच्चों के साथ खेलने की इजाजत नहीं थी, खाने से सोने तक के लिए सख्त नियम थे.

खैर, बेहद तन्हाई व अनुशासन की मजबूत चहारदीवारी के बीच वह बड़ी हुईं और 20 जून 1837 को 18 साल की उम्र में ही ब्रिटेन की महारानी के रूप में उनकी ताजपोशी हो गई.

Queen Alexandrina Victoria. (Pic: Alchetron)

बकिंघम के लिए अब्दुल का चयन!

वापस आते हैं ताजमहल के प्रसिद्ध शहर आगरा में!

भारत पर शासन करने से पहले महारानी विक्टोरिया करीब 39 सालों तक ब्रिटेन व आयरलैंड पर राज कर चुकी थीं. और, भारत पर हुकूमत चलाने के करीब एक दशक बाद ही महारानी विक्टोरिया की ताजपोशी का स्वर्ण जयंती वर्ष आ गया.

चूंकि वह ब्रिटिश भारत की भी महारानी थीं, तो उन्होंने भारत की चुनिंदा रियासतों के राजाओं को दावत का संदेश भारत भेजा.

अब समस्या थी कि महारानी अंग्रेजी के सिवाय दूसरी भाषा नहीं जानती थीं, लिहाजा भारत में मौजूद अंग्रेजों ने ऐसे राजाओं को तलाशा जिन्हें कीमती पोशाक व गहने पहनने का शौक हो और वे अंग्रेजी भी जानते हों. करीब आधा दर्जन राजाओं को बकिंघम पैलेस आने का आमंत्रण दे दिया गया था. भारत के राजा जलसे में शिरकत कर रहे थे, अब भारतीय नौकरों की जरूरत भी आन पड़ी.

ऐसे में महारानी विक्टोरिया ने अपने विश्वस्त जॉन विलियम टेलर को याद फरमाया. टेलर को तार भेजा गया कि भारत से दो नौकर भी लाए जाएं, ताकि भारत के राजाओं से बातचीत करने में सहूलियत हो. यह सब सन् 1887 के जून महीने में हुआ.

जॉन विलियम टेलर ने सेंट्रल जेल में कार्यरत दो युवकों मोहम्मद बख्श और अब्दुल करीम को चुना. असल में महारानी विक्टोरिया ने अपने तार में ये भी कहा था कि ऐसे युवकों का चयन किया जाए, जो दिखने में अच्छे हों और उनमें कपड़े पहनने का सलीका हो.

विलियम टेलर को ये दोनों युवक जंच गए थे. 17 जून को दोनों को विंसटन किले में लाया गया. दोनों की खुशी का पारावार न था, हो भी क्यों न.. जिस महारानी को देखने के लिए पूरा ब्रिटेन और भारत उतावला हो, उसकी खिदमत में दोनों पहुंचे थे.

Abdul Karim sent to England to present a gift to her Majesty. (Pic: theneighborhood)

…और बन गया विक्टोरिया का प्रिय ‘सखा’

20 जून 1887 को अब्दुल और मोहम्मद बख्श सज-धजकर बकिंघम पैलेस पहुंच गए. महारानी विक्टोरिया आईं, सबसे मुलाकात हुई और दिन बीत गया. फिर बारी आई रात के खाने की. भारतीय राजाओं के साथ विक्टोरिया भी डिनर करने आईं. विक्टोरिया के आते ही अब्दुल और बख्श ने उनके पैर चूम लिए.

यहीं पहली बार अब्दुल और विक्टोरिया की नजरें मिलीं.

…और दोनों के बीच दोस्ती का अफसाना लिखना शुरू हो गया. कुछ दिन बाद बख्श भारत लौट गया, लेकिन चंद महीनों के लिए आया अब्दुल देखते-देखते विक्टोरिया के सबसे करीब पहुंच गया. वह परछाई की तरह उनके साथ रहता और उन्हें हिन्दुस्तानी व उर्दू भाषा सिखाता. बदले में विक्टोरिया उसे अंग्रेजी बतातीं.

यही नहीं, वह भारत के संबंध में महारानी विक्टोरिया को महत्वपूर्ण मशविरे भी देने लगा था. बाद में महारानी ने उसे भारतीय मामलों का सचिव बना दिया और भारत के मामले में कोई भी निर्णय लेने से पहले अब्दुल के विचार जरूर लिए जाते थे.

Abdul Karim served to Queen Victoria. (Pic: The London Economic)

महारानी की मौत के बाद बेआबरू अब्दुल!

20 जून 1887 को शुरू हुआ विक्टोरिया व अब्दुल के बीच का रिश्ता दिनोंदिन परवान चढ़ता चला गया. महारानी विक्टोरिया अब्दुल की नजरों से भारत को देखा करती थीं.

महारानी उससे इतना प्रभावित थीं कि उसे रहने के लिए आवास भी दे दिया गया था. हालांकि, विक्टोरिया के इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों व उनके अपने रिश्तेदारों को नौकर सरीखे अब्दुल का यूं घुलना-मिलना रास नहीं आया. तरह-तरह की अफवाहें राजमहल की दीवारों से छनकर बाहर आने लगीं. यहां तक कि महारानी के चरित्र पर भी प्रजा में सवाल उठने लगे थे. लेकिन, उन्होंने कभी सफाई नहीं दी और उन्हें कभी इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी.

सन् 1901 में 22 जनवरी को जब महारानी का देहांत हुआ, तो राजमहल में मौजूद अब्दुल करीम की सारी निशानियां मिटा दी गईं और उसे वापस आगरा भेज दिया गया.

Queen Victoria and Abdul Karim. (Pic: Hollywood Reporter)

आगरा आने के बाद अब्दुल गुमनाम जिंदगी जीने लगा और महारानी विक्टोरिया के देहांत के आठ साल बाद 46 साल की उम्र में अब्दुल भी दुनिया से चला गया.

बस, रह गया दोनों के बीच रूहानी रिश्ते का दिलचस्प अफसाना.

Web Title: Interesting Story of Queen Victoria and her Urdu Teacher Abdul Karim, Hindi Article

Featured Image Credit: Edge Hill University