भारत की कला और इतिहास विश्वविख्यात है.

दुनिया भर में लोग भारतीय संगीत, नृत्य और योग को समझते और सीखते हैं, लेकिन भारत में जन्मी एक कला ऐसी भी है जिसे उस दर्जे की पहचान और लोकप्रियता नहीं मिली जिसकी वह हक़दार है.

वह है कलरीपायट्टु!

कलरीपायट्टु को दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट तकनीक माना जाता है. इस कला की उत्पत्ति दक्षिण भारत के केरल में हुई. यह विश्व की पुरानी युद्ध कलाओं में से एक है.

तो चलिये आज आपको बताते हैं उस युद्ध कला के बारे में जो आज तक भारत में अपनी पहचान की मोहताज है–

कुशल योद्धा तैयार करने की बेमिसाल तकनीक

कलरीपायट्टु दो शब्दों से मिलकर बना है, पहला कलरी जिसका मतलब ‘स्कूल’ या ‘व्यायामशाला’, वहीं दूसरे शब्द पायट्टु का मतलब होता है ‘युद्ध या व्यायाम करना’.

कहते हैं कि कलरीपायट्टु एक ऐसी कला है जिसे सीखने में सालों लग जाते हैं.

Kalaripayattu (Pic: kalari-belraj)

यह कला सिर्फ व्यायाम और शारीरिक चुस्ती फुर्ती तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली बतायी जाती है. यह सीखने वाले व्यक्ति को ना सिर्फ एक प्रबल योद्धा बनाती है, बल्कि इसके जरिए लोग चिकित्सा की कला भी सीख जाते हैं.

कलरीपायट्टु का अभ्यास ‘कलरी’ में किया जाता है, जिसे आम भाषा में इस कला का अखाड़ा भी कहा जा सकता है. इस कलरी में एक ओर पुत्तरा बना होता है जो ईश्वर का स्थान होता है.

कलरी प्रशिक्षण आमतौर पर सात वर्ष की आयु से शुरू हो जाता है. जाहिर तौर पर यह वो समय होता है जब शरीर में सीखने की क्षमता और ताकत सबसे ज्यादा होती है. यह उम्र कच्ची मिट्टी के जैसे होती है. इस उम्र में अगर बच्चे को सही से ढाला जाए तो वह कलरीपायट्टु में महारत हासिल कर सकता है.

हालांकि इस कला को गुरु के मार्गदर्शन में किसी भी उम्र में सीखा जा सकता है.

कलरी प्रशिक्षण मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है – मिथारी, कोल्थारी और अंक्थरी–

मिथारी

इसमें सबसे पहले शरीर की मजबूती और ताकत को बढ़ाने के लिए विभिन्न कसरत कराई जाती है. एक अच्छा योद्धा बनने के लिए सबसे जरूरी है कि शरीर पूरी तरह मजबूत हो, ताकि सामने आने वाली किसी भी बाधा से निपटा जा सके.

कोल्थारी

इस पड़ाव में अलग-अलग प्रकार के लकड़ी के हथियार होते हैं, जिनसे लड़ना सिखाया जाता है. किसी शुरूआती योद्धा को धारदार हथियारों से लड़वाना सही नहीं माना जाता. चूंकि नए योद्धा हथियारों से अनजान होते हैं, इसलिए वह खुद को क्षति पहुँचा सकते हैं. इस वजह से योद्धा की शुरूआती ट्रेनिंग लकड़ी के बने हथियारों से होती है.

अंक्थरी

इसी तरह इस पड़ाव तक आने में योद्धा लकड़ी के हथियारों से खुद को पूरी तरह युद्ध के लायक बना लेता है. अब बस समय आता है कि उसे असली हथियार दिए जाएं ताकि वह असली जिम्मेदारी को समझ पाएं. इस पड़ाव में उसे भाले, ढाल, तलवार आदि जैसे खतरनाक हथियार दिए जाते हैं.

कई बार लड़ाई में ऐसे मौके भी आ सकते हैं जिसमें योद्धा के हाथ में हथियार न हो. ऐसी परिस्थिति के लिए भी कलरी में योद्धाओं को तैयार किया जाता है. कहते हैं कि उन्हें बिना हथियार भी दुश्मन का सामना करने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. इसके बाद यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं पड़ने वाला.

इस कला के अंत में कलरी ‘मार्मा’ का विशेष प्रशिक्षण होता है. इसका उद्देश्य मानव शरीर के सभी 107 ऊर्जा बिंदुओं को जानने और सक्रिय करना होता है. इन महत्वपूर्ण बिंदुओं का उपयोग शरीर में ऊर्जा-प्रवाह को सुधारने के लिए किया जाता है.

Kalaripayattu Make’s A Complete Warrior (Pic: kalaripayattu.kerala)

जानवरों से बचाव था उद्देश्य

कलरीपायट्टु एक बेहद प्राचीन कला है जिसकी वजह से इसकी उत्पत्ति को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं. इस कड़ी में सबसे पहला नाम है अगस्त्य मुनि का.

यह पक्के तौर पर तो किसी को भी नहीं पता कि आखिर इसकी शुरुआत किसने की, लेकिन धारणाओं के मुताबिक अगस्त्य मुनि ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दुनिया को इस कला से रूबरू किया. अगस्त्य मुनि से जुड़ी एक कहानी इस बात को जाहिर करती है.

दरअसल, अगस्त्य मुनि एक छोटी कद-काठी के साधारण से दुबले पतले और नाटे इंसान थे. उन्होंने कलरीपायट्टु की रचना खास तौर पर जंगली जानवरों से लड़ने के लिए की थी. अगस्त्य मुनि जंगलों में भ्रमण करते थे. माना जाता है कि उस समय शेरों की तादाद बहुत ज्यादा हुआ करती थी. वह आते-जाते लोगों पर हमला किया करते थे. शेरों के अलावा कई बड़े और ताकतवर जंगली जानवर भी इंसानों पर हमला कर देते थे. इन हमलों से अपने बचाव के लिए अगस्त्य मुनि ने एक तरीका विकसित किया. जिसे नाम मिला-कलरीपायट्टु.

इस कड़ी में उन्होंने एक लड़ाई की शैली तैयार की जिसके जरिए खतरनाक जानवरों से खुद का बचाव किया जा सके. वक़्त के साथ यह कला जानवरों के साथ-साथ इंसानों से अपना बचाव करने के लिए भी मशहूर हो गई.

बाद में इसे जंग में भी इस्तेमाल किया जाने लगा.

People Believe That Kalaripayattu Is Invented To Fight Animals (Pic: wandertrails)

पौराणिक गाथाओं में उल्लेख!

कलरीपायट्टु की व्याख्या पौराणिक गाथाओं में भी की गई है. माना जाता है कि इसका जन्म धनुर्वेद से हुआ है. धारणाओं के अनुसार कलरीपायट्टु सदियों पहले ही इजाद हो गया है. यह भी कहा जाता है कि इस कला को दुनिया के सामने लाने वाले और उन्हें सिखाने वाले व्यक्ति थे भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम थे.

कहते हैं कि वह नहीं चाहते थे कि यह कला उन तक ही सीमित रह जाए, इसलिए उन्होंने इसे आगे बढ़ाने का फैसला किया. केरल में उन्होंने 42 कलरी खोले और 21 लोगों को चुना जिन्हें वह यह युद्ध कला सिखाने वाले थे. उन सभी 21 लोगों को कड़ी मेहनत के बाद भगवान परशुराम ने इस कला में माहिर कर दिया ताकि आने वाले समय में वह केरल की धरती को दुश्मनों से बचा सकें.

इसके बाद 9वीं शताब्दी में कलरीपायट्टु का असल विस्तार हुआ जब केरल के योद्धाओं ने इसे जंग के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया. माना जाता है कि 11 वीं शताब्दी में चोल राजवंश, पाण्ड्य राजवंश और चेर साम्राज्य के बीच 100 साल तक चली एक जंग में कलरीपायट्टु का खूब इस्तेमाल किया गया.

Legend Says That Lord Parshuram Evolve The Process Of Kalaripayattu (Representative Pic: onlineprasad)

बॉलीवुड सेलेब्रिटीज हैं कलरीपायट्टु के दीवाने

बॉलीवुड सेलेब्रिटीज ने भी कलरीपायट्टु की ताकत को पहचाना और इस कला को सीखा है. फिल्म बागी में टाइगर श्रॉफ ने ख़ास तौर पर कलरी की ट्रेनिंग मास्टर शिफूजी शौर्य भारद्वाज से ली थी. वहीं, अभिनेता विद्युत जामवाल ने 3 साल की उम्र से इस कला को सीखना शुरु कर दिया था.

फिर भी, फिल्म कमांडो के लिए उन्होंने इसकी ख़ास ट्रेनिंग अलग से ली थी.

Tiger Shroff Learned Kalaripayattu Fighting Style For His Movie (Pic: shifuji)

हालाँकि, कलरीपायट्टु एक ऐसी कला ही बन सकी है जो आज भी दक्षिण भारत तक ही सीमित है. इसलिए आज जरुरत है कि हम इस कला के बारे में जानें और इसे विस्तार दें.

Web Title: Kalaripayattu: Indian Invented Dangerous Martial Art, Hindi Article

Featured Image Credit: Buddha Kalari Kalaripayattu